Uncategorized

शब्द मसीहा- लघुकथा : नौकरानी नहीं हो

“अरे! उठो जरा . अब तुम कब तक सोते रहोगे !” पत्नी ने पति को जगाते हुए कहा .

“क्या यार ! अभी तो जरा-सा चैन मिला है . पैंतीस साल से भाग-भागकर इस घर को बनाया . बच्चों को बड़ा किया . अब रिटायर हो गया हूँ. कुछ तो आराम कर लूँ.” पति बोला .

“कोई अहसान नहीं किया है तुमने . अहसान तो बच्चों ने किया है . उन्होंने हमें माँ-बाप बनाकर . उठ जाओ ! घर का कुछ काम करते हैं मिलकर . बेकार चीजें घर में कबाड़ बढ़ाती हैं .” पत्नी बोली .

“कैसी सठियाई सी बात कर रही हो तुम !” पति झुंझलाते हुए बोला .

“हा हा हा ….सठियाई नहीं …बेहयाई भरी कहिये . कानों से सुना है मैंने कि पापा को हमारा ख्याल नहीं है अपनी रिटायरमेंट पर खूब खर्चा कर दिया . अब बोझ तो हमारे ही कन्धों पर आयेगा . अपनी शान के लिए सबको कुछ न कुछ दिया और हमारे लिए बस कपड़े ला कर बेबकूफ बना दिया . सब चले गए पर हम तो अब उम्रभर ढोयेंगे इन्हें .” पत्नी ने नजरें नीचे करते हुए कह दिया .

“ओह ! ऐसा है . कोई बात नहीं हम किसी पर बोझ नहीं बनेंगे . इस घर को बेच देते हैं और उन्हें चौथाई रकम सौंप देते हैं , चौथाई रकम बेटी को . हम दो हिस्से लेकर देहरादून चलते हैं . वहाँ के एक लड़के का खर्चा मैंने उठाया है . अब वह नौकरी करता है और हमारे साथ रहना चाहता है . वो मेरा कुछ नहीं है पर बाप मानता है . मुझे कुछ देर सोने दो . तुम भी कोई नौकरानी नहीं हो . माँ हो उसकी.” उसने पत्नी का हाथ खींच अपने पास लिटा लिया जैसे अभी-अभी शादी हुई हो .

(लेखक- केदारनाथ शब्द मसीहा दिल्ली रेलवे विभाग में इंजीनियर हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *