लद्युकथा : मैं गिरा हुआ नहीं हूँ
(केदारनाथ शब्द मसीहा)
अभिनव स्कूल बस से उतर अपना बैग सम्हालकर अपनी बैसाखियों के सहारे एक और खड़ा हो गया . उसके पापा उसे लेने आने वाले थे . उसकी निगाह रोड पर आते वाहनों पर लगातार बनी हुई थी . आज धूप भी बहुत तेज थी . अभिनव बारहवीं कक्षा का छात्र था .
चीं की आवाज से एक बस रुकी . एक महिला उतरीं और उतरते ही वह लड़खड़ाकर गिर पड़ी . लोग बस से उतरे और आगे बढ़ गए . अभिनव को न जाने क्या हुआ कि वह आगे बढ़ा और अपना सीधा हाथ आगे कर दिया . महिला ने उसका हाथ पकड़ लिया . अभिनव ने अपनी ताकत के बल पर उन्हें खड़ा कर दिया .
“मेडम ! आप उधर बैठ लीजिये . आज गर्मी बहुत है .” उन्होंने अपना पर्स सम्हाला और उसके साथ बस स्टेंड पर बैठ गयीं .
“मेडम ! आप पानी पी लीजिये . मैंने झूठा नहीं किया है .” अभिनव ने अपने बैग से बोतल निकालकर आगे कर दी . यद्यपि चक्कर महसूस हो रहे थे पर इस आत्मीयता ने मुस्कान ला दी थी चेहरे पर . उन्होंने पानी पीने के बाद धन्यवाद किया .
“बेटा ! आप अपनी कमजोरी जानते हुए भी मेरी मदद को आगे आये . बहुत बड़ा दिल है आपका . आपके संस्कार बहुत अच्छे हैं . आजकल आपने देखा ही कि लोग मदद नहीं करते हैं .” मेडम बोली .
“मैं जानता हूँ कि गिरने की पीड़ा क्या होती है मगर मैं गिरा हुआ नहीं हूँ . मुझसे ज्यादा इस तकलीफ को कौन जानता है !” अभिनव बोला .
तभी उसके पापा भी आ गए और वह मुस्कुराते हुए स्कूटी पर बैठ चला गया जीवन का अनमोल सबक देता हुआ .
(लेखक दिल्ली रेलवे विभाग में इंजीनियर हैं)
