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सरकार को रोज लाखों का चूना लगा रहे कचिया शराब के धंधेबाज, कभी भी हो सकता है भीषण हादसा

(अशोक जायसवाल)
◆ मधुबन क्षेत्र के बलिया-मऊ सीमा से प्रवेश पर मिलने लगती है सुगंध, सफेदपोशों का भी है संरक्षण

बिल्थरारोड/बलिया। वैसे तो कचिया शराब के धंधे का खेल बड़े पैमाने पर होता है लेकिन बलिया, मऊ व आजमगढ़ में इस अवैध शराब के धंधेबाज सरकार को रोज लाखों का चूना लगा रहे है। कचिया शराब के धंधेबाजों के चलते कभी भी शराब से होने बाले मौत का भीषण हादसा हो सकता है। वैसे तो प्रशासन कभी कभी इन अवैध कारोबारियों को पकड़ जेल भेजती है लेकिन आमदनी का ठोस आधार बना चुके मुख्य धंधेबाजों के गिरेबान तक पुलिस के हाथ नहीं पंहुच पा रहे हैं।
बलिया जनपद के बेल्थरा रोड क्षेत्र में कचिया शराब की बिक्री जारी है। बिना पोस्टर बैनर के अवैध रूप से बिक रही ताड़ी की आड़ में कचिया शराब को परोसा जा रहा है। किसी बड़ी दुर्घटना या दीपावली व होली जैसे त्योहारों के नजदीक आने पर ही पुलिस व आबकारी विभाग की तंद्रा भंग होती है तथा इसके खिलाफ अभियान देखने को नजर आता है। इस धन्धे को सफेदपोशों का वरदहस्त प्राप्त होने से भी इस पर कार्यवाही को लेकर अधिकारियों पर काफी दबाव सा रहता है। यही कारण है कि तमाम अभियानों के बावजूद इस अवैध कारोबार पर अबतक अंकुश संभव नही लग सका है।
मऊ जिले से बलिया के बार्डर बिल्थरारोड में प्रवेश करने के साथ ही कच्ची शराब की कथित खुश्बू की सुगंध मिलने लगती है। मऊ-बिल्थरारोड बार्डर के किनारे बसे गांव के खेतों, झाड़-झंकार आदि कचिया शराब बनाने का सुरक्षित स्थान बन चुका है जो अब एक कुटीर उद्योग का रूप में परिवर्तित हो चुका है। इसके खिलाफ पुलिस व आबकारी टीम के संयुक्त अभियान के दौरान ये सच कई बार सामने आता रहा है। फरही नाले के किनारे चलने वाली आधा दर्जन से अधिक शराब की अवैध भट्ठियों से बनी कच्ची शराब की आपूर्ति बड़े पैमाने पर क्षेत्र के गांव-गांव, गली-गली में की जाती है। इस अवैध कारोबार का मामला किसी अनहोनी के बाद ही प्रकाश में आता है। क्षेत्र के चंदायरकला, टंगुनिया, सोनाडीह, महुआतर, ससनाबहादुरपुर, अखोप, मलेरा, चरौंवा शंकरपुर ठकुरहीं, कुण्डैल, बाराडीह, शाहपुरअफगां सहित दो दर्जन गांवों में कच्ची शराब आसानी से लोगों तक पहुंच रही है। अधिकांश ईंट-भट्ठों पर तो यह कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है। यह सच आबकारी टीम के छापेमारी के दौरान कई बार साबित भी हो चुकी है। फिलहाल वर्तमान समय में ताड़ी बेचने की आड़ में इसका धन्धा जारी है। आश्चर्य यह है कि क्षेत्र में बिना किसी बैनर व बोर्ड के अवैध ताड़ी की धड़ल्ले से विक्री जारी होने के बावजूद आबकार व पुलिस विभाग की नजरें इस तक नही पहुंच रही है।
शाहपुर अफगां में महिला-मोर्चा का अभियान भी अवैध शराब पर रोक लगाने में असफल साबित हुई थी
कच्ची शराब के धंधों को गांव में फलता फूलता देखकर पूर्व में शाहपुर अफगां की महिलाओं ने एक मोर्चा बनाकर इसके विरूद्ध जबरदस्त अभियान चलाया था। उनके इस अभियान से अवैध शराब कारोबारियों में हड़कम्प मच गया था। इसके चलते इस कारोबार पर थोडा़ अंकुश तो लगा मगर पुलिस-प्रशासन के असहयोग के चलते वे पुनः सक्रिय हो गये। नगर के वार्ड नं0 5 का एक मुहल्ला तो कईता गली के रूप में ही प्रसिद्ध हो चला था। इस मुहल्ले में अवैध शराब बंद कराने को लेकर पूर्व विधायक गोरख पासवान की भी अगुवाई में अभियान चलाया गया था। आज काफी हद तक इस मुहल्ले में कचिया पर ब्रेक तो लगी है परन्तु अभी भी इसे पूर्ण रूप से बंद नही किया जा सका है।
सम्बन्धित अड्डों पर ऐसे पहुंचायी जाती है अवैध शराब
सूत्रों की माने तो भोर में 4 व 5 बजे के बीच अवैध शराब की आपूर्ति का कार्य होता रहा है। अवैध शराब को या तो गैलनो, दूध के बाल्टों, वाहन के ट्यूबों आदि में भरकर कारों व बाइक के माध्यम से सम्बन्धित अड्डों पर पहुंचाया जाता है। पूर्व में पुलिस द्वारा चलाये गये अभियान के तहत इस तरह सप्लाई का सच भी कई बार सामने आ चुका है।
ऐसे बनता है ”झरिया ब्रांड”
इस धंधे में लिप्त बिहार व झारखण्ड के तमाम आदिवासी क्षेत्रों से आने वाले भूखमरी व बेकारी से त्रस्त मजदूरों को कुछ सम्पन्न लोगों द्वारा करार के तौर पर कुछ धनराशि पहले ही मुहैया करा दी जाती है। बाद में इन्हें विभिन्न स्थानो के ईंट-भट्टों पर काम में लगा दिया जाता है। इनका आर्थिक व शारीरिक शोषण ही इन्हे कच्ची शराब बनाने के धन्धे में ढकेलती है। इनके द्वारा तैयार किया जाने वाला कचिया शराब एक नये कलेवर ”झरिया ब्रांड” के रूप में अवतरित होती है। ऐसा इसलिए कि इनमें से ज्यादा झारखण्ड के झरिया से ताल्लुक रखते है।
मात्र 10 से 20 रूपये में होती है उपलब्ध
कच्ची शराब बनाने में यूरिया के साथ ही गुड़, फिटकिरी व नौसादर जैसे रसायनो की भी भूमिका होती है। मात्र 10 से 20 रूपये में एक बोतल मिलने वाले मौत के इस जहर के चाहने वाले मजदूर वर्ग ही नही बल्कि युवा भी बहुतायत में होते हैं। इसके चलते पारिवारिक कलह के साथ ही महिलाओं का अकेले गांव में निकलना भी सुरक्षित नही रह गया है। क्षेत्र में बेरोकटोक चलने वाले इस धन्धे पर कभी-कभार आबकारी व पुलिस विभाग का छापा भी इसे रोकने के लिए पर्याप्त साबित नही होता।
तथाकथित सफेदपोसों का प्राप्त है संरक्षण
इस धंधे को पुष्पित-पल्वित करने में तथाकथित सफेदपोसों की भूमिका भी महती रोल अदा करती है। कुछ पुलिसकर्मियों से भी इनके सम्बन्ध से इंकार नही किया जा सकता है। धन्धे के खिलाफ अभियान चलाये जाने पर सबसे ज्यादा इन्हे ही परेशानी होती है। छापे के दौरान चहेतों के पकड़े जाने पर छापेमारी टीम में शामिल अघिकारियों के मोबाइल पर तथाकथित सफेदपोसों के फोन घनघनाने लगतें है। कभी-कभी तो दबाव इस कदर होता है कि विभाग को यह कह कर कार्यवाही करने की मजबूरी आ जाती है कि मीडिया में यह मामला उछल चुका है अतः हम कुछ नही कर सकते। इस धन्धे के खिलाफ कार्यवाई के मामलों में कभी अधिकारी तो कभी सफेदपोस बीस साबित होते रहते हैं।
पुलिस व आबकारी की संयुक्त छापेमारी के दौरान सामने आती रही है सच्चाई
पुलिस व आबकारी टीम के संयुक्त छापमारी के दौरान क्षेत्र के अनेक ईंट-भट्टों पर बन रहे कचिया शराब का सच सामने आता रहा है। पूर्व में कई छापों के दौरान संयुक्त टीम द्वारा इसका भंडाफोड़ भी हो चुका है। परन्तु इस धन्धे पर आज भी पूर्ण रोक संभव नही हो सका है।

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