रचनाकार

कहानी : कोरोना राक्षस

( पुष्पा कुमारी “पुष्प” )

“बेटा! जरा देख कर बताना। मेरे खाते में पैसे आ गए क्या?” उस वृद्धा ने कांपते हाथों से अपने साथ लाए झोले में से पासबुक निकालकर काउंटर पर रख दिया।
वह पिछले कुछ महिनों में बैंक के इतने चक्कर लगा चुकी थी कि सामने काउंटर पर मौजूद शख्स भी अब उसे अपना कोई जान-पहचान वाला ही लगने लगा था।
“अम्मा! मैंने आपको अगले हफ्ते आने को बोला था।”
सुबह-सुबह अम्मा को देख काउंटर पर मौजूद शख्स ने पासबुक उठा अम्मा का अकाउंट चेक करते हुए याद दिलाया।
“बेटा! एक बार देख लो। शायद आ गए होंगे।”
“नहीं अम्मा! कोई रुपए नहीं आए हैं।”
अम्मा का पासबुक वापस काउंटर पर रखते हुए वह अपने कंप्यूटर के स्क्रीन पर व्यस्त हो गया।
“बेटा तुमने ठीक से तो देख लिया ना!” अम्मा ने एक बार फिर से काउंटर पर मौजूद शख्स की ओर बड़े उम्मीद से देखा।
“जाओ अम्मा! रोज-रोज ना आया करो। अब सीधे अगले महीने आना।”
उस शक्स की बात सुन गहरी निराशा के साथ वह अपना पासबुक उठा झोले में रख वापस मुड़ी और मोबाइल पर बात करते हुए बैंक के भीतर प्रवेश करते एक नौजवान से टकरा कर गिर पड़ी।
“ओह! आपको कहीं चोट तो नहीं लगी?” उस नौजवान ने अपना सूटकेस बगल में रख फुर्ती से अम्मा को उठाया। तब तक काउंटर पर मौजूद शख्स भी अपना काम छोड़ तेजी से भागकर वहां तक आ पहुंचा।
“नहीं बाबू! कोई चोट नहीं लगी।” झोला संभाल अम्मा उठ खड़ी हुई।
“अम्मा का काम हो गया?” काउंटर पर मौजूद शख्स से बैंक के सीनियर सिटीजन ग्राहक के काम का जायजा लेना शायद उस नौजवान ने अपना कर्तव्य समझा।
“सर! अम्मा अपने अकाउंट से पैसे निकालने आई थी किंतु पैसे अभी आए नहीं हैं।” काउंटर पर मौजूद शख्स के हाव-भाव से अम्मा समझ गई कि सामने खड़ा नौजवान उस बैक के किसी बड़े ओहदे का मालिक है।
“लेकिन वृद्धा पेंशन तो पिछले हफ्ते ही सभी के अकाउंट में डाल दिए गए हैं।” उस नौजवान ने काउंटर पर मौजूद शख्स की ओर सवालिया निगाहों से देखा।
“नहीं,.नहीं बाबू! वृद्धा पेंशन नहीं चाहिए। मेरा बेटा रुपए भेजता है।” अम्मा का स्वाभिमान देख वह नतमस्तक हुआ।
“अच्छा!अच्छा! तो अभी तक रुपए नहीं आए?”
“सर! पिछले छ: महीनों से अम्मा के अकाउंट में कोई रुपया नहीं आया है लेकिन अम्मा रोज बैंक पहुंच जाती हैं।”
“आप मुझे अपना पासबुक दिखाइए।”
“देखिए ना बाबू!” अम्मा ने फिर से अपने कांपते हाथ झोले में डालकर लगभग चिथड़ा बन चुका पासबुक उसके हाथ में दे दिया। उसने उलट-पुलट कर देखा अम्मा के पासबुक में पिछले छ: महीनों को छोड़कर हर महीने के दो तारीख को दो हजार रूपए नियमित रूप से भेजे गए थे।
“अब आपका बेटा रुपए नहीं भेजता तो आप वृद्धा-पेंशन के लिए आवेदन क्यों नहीं देती?” उस अजनबी अम्मा के लिए उसे थोड़ी चिंता हुई।
“नहीं बाबू! मां-बाप खैरात पर पले यह मेरे बेटे को पसंद नहीं।” यह सुन उस बुढ़ी अम्मा के प्रति उसके दिल में सम्मान दुगना हो गया।
“लेकिन अब वह रुपए भी तो नहीं भेजता! आपकी जिंदगी कैसे चलेगी?”
“जिंदगी तो चल रही है बाबू! लेकिन एक ही गम है कि अब उससे बात नहीं हो पाता और ना ही उसका कोई हाल-चाल ही मिल पाता है।”
“आपके पास उसका कोई मोबाइल नंबर है?”
“इसी खाते में लिखा है बाबू! लेकिन सरपंच कहते हैं अब उस पर बात नहीं हो सकता।”
“क्यों?”
“वह नंबर बंद हो गया है।”
“अच्छा! आप यहीं बैठिए। मैं देखता हूं।”
वह अम्मा का पासबुक लिए अपने केबिन के भीतर चला गया।
मुश्किल हालात में भी अम्मा में मौजूद स्वाभिमान से प्रभावित होकर उस स्वाभिमान को जस का तस बरकरार रखने के लिए अपनी अच्छी-खासी तनख्वाह में से हर महीने दो हजार रूपए अम्मा के अकाउंट में डालना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। थोड़ी देर बाद वह बाहर आकर बेचैनी से इंतजार करती उस अम्मा से मुखातिब था।
“अम्मा! आपके बेटे की नौकरी छूट गई थी इसलिए वह आपको इतने दिनों तक रुपए नहीं भेज पाया लेकिन अब उसे नौकरी मिल गई है! अगले महीने से वह आपको रुपए जरूर भेजेगा।”
“बाबू! उसे मना कर दीजिए रुपए ना भेजें! बस पहले की तरह कभी-कभी सरपंच के मोबाइल पर फोन कर अपना हाल-चाल मुझे बता दिया करें।” अम्मा के चेहरे की निराशा थोड़ी कम हो गई और यह देख उसे खुशी हुई।
“ठीक है अम्मा! आप मुझे सरपंच का नंबर दे दीजिए।”
“मेरे बेटे के पास सरपंच का नंबर है बाबू!” अम्मा की बात सुन वह कुछ सोच कर चुप हो गया और पासबुक अम्मा को वापस कर अपने केबिन की ओर वापस मुड़ा।
“बाबू! आप मेरा एक काम कर दोगे।” अम्मा ने उसे टोका।
“हां! कहिए।”
“बाहर मेरा आदमी बैठा है!आप एक बार उससे भी कह दो कि आपकी मेरे बेटे से बात हो गई है।”अम्मा ने उसके सामने हाथ जोड़ें।
“लेकिन यह बात तो आप भी कह सकती हैं।”
“वह मेरी बात पर विश्वास नहीं करेगा।”
“क्यों?”
“वह कहता है कि हमारा बेटा मर चुका है!”
“क्या?” उसके पैरों तले मानो जमीन ही खिसक गई।
“हाँ! वह कहता है कि कोई #कोरोना_राक्षस हमारे बेटे को खा गया।”
यह कहते-कहते अम्मा अपने पति के झूठी जानकारी के प्रति तैश में आ गई और अब तक अम्मा के प्रति सहानुभूति में झूठ बोलता वह सच्चाई समझ नि:शब्द हो गया।

लेखिका पुष्पा कुमारी “पुष्प”, पुणे (महाराष्ट्र) की रहने वाली हैं।

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