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UP : ये ब्रेकिंग न्यूज़ है, और क्या-क्या ब्रेक होता है, देखना दिलचस्प होगा

■ डॉ. अम्बरीष राय

क्या ये भाजपा में मोदी युग के अवसान की आहट है या फिर नरेन्द्र दामोदर दास मोदी भगवा ब्रिगेड में ठिकाने लगाए जा रहे हैं? क्या इसके पीछे संघ भाजपा के वो चेहरे हैं, जो मोदी जैसे वटवृक्ष के सामने बोनसाई बनकर रह गए हैं? और अपने अस्तित्व की रक्षा और अपनी महत्वाकांक्षा के चलते एक क्षत्रप को पीछे से ऊर्जा दे रहे हैं? या फिर मौन मोदी भाजपा में एक सफाई अभियान की पटकथा लिख रहे हैं? दरअसल ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि पिछले चार महीने से योगी मंत्रिमंडल में मोदी मैन ए के शर्मा की डिप्टी सीएम बनने की दावेदारी बस दावेदारी बनकर रह जा रही है. भारत की सबसे ताक़तवर जगह पीएमओ से लखनऊ आए ए के शर्मा अपनी भूमिका नहीं निभा रहे हैं. ए के शर्मा की हालत उस बैट्समैन जैसी है, जिसे चयन समिति ने टीम में चुन तो लिया है, लेकिन टीम के कप्तान ने उसे ट्वेल्थ मैन बनाकर छोड़ दिया है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्व आईएएस ए के शर्मा को जिस तरह से उपेक्षित कर रखा है, वो ये बताता है कि क्षत्रप इतना मजबूत हो चुका है कि उसे दिल्ली की ज़रा भी परवाह नहीं है. पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल मध्य प्रदेश के अपने नियमित कार्यक्रमों को छोड़कर लखनऊ पहुंची तो लगभग मान लिया गया कि योगी सरकार का आखिरी मंत्रिमंडल विस्तार आकार लेने वाला है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उसी दिन शाम को राज्यपाल से मिलने पहुंचे. लेकिन अधिकृत बयान सामने यह आया कि यह एक नियमित मुलाक़ात से ज़्यादा कुछ नहीं थी. राज्यपाल मुख्यमंत्री मिलते रहते हैं. लेकिन सच तो कुछ और है. और वो सच बस इतना है कि योगी ने मोदी मैन को अपनी टीम में लेने से इनकार कर दिया. पंचायत चुनावों में खराब प्रदर्शन की ज़िम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं है. पंचायत चुनाव में समाजवादी पार्टी से पिछड़ी भाजपा पंचायत चुनावों को सार्वजनिक रूप से ज़रा भी महत्व नहीं दे रही है. लेकिन अंदरखाने उसे पता चल चुका है कि मौजूदा राजपाट ख़तरे में है. और अब गोली देने से काम नहीं चलने वाला है. ख़तरे की इसी आहट को भांपते हुए वो परिवर्तन के अप्रिय रास्ते पर जाने को मजबूर है. उसे मालूम है कि अब बिना सर्जरी के स्वास्थ्य ठीक होने से रहा. लेकिन योगी आदित्यनाथ सर्जरी तो दूर गोली से भी इनकार कर रहे हैं. दिल्ली की मंशा के विपरीत योगी आदित्यनाथ नाथ हठ कर बैठे हैं. “एको अहं द्वितीयो नास्ति” की तर्ज़ पर योगी मोदी मैन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.

अपनी योग्यता और प्रतिभा से देश विदेश में लोहा मनवाने वाले एके शर्मा से योगी आदित्यनाथ को क्या परेशानी है, समझना मुश्किल भी नहीं है. कोरोना की दूसरी लहर में जब मौतों का तांडव शुरू हुआ तो प्रधानमंत्री का संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी कराह उठा. एके शर्मा वाराणसी पहुंचे. दिल्ली ने सीधे वहां के अधिकारियों को फ़रमान सुनाया कि बॉस शर्मा जी हैं. आदेश का पालन किया जाए. शर्मा जी ने अपने कुशल प्रबंधन से महामारी के बेलगाम घोड़े को लगाम लगा दी. शर्मा जी ने वाराणसी सहित पूरे पूर्वांचल को कोरोना संकट से उबारने में जी जान लगा दी और क़ामयाब भी रहे. प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी मॉडल की सार्वजनिक प्रशंसा भी की. अब ऐसा व्यक्ति लखनऊ के सत्ता गलियारे में आ गया तो क्या क्या हो सकता है? और इसी क्या क्या के डर ने बहुतों की पेशानी पर बल ला दिया है. एके शर्मा बहुत ही कम समय में पूर्वांचल के बड़े नेता के तौर पर उभरकर सामने आए हैं. और उनकी जाति ने तो बाक़ायदा उनको नेता मान लिया है. भले अपमान प्रधानमंत्री मोदी का हो रहा हो, लेकिन शर्मा जी की जाती इसे अपना अपमान भी मान रही है, भाजपा को इसका खामियाज़ा भी भुगतना पड़ सकता है. ए के. शर्मा का लखनऊ में होना बहुतों के कद को छोटा कर देगा, इसमें मुख्यमंत्री भी शामिल हैं. और राजनीति में अपने से बड़े को सम्मान नहीं दिया जाता, उसे काट दिया जाता है. यही राजनीति की विशेषता है और बदसूरती भी.

भाजपा में बैठकों के दौर सरगर्म हैं. राष्ट्रीय संगठन मंत्री बी एल संतोष उत्तरप्रदेश के प्रभारी राधा मोहन सिंह के साथ लखनऊ में बैठक कर रहे हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह लखनऊ आने वाले हैं. अब यूपी भाजपा और यूपी सरकार कितना बदलती है, ये तो वक़्त बताएगा. लेकिन भाजपा मुसीबत में है, ये साफ़ है. और केंद्र में स्थापित होने के बाद पहली बार मोदी को चुनौती दी जा रही है, ये ब्रेकिंग न्यूज़ है. और क्या क्या ब्रेक होता है, देखना दिलचस्प होगा. राजा की इच्छा ही आदेश होती है. और यहां राजा तो भगवान का अवतार भी है. लेकिन यहां तो उल्टी गंगा बह रही है. और गंगा पुत्र बिल्कुल चुप अपने अपमान का कड़वा घूंट पीने को अभिशप्त दिख रहे हैं. क्षत्रप और राजा के इस शीत युद्ध में कितने लोग शहीद होंगे, ये तो बताना मुश्किल है. लेकिन अगर मेरे सवाल गलत हैं तो क्षत्रप के दिन गिने चुने हैं.

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