जयंती विशेष : युगो-युगो तक नहीं भूलेंगे पं अलगू राय शास्त्री
(गुंजन राय)
अमिला/मऊ। राजनीति, साहित्य, कला तथा समाज सेवा के निपुण एवं निर्भय पुरोधा पं अलगू राय शास्त्री का जन्म 29 जनवरी 1900 को अमिला में एक गरीब भूमिहार ब्राह्मण परिवार में द्वारिका राय के यहाँ हुआ था। जन्म के पश्चात ही परिवार के अलग होने के कारण इनका नामकरण अलगू हुआ। बेहद गरीबी में भी जबरदस्त राजनीतिक एवं सामाजिक उत्साह के चलते हरिश्चंद्र कालेज सहित काशी विद्या पीठ की शिक्षा में राष्ट्र भावना से ओतप्रोत होकर 1920 में देश की आजादी की लड़ाई में भाग लेकर प्रथम जेल यात्रा करते हुये महत्वपूर्ण भूमिका निभाया।
पहला असेम्बली चुनाव 1937 में आजमगढ़ से विधान सभा जीता।स्वतंत्रता के उपरांत प्रथम आम चुनाव में भी आपने जीत हासिल किया। 1955-56 में राज्यसभा से सदस्य निर्वाचित होकर 1958 में त्यागपत्र दे उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हुये। 1960 में उत्तर प्रदेश के वन मंत्री के रूप में रहते हुए वनों के विकास एवं सुरक्षा हेतु महत्वपूर्ण कार्य किया। संविधान सभा के सदस्य के रूप में हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने में विषेश योगदान कर आपका संविधान सभा मे 35 मिनट का वाचन राष्ट्र भाषा के लिये विशेष महत्व रखता है ।जीवन के अंतिम समय तक समाज सेवा, जमीदारी उन्मूलन, हरिजनउद्धार कृषक वर्ग हेतु सदैव तत्तपर रहते हुए समाज के उत्थान के लिये अनवरत प्रयत्न किया।
आर्य समाज मे अटूट निष्ठा एवं देश प्रेम के प्रति नवयुवकों को प्रेरणा देकर पराक्रमी एवं वीर बनने हेतु प्रोत्साहित करते रहे। बाह्य आडम्बरोंसे दूर रहकर बेहद गरीबी और सादगी में रहते हुए पत्नी एवं पुत्र वियोग का दुःख झेला। जीवन भर संघर्ष करते हुए इस प्रकाश पुंज नक्षत्र ने 12 फरवरी 1967 को सदैव के लिये अस्त हो गया। पूर्वांचल की माटी युगों युगों से ऐसे महान विभूतियों की जननी रही है जिन्होंने अपने विचार एवं कर्म की अनिवार्यता से सर्वजन की पीड़ा को दूर करने हेतु अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

