कोमल टहनी सी, गुलाब की पंखुड़ी सी है वो…
मेरी कलम से…
आनन्द कुमार
वह मुझे जगाकर सो गये,
जाने दो, सोने दो,
थक जाते हैं वो,
दिन भर के उधेड़बुन में,
लगे रहते हैं वे,
सच में, कितना मेहनत,
करते हैं वे,
उसी में वक्त निकाल कर,
कर तो लेते हैं प्यार मुझको,
थोड़ा मनुहार कर लेते है,
थोड़ा-थोड़ा, कभी कभार,
गुस्सा भी कर लेते हैं।
हर अदा उनकी,
निराली होती है,
सच में उनके बिन तो,
दिवाली भी सूनी होती है।
नववर्ष पर उनके द्वारा,
दिए गये गुलाब को,
अब भी संभाल रखा हूं,
जब जी में आता,
महक लेता हूं मैं,
उस सुखे फूल को देख कर,
भी चहक लेता हूं मैं।
पिछली होली में ही तो,
उन्होंने बिन हाथ में रंग लिए,
मेरे गालों को,
ऐसे सहलाया था,
जैसे चांद जमीन पर उतर कर,
मुझसे ही फरमाया था,
मैं भूल नहीं पाता हूं,
दर्द समेटने की, उनकी अदा को,
मैं झुठला नहीं पाता हूं,
गम में मिले उनके संवेदना को।
कोमल टहनी सी,
गुलाब की पंखुड़ी सी है वो,
मेरे जीवन की वर्तमान,
और भविष्य है वह।।

