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तहसील में बना शौचालय ही स्वच्छता अभियान को दिखा रहा आईना

बिल्थरारोड / बलिया । स्वच्छता को लेकर गंभीर सरकार को उसके कर्मचारियों का ही सहयोग मिलता नजर आ रहा है। एक तरफ स्वच्छता को लेकर केन्द्र व राज्य सरकार नित नये अभियान चलाकर लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रही है। तथा गांव-गांव में शौचालयों का निर्माण कर रही है। वहीं दूसरी तरफ स्थानीय तहसील में बना
शौचालय ही उनके स्वच्छता अभियान को आईना दिखा रहा है। जिससे प्रशासनिक अधिकारियों की इस अभियान के प्रति गंभीरता का आकलन किया जा
सकता है।
भारत सरकार स्वच्छता अभियान को लेकर काफी गंभीर है। वर्तमान समय में स्वच्छता पखवारा के तहत अलग-अलग स्थानो पर सफाई अभियान चलाया जा रहा है। सरकार की मंशा स्वच्छता के माध्यम से बीमारियों को दूर भगाने की है। इसलिए आज सरकार की तरफ से शौचालयों के निर्माण के लिए लोगों को पैसे भी दिये
जा रहे है। एक तरफ स्वच्छता के प्रति जागरूकता का काम किया जा रहा है तो दूसरी तरफ स्थानीय तहसील में 26 फरवरी 2008 को तत्कालीन जिलाधिकारी मयूर
माहेश्वरी व उपजिलाधिकारी नंदलाल यती द्वारा उद्घाटित महिला एवं पुरूष शौचालय अधिकारियों की उपेक्षा का शिकार बन चुका है। हालत यह है कि शौचालय के आसपास जहां कूड़े के अंबार लगे हुए हैं वहीं शौचालय के
अंदर लगे टायल्स, बेसिन सहित अन्य समान अधिकारियों की उदासीनता के चलते टूट-फूट चुके है। जिसके चलते यह वर्तमान समय में उपेक्षा का शिकार होकर प्रचलन से बाहर हो चुका है। यही नही तहसील परिसर में बना शौचालय भी साफ सफाई के बिना दुर्गन्धयुक्त हो चुका है तो कुछ पर विभागीय अधिकारियों के ताले लटक रहे हैं। यही कारण है कि लोग तहसील परिसर की बाउन्ड्री की दीवारों पर ही लघुशंका का समाधान करते नजर आ जाते हैं।
तहसील के शौचालयों की स्थिति देख कर ये कहावत अवश्य जेहन में आता है कि चिराग तले ही अंधेरा शायद इसी को कहा जाता है। जब अधिकारी अपने घर की ही सफाई नही करा सकते तो आसानी से समझा जा सकता है कि क्षेत्र में वे स्वच्छता अभियान के प्रति कितने जागरूक हैं। देखना है कि आगे अधिकारियों की सफाई के प्रति जागरूक होते हैं या फिर वे इसके प्रति वैसे
ही लापरवाह बने रह कर सिर्फ कोरम ही पूरा करते हैं। ये तो आने वाला समय ही बतायेगा।

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