अपना जिला

यही जय-विजय, बस कुर्सी है

किस्सा कुर्सी का…
आनन्द कुमार

जाति न पूछो कुर्सी का,
खेल न पूछो कुर्सी का,
गजब रोल है धरती पर,
अजब खेल है कुर्सी का।

सियासत के सियासतदारों की,
ऐसा ही कुर्सी का किस्सा है,
जिस्म अलग है बस इनका,
कुर्सी इनका हिस्सा है।

मनभेद है बस कुर्सी पर,
चाहत सबकी कुर्सी है,
रहे सलामत इनकी कुर्सी,
आपस में इतनी फुर्ती है।

हमको-तुमको उलाझकर,
नफरत की आग में झुलसाकर,
प्यार ही इनका कुर्सी है,
आधार ही सबका कुर्सी है।

आहत हम-तुम हो जाएं,
मतलब नहीं इनको इससे,
रहे सुरक्षित कुर्सी इनका,
यही जय-विजय, बस कुर्सी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *