आरबीएसके ने 04 साल की पल्लवी को दी नई ज़िंदगी, सफल हुआ ऑपरेशन, मिली सुनने और बोलने की शक्ति
मऊ। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत फतेहपुर मंडाव ब्लाक की आरबीएसके टीम और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के सहयोग से कंधरपुर गाँव के रहने वाले सुनील प्रजापति की पुत्री पल्लवी (चार वर्ष) को आंगनबाड़ी केंद्र पर हेल्थ स्क्रीनिंग के दौरान पता चला कि उसकी सुनने और बोलने की क्षमता नहीं है। लाकडाउन में छूट मिलने के बाद हाल ही में शासन से सर्जरी के लिए चयनित कानपुर के डॉ एसएन मेहरोत्रा मेमोरियल ईएनटी (कान, नाक एवं गला) फाउंडेशन अस्पताल में सफलतापूर्वक निःशुल्क ऑपरेशन किया गया जिसका खर्च लगभग आठ लाख तक आया लेकिन आरबीएसके के तहत पल्लवी का ऑपरेशन पूरी तरह से निःशुल्क हुआ और जिसका खर्चा सरकार ने वहन किया ।
पिता सुनील प्रजापति ने बताया कि पल्लवी जन्म से ही सुन-बोल नहीं पाती थी। एक दिन आंगनबाड़ी कंदरापुर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता किरण तिवारी के माध्यम से केंद्र पर डॉ अनीता सिंह स्वास्थ्य टीम के साथ आईं । उन्होंने बच्ची को देखा और बताया कि बच्ची ठीक हो जाएगी यह सुनकर हमारे पूरे परिवार को तो मानो खुशियों के पंख लग गये। उन्होंने बताया इलाज पर सात से आठ लाख रुपये का खर्च आएगा । आर्थिक रूप से कमजोर सुनील को उसके इलाज के खर्च की चिंता सताने लगी । लेकिन तुरंत ही डॉ अनीता ने मुस्कराते हुए बोला कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है। यह सारा खर्च सरकार वहन करेगी । एक दिन एम्बुलेंस आई और पूरे परिवार को एम्बुलेस द्वारा मऊ ले गई । वहाँ बेटी की जांच की गयी और ऑपरेशन के लिये जरुरी कागजात लगाने को कहा । उसके बाद पल्लवी को लेकर कानपुर गये । ऑपरेशन के एक सप्ताह के भीतर छुट्टी मिल गई । अब पल्लवी सुन सकती है और बोलने के लिए बताया गया है कि धीरे-धीरे फॉलोअप प्रशिक्षण के बाद बोलने लगेगी। सुनील ने कहा कि उसके निःशुल्क इलाज से पूरा परिवार वहुत खुश है। इसके लिए वह आंगनबाड़ी दीदी, स्वास्थ्य टीम, आपरेशन में लगे पूरे मेडिकल टीम के सहयोग और योजना के प्रति जीवनभर आभारी रहेंगे।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ सतीशचन्द्र सिंह ने बताया कि डब्ल्यूएचओ के अनुसार प्रति एक हजार नवजात बच्चों में औसतन छह बच्चे जन्मजात मूक-बधिरपन की समस्या से ग्रसित होते हैं । यदि उसका सही समय पर सही इलाज मिले तो बहुत हद तक बच्चा ठीक हो जाता हैं लेकिन ज्यादातर बच्चों में इस बीमारी की पहचान नहीं हो पाती या देरी से पता चलता है । इसलिए सभी माता-पिता को बच्चे के पैदा होने के बाद उसके स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से जांच / जन्मजात रोग के लिए स्क्रीनिंग करवाते रहना चाहिए।
कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ आर के झा ने बताया कि जन्मजात दोष के स्क्रीनिंग एवं संदर्भन के लिए समस्त प्रसव केंद्रों पर कार्यरत डॉक्टरों व अन्य सम्बन्धित कर्मियों को प्रशिक्षण एवं आवश्यक निर्देश दिए जा चुके हैं। किसी भी प्रकार की समस्या आने पर जल्द से जल्द ऐसे मूक-बधिर बच्चे की कॉकलियर इमप्लांट सजर्री हो जाए, तो बेहद शानदार नतीजे आते है।
आरबीएसके के डीआईईसी मैनेजर अरविंद कुमार वर्मा ने बताया कि जन्मजात मूक-बधिर की समय पर पहचान और तुरंत कॉकलियर इम्प्लांट सजर्री ही गूंगे व बहरेपन का सही समय पर सही इलाज है। इसी उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम एवं दिव्यांग कल्याण विभाग के सहयोग से सदर अस्पताल मऊ में अगस्त 2019 में परीक्षण शिविर का आयोजन कर जनपद के विभिन्न ब्लाकों से आये जन्म से पाँच साल के 72 मूक-बधिर बच्चों का परीक्षण किया गया था जिसमें 37 बच्चों को स्वास्थ्य लाभ के लिए अगले चरण के लिए चिन्हित किया गया था, इसमें पल्लवी भी शामिल थी ।
फतेहपुर मंडाव ब्लॉक के अधीक्षक डॉ आर के पांडेय ने बताया कि ब्लॉक फतेहपुर मांडव पर भी दो आरबीएसके टीम है जो नियमित रूप से प्रत्येक वर्ष में विद्यालय में एक बार और प्रत्येक आंगनवाड़ी केन्द्र का दो बार भ्रमण कर बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण करती है।

