शब्द मसीहा की कहानी : वो मुझे साला कहता था
( शब्द मसीहा केदारनाथ )
सुनसान पड़ी गली में वह औरत तेजी से चली जा रही थी। दो महीने हो गए थे उसके घरवाले को मरे हुए। कहते हैं कि उसने बहुत सारा अपना सामान भी जो गैर जरूरी था, अपना घर चलाने के लिए बेच दिया है।
“देखो तो जरा कैसा बन ठन कर जा रही है….छिनाल।“ बालकनी में खड़ी पत्नी बोली।
“तो तुम्हें क्या, उसकी अपनी ज़िन्दगी है, उसे वो चाहे जैसे जिये!”
“बात वो नही है, जो तुम समझ रहे हो ? जो बात है, मुझे लगता है कि मैं अच्छे से जानती हूँ।” पत्नी बोली।
“तो फिर बताती क्यों नही कि बात क्या है?”
“अरे! जैसे तुम्हें तो कुछ पता ही नही है। उस रोज़ तुम्हीं तो ज़िक्र रहे थे कि तुम्हारे दोस्त चर्चा कर रहे थे हफ्ताभर पहले कि वह औरत बिगड़ चुकी है।“ पत्नी ने कहा।
“हाँ, शायद ऐसा कुछ कहा तो था , एक दो जगह चर्चा भी की , तब पता चला कि वह शरीफ औरत है, शौहर के अचानक चले जाने के बाद मासूम बच्चे की परवरिश, जवान ननद और बुढ़ी बीमार सास की जिम्मेदारी है उस पर, कोई भला काम नही मिला नहीं और अपना कहने वाला कोई मदद को आया नहीं।“
“बस…. बस रहने दो, मैं सब जानती-समझती हूँ, इस औरत जात को, महामारी के दौर में सबके काम बंद है ? अगर कोई काम नहीं मिला, तो इसका मतलब ये तो नहीं है कि गैर मर्दो का दिल बहलाने लगे, भला आबरू से बड़ी कोई चीज होती है।“ पत्नी ने मुँह बनाते हुए कहा।
“तुम आखिर कहना क्या चाहती हो ?”
“अरे! गैरतदार थी वो , जिसने विकलांग ससुर और घर की जिम्मेदारी ली थी अपने ऊपर, मगर उसने इज्जत बेचने के बजाए मौत को गले लगा लिया, सबको ज़हर देकर, ख़ुद भी खा लिया था। सारा मुहल्ला उसकी तारीफ़ करता फिरता है। और एक ये नासपीटी है, जो पूरे गली मोहल्ले का नाम डुबो रही है अपनी काली करतूतों से । आज हराम की जनी बाहर जा रही है, कल को घर पर बुला कर धंधा करेगी। तुम्हीं बताओं हमारे बाल-बच्चों पर इसका क्या असर पड़ेगा? मेरी सारी सहेलियां और मुहल्लेभर के बड़े बुर्जुग कह रहे हैं कि ये अब बदनामी का कारण बनेगी, इसलिए इस बदनामी को मुहल्ले से बाहर कर देना चाहिए। इसका अब यहाँ हम शरीफ लोगों के बीच रहना ठीक नहीं है।“ पत्नी ने अपने दाँत पीसते हुए उसके चरित्र का बखान किया।
“अपने मुहल्ले के नाम की इतनी चिंता है सबको, अगर ऐसा है तो तुम्हारी सारी सहेलियाँ मिलकर उसके घर में छह महीने का राशन भर कर उसे सिलाई वैगरह कोई ट्रेनिंग क्यो नही दिला देतीं? जिससे वह अपना घर चला सके , पानी बिजली का बिल भर सके। सब लोगों को कहानियाँ बनाकर मजा लेने के अलावा भी कुछ आता है क्या?“
“तुमको बक बक करने के सिवाय कुछ आता भी है….. किसी के पास पैसा नहीं है, तो क्या उसे चोरी करने का लाइसेंस मिल जाता है ? इसी का पाप रहा होगा जो इसका जवान हट्टा-कट्टा शौहर मर गया, और इस हरामजादी ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये, तुम शायद भूल गए कुछ महीने पहले , मुहल्ले की शरीफ औरतों से कचड़ा फेंकने जैसी मामूली-सी बात के लिए कितना लड़ी थी? और भी किस्से हैं, सबको सुनाऊँ क्या ?” पत्नी के अंदर जैसे छुपी हुई औरत निकल आई थी।
“तो ये कहो न कि असली बात कुछ और है!”
“तुम कुछ भी कहो, अब बदनामी के घर को मुहल्ले में पलने नही देना है। नहीं तो ज़ख्म को नासूर में बदलते देर नही लगती।“ पत्नी ने फिर से अपनी बात का समर्थन किया।
“सही कहती हो तुम, औरत ही औरत की दुश्मन होती है।“
“क्या मतलब है तुम्हारा ?” पत्नी ने बिगड़ते हुए कहा।
“वही, जो अभी तुमने कहा। तुमने मेरे ज़ख्म को नासूर में बदल दिया है। मेरे दिल के अंदर तुम्हारे डर से जो फूल नहीं खिल सके थे , वो अब खिल गए हैं। उसके शौहर का मुझ पे भी कर्ज़ है।“
“हाय अल्लाह ! तुम पर और उसका कर्ज़?” पत्नी ने हैरत से आँखें फाड़ते हुए कहा।
“हाँ, वो मुझे साला कहता था, और इस नाते से वो तुम्हारी ननद और मेरी बहिन हुई । मैं उसे वापिस लाने जा रहा हूँ । वैसे वो धंधा करने नहीं औरतों का चेहरा सँवारने जाती है …ब्यूटीशियन है। तुम्हारे तानों ने एक भाई की गैरत को जगा दिया है, और ख़बरदार!….. जो आज के बाद उसकी शान में कोई गुस्ताख़ी की, आज से वो हमारी है ….हमारे खानदान की है।“

