शब्द मसीहा : सिर्फ मर्द हैं
“साहब ! आज जाना नहीं है घर ?”
“नहीं , अभी समय लगेगा . कुछ काम बाकी है . वैसे भी घर अब कैसे जाएँ …पैसा जो चाहिए .”
उसे पत्नी के वे बोल याद आ रहे थे जब उसने कहा था कि कुछ भी करो पर मेरी हर इच्छा पूरी करो . वह जुट गया था बिजनेस में . किराए के घर से अपना घर हुआ . छोटे घर से बड़ा घर हुआ और अब उसके बाल पाक गए थे.
“साहब ! बुरा मत मानिए ….पर रात बहुत हो गयी है . मेरी घरवाली इंतज़ार करती होगी घर में .”
“ठीक है , अभी ड्राइवर आता होगा फिर तुम चले जाना .”
कुछ ही देर बाद ड्राइवर के साथ एक लड़की थी जिसे उसने साहब के कमरे में भेज दिया . ड्राइवर चपरासी को देखकर मुस्काया .
“क्या ले आये ?”
“साहब का मन था …घर चाहिए था …एक रात का .”
“ओह ! दो दिन नहीं रुक सके विनीता मेडम के बिना . सही सजा मिली है इनको पैसा कमाने की .”
“क्यों भाई ! क्या वो भी देर तक रूकती है .”
“हा हा हा …कोरपोरेट बीबी है वो . सालभर में अपना घर हो गया है उसका .”
“और जो साहब की है ?”
“वो तो दिखावे की नेम प्लेट है जिसे नोटों से चमकाते रहते हैं …छूते कभी नहीं…छूते तो बच्चे के बाप न होते …सिर्फ मर्द हैं …खसम नहीं .”
शब्द मसीहा

