खास-मेहमान

स्टार्ट अप : नये आयडिया व व्यापार की बारिकियां

(रत्नेश कुमार सिंह)

अर्थशास्त्र का एक शेर अर्ज है…

जब रोजगार ही नहीं होगा तो वस्तु उपभोग नहीं होगा।
जब वस्तु उपभोग नहीं होगा तो वस्तु मांग नहीं होगी।
जब वस्तु मांग नहीं होगी तो वस्तु उत्पादन नहीं होगा।
जब वस्तु उत्पादन नहीं होगा तो स्टार्टअप* नहीं होगा।
जब स्टार्टअप नहीं होगा तो फिर वही रोजगार नहीं होगा।

दिल्ली। केन्द्र में मोदी सरकार ने 26 मई 2014 को शपथ लेकर अपने कार्यकाल की शुरुआत की, हालांकि 25 मई को रविवार होने के कारण बाजार का हफ्ते के कारोबार का आखिरी दिन 23 मई 2014 था। लिहाजा, सेंसेक्स ने 22 मई 2014 के 24,374 के स्तर से 319 अंकों की छलांग लगाते हुए 23 मई 2014 को 24,693 के स्तर पर क्लोजिंग की थी।

अभी 2018 के प्रारम्भ में ही देश का शेयर मार्केट बाजार अब तक के रिकार्ड उच्चतम स्तर तक 36000 के पार पहुँच गया है और इस शेयर बाजार के उछाल का लाभ आम जनता को नहीं मिल रहा है और यह विभिन्न समाचारपत्रों व मीडिया के माध्यम से यह एडवायजरी भी आ रही है कि इस तेजी के उछाल के दौर में अप्रत्याशित नुकसान से बचाव हेतु छोटे निवेशक दूर रहे।एक तरफ देश का शेयर बाजार बुलंदी छू रहा है फिर भी गरीब और गरीब होता जा रहा है और किसान आत्महत्या कर रहा है।सरकार की नीयत अच्छी व दूरदर्शी है परन्तु भारतीय जनमानस के आर्थिक परिदृश्य के प्रति भय से धरातल पर कुछ और घटित हो रहा है।

देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ी है इसके बावजूद भी गरीब और निम्न मध्यम वर्ग परेशान दिख रहा है।दिल्ली जैसे मेट्रो शहरों में स्टेशनों और रेडलाइटों पर भिखारियों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है।कारण सरकार को तलाशना होगा और प्रभावी कार्रवाई करनी होगी। अभी एक रिपोर्ट आयी है कि देश की 73% कुल सम्पदा सिर्फ 1% लोगों के हाथ में है तो किस तरह पूंजी बाजार के उछाल का लाभ शेष 99% लोगों तक पहुँचे।

एक तरफ सरकार की उपलब्धि है कि वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में एफडीआई में 8 फीसदी की वृद्धि हुई और यह 60.08 अरब डॉलर रही, जबकि पिछले साल यह 55.56 अरब डॉलर थी। यह अब तक का सबसे ज्यादा है। इससे पहले वित्त वर्ष 2015-16 में एफडीआई सबसे ज्यादा दर्ज की गई थी तो दूसरी तरफ अघोषित स्वदेशी उत्पाद पर जोर।। हालाँकि निसन्देह स्वदेशी उत्पाद पर जोर देना अच्छी बात है परन्तु टर्नओवर व एकल ट्रस्ट आधारित उत्पाद आने वाले समय मे गम्भीर सेवायोजन संकट पैदा करेगे क्योकि छोटी-छोटी इकाइयों के माध्यम से जब कोई संगठन उत्पादन करती है तो आसपास बहुत सी अन्य इकाईयां स्थापित होती है जिससे उस क्षेत्र का आर्थिक विकास व रोजगार सृजनता होती है।

1- सरकार द्वारा नोटबंदी और जीएसटी जैसी बडा़ आर्थिक निर्णय नि:सन्देह कालेधन व भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार था और सरकार को इसका फायदा मिलने की उम्मीद थी।

2- आज के ही अखबारों में नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत एक आंकड़ा था कि सरकार की लगभग 300 स्कीमों में डीबीटी योजना से सरकार को लगभग 65, 000 करोड का फायदा हुआ और 41,000 करोड़ लोग लाभान्वित हुए हैं।

3- अप्रत्यक्ष कर जीएसटी में 1 करोड़ करदाता पंजीकृत हुए है और औसतन मासिक कर संग्रह 85-90 हजार करोड़ का है।प्रत्यक्ष कर (आयकर इत्यादि ) का भी संग्रह 18% बढ़ा है।

4- कच्चे तेल के अन्तरराष्ट्रीय कीमतों में पिछले 3 साल में लगातार गिरावट से सरकार व सरकारी क्षेत्र की कम्पनियों को फायदा हुआ है। तेल की कीमतों का ही असर है यूएई जैसे खाड़ी देश जो ‘कर के मामले में स्वर्ग देश’ माना जाता था 1 जनवरी 2018 से वैट लगाना पड़ा।

यह सही है कि मोदी सरकार ने रक्षा क्षेत्र में और मूलभूत इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में अभूतपूर्व समझौते किये हैं और बजट का एक बड़ा हिस्सा आबंटन किया है किन्तु स्टार्ट अप और मेक इन इंडिया कोई अप्रत्याशित बदलाव नहीं ला पाये यहाँ तक कि ये नोटबंदी और जीएसटी के नकारात्मक प्रभावों को भी भरपाई करने में असफल रहे हैं।

सरकार की आर्थिक मोर्चे पर लगातार घिर रही है। जिसका प्रमुख कारण औद्योगिक उत्पादन स्तर गिरना और जीडीपी में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा।सरकार का मुख्य ध्यान गरीब – किसान कल्याणकारी योजना ( अटल पेंशन, किसान फसल बीमा, जनधन योजना , प्रधानमंत्री आवास योजना इत्यादि) लाने में है परन्तु यह उतना सफल नहीं हो पा रहा है क्योंकि इन योजनाओं में निवेश आम जनता से अपेक्षित किया जा रहा है जो पैसे के अभाव में रूचि नहीं लेते।

सरकार को स्वास्थ्य व पेंशन बीमा अनिवार्य रूप सभी नागरिकों पर टीडीएस पद्धति ( आय के लेनदेन पर ही अंशदान की अनिवार्य कटौती) का उपयोग कर लागू करना चाहिए जिजिसमें सरकार भी कुछ ना कुछ अपनी तरफ से अंशदान करे जैसा प्रोविडेंट फंड में होता है।इससे गरीब वर्ग भी स्वास्थ्य बीमा द्वारा मनचाहा जगह इलाज करा सकेगा और बृद्धावस्था में जीविका हेतु एक निश्चित आय के प्रति आश्वस्त हो सकेगा जिससे सुरक्षा का पर्याय सरकारी नौकरियों की मारामारी भी कम होगी। उपरोक्त बीमा और पेंशन फंड पूंजी बाजार ( शेयर, डिबेंचर,बांड,म्यूचुअल फंड इत्यादि) में निवेश होगा और उस पूंजी बाजार (शेयर बाजार) का लाभ सिर्फ देश की कुल 73% सम्पदा वाले उन 1% लोगों को नहीं मिलेगा है बल्कि उपरोक्त सामाजिक सुरक्षा फंड के पूंजी बाजार निवेश से आनुपातिक रूप से समाज के हर वर्ग को फायदा मिलेगा।

सरकार का नोटबंदी और जीएसटी एक सराहनीय कदम है और आगे भी सरकार को बेनामी कानून जैसे अन्य कड़े कदम भी लागू करें परपरन्तु आंकड़े बताते हैं कि असंगठित क्षेत्र (छोटे-छोटे निजी क्षेत्र) में नौकरियां खत्म हुई है। सरकार को उपरोक्त दोनों निर्णय लागू करने से पूर्व इन नकारात्मक प्रभावों पर विचार करना चाहिए था।

1- किसानों हेतु एक महत्वपूर्ण सुझाव- जब मैं बचपन में कभी अपने गांव जगतपुर(गाजीपुर ) जाता था जिसका मैं प्रत्यक्षदर्शी भी हूँ और कई बार उपयोग भी किया है वहाँ दुकान पर खरीददारी करने हेतु लोग वस्तु- विनिमय प्रणाली ( बार्टर सिस्टम) का उपयोग करते थे अर्थात कृषि उत्पाद जैसे अनाज के बदले अपने दैनिक उपयोग औद्योगिक उत्पाद साबुन, बिस्किट लेते थे या कभी कभी निश्चित छोटी सीमा तक नकद भी लेते थे ।

आज कमोडिटी बाजार (अनाज इत्यादि का ट्रेड बाजार) में किसानों का इस तरह का कृषि उत्पाद के माध्यम से निवेश के योजना की जरूरत है जैसे कि पूंजी बाजार में पूंजी को छोटे- छोटे टुकड़ों में परिवर्तित कर शेयर के माध्यम से निवेश होता है वैसे कमाडिटी बाजार में गांव -गाव कमोडिटी निवेश केन्द्र के माध्यमसे किसानों को 1-1 किग्रा में अनाज निवेश का प्रस्ताव देकर उसके ट्रेडिंग की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि किसानों को कमोडिटीज मार्केट में उचित मनचाहा मूल्य प्राप्त हो सके व उनके पास जरूरत पर तरलता( लिक्विडिटी) अर्थात नकदी में परिवर्तित हो सके।मेरे ख्याल से किसान इसको सहर्ष स्वीकार करेगा व उसपर भार भी महसूस नहीं होगा।

2- एक निजी संस्थान के कर्मचारी जो मोदी सरकार प्रशंसक भी है उससे बात कर रहा था तो उसने बोला ” सरकार ..ला…ओं के पीछे नहा धोकर पड़ी है जब ला…….. ही नहीं रहेगें तो हमें नौकरी देगा कौन?”

3- जीएसटी आने से विभागीय भ्रष्टाचार पर नकेल कसी है परन्तु यह दिलचस्प है कि अप्रत्यक्ष करों (जीएसटी इत्यादि) का वहन कभी व्यापारी नहीं करता बल्कि उस सामान को उपभोग करने वाला अंतिम उपभोक्ता करता है और वह उपभोक्ता अमीर और गरीब हो सकता है चूँकि एक मनुष्य के जीएसटी के दायरे दैनिक उपयोगी वस्तुओं का उपभोग अमीर, उच्च और मध्यम वर्ग की लगभग समान और निम्न मध्यम थोड़ी कम तथा गरीब की काफी कम होती है।

4- जैसे जीएसटी से निसन्देह आगे व्यापार आसान होगा परन्तु इसके जटिलताओं से बड़े व्यापार पर फर्क नहीं पड़ा अलबत्ता छोटे व्यापारी परेशान दिखे। जैसे जीएसटी रिटर्न में बड़े-छोटे सभी के लिए अधिकतम जुर्माने का प्रावधान एक समान होना जो बड़े व्यापार के लिए नगण्य है परन्तु छोटे के लिए प्रासंगिक है।

5-कौशल विकास पर ध्यान देने के साथ उच्च शिक्षा प्राप्त (आईआईटी ,मेडिकल और आईआईएम व वित्तीय) पेशेवरों को प्रोत्साहन देने की जरूरत है जो स्टार्टअप (नये व्यापार स्थापना) की क्षमता रखते हैं जिससे रोजगार सृजन होगा और उन कौशल विकास के युवा लाभान्वित होंगे।

6- शैक्षणिक संस्थानों में पारम्परिक विषयों को एक सीमा तक प्रतिबंधित कर रोजगारपरक तकनीकी व व्यावसायिक विषयों का समायोजन हो। अभी 1 महीने पूर्व समाचारपत्र में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी कि पारंपरिक विषयों में देश में लगभग 3.5 करोड़ ग्रेजुएट हैं जो लगातार सरकारी नौकरी की आश में सरकारों पर अनशन द्वारा दबाव बनाते हैं।

7- और अंत में दिन भर राजनीतिक नफे नुकसान से परे हिंसात्मक खबरें,बलात्कार,राजनीतिक नोकझोंक डिबेट,किम जोंग, बाबाओं और सासबहू सीरियल की चटपटी खबरें दिखाने वाली मीडिया के बजाय कुछ समय आर्थिक व पूंजी बाजार के समाचार पर प्रोत्साहन हो।

लेखक- प्रैक्टिसिंग चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, मऊ जनपद के निवासी हैं और वर्तमान में दिल्ली स्थित एक फर्म में बतौर पार्टनर कार्यरत है यह इनके ये निजी विचार हैं।

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