शब्द मसीहा केदारनाथ की कहानी : नजरबट्टु
शादी का मंडप दुल्हन का इंतजार कर रहा था, ;परंपरा के हिसाब से दुल्हन को सेंडिल या चप्पल पहनकर आना था, ताकि फेरों के समय साफ पता चले कि लड़की कौन है और लड़का कौन।
दुल्हन इस बात पर अड गई कि वह स्पोर्ट्स शूज पहनकर ही आएगी और फेरे भी अपने ही जूतों के साथ लेगी । घर कि औरतों ने खूब समझाया मगर मामला सेटल नहीं हुआ। इधर वर पक्ष के लोग रिवाज को तोड़ने के लिए राजी नहीं थे। लड़की ने शादी न करने की धमकी दे दी।
अब मामला गंभीर हो चल था। दूल्हे से भी बात छिपी नहीं रह सकी। वह बोला – “क्या मैं दुल्हन से बात कर सकता हूँ ?”
अब कोई और चारा भी नहीं बचा था । बिना मुँह दिखाई के मुँहजोड़ी का जोखिम लिया गया । दूल्हे को दुल्हन के पास ले जाया गया।
“आप मंडप में फेरे लेने क्यों नहीं या रही हैं ? आखिर समस्या क्या है ?” दूल्हा बोला।
“समस्या तो गैर बराबरी है। सब मुझे सेंडिल या चप्पल पहनाना चाहते हैं, और मैं अपने जूतों से बहुत प्यार करती हूँ । इन जूतों को पहनकर स्टेट लेवल की धावक बनी हूँ।”
“धावक … मैं समझ नहीं !” दूल्हा बोला।
“मतलब की मैं रेस जीतने वाली हूँ, हारना मंजूर नहीं है मुझे। ये सेंडिल या चप्पल पहनकर फेरे नहीं लूँगी। तुम जूता पहनों तो मैं क्यों नहीं पहन सकती? औरत को ही हारने के लिए मजबूर क्यों किया जाता है ? या तो तुम मेरे साथ दौड़ लगाओ या फिर मैं भी जूते पहनूँगी।” दुल्हन ने कहा।
“मुझे कोई प्रॉबलम नहीं है।” दूल्हा बोला।
“तो तुम रेस लगाओगे , मुझसे हार जाओगे।” दुल्हन हँसते हुए बोली।
“दौड़ नहीं, जूते पहनकर आओ तो कोई ऐतराज नहीं मुझे।” दूल्हा बोला।
“तो क्या तुम डर गए? मुझे तो कहा गया था कि लंबी रेस के घोड़े हो !” दुल्हन बोली।
“अरे! इसका मतलब है कि मैं आगे जाकर और ज्यादा पैसा कमाऊँगा । दौड़ लगाओ … ये मैं न कर पाऊँगा। मैं कंप्यूटर युग का चश्माधारी युवक हूँ, चश्मा गिरा तो किसी भी तरफ दौड़ सकता हूँ।” दूल्हा बोला।
“तो बिना चश्में के दौड़ो फिर, पर मैं सेंडिल नहीं पहनूँगी।” दुल्हन ने अड़ते हुए कहा।
“यार ! मुझे तो दो रोटी से मतलब है, चप्पल पहन के बनाओ या जूते पहन के ।” दूल्हा बोला।
“रोटी एक ही शर्त पे मिलेगी ।”
“क्या शर्त है ?”
“रोज सुबह पाँच बजे मेरे लिए बादाम घोंटकर दोगे सिलबट्टे पर ताकि मैं दूध पी सकूँ दौड़ने के बाद।”
“मिक्सी है न, मैं नौकरानी को कह दूंगा।”
“नहीं , खुद पीसना होगा और वो भी पाँच बजे । बोलो ! मंजूर है ?”
“इतना कठिन काम मुझसे न हो पाएगा, पर तुम ये सब कर क्यों रही हो ?” दूल्हा उकताकर पूछ बैठा।
“ताकि तुम्हें अपने बराबर कर सकूँ। तुमसे दौड़ में पीछे रहूँ, तुम्हारे जूते में पैर डालकर फेरे लूँ , विदाई पर रोने का नाटक करूँ … बीबी हूँ या नौटंकी ? बोलो , क्या कहते हो ?”
दूल्हा सोचने के बाद बोला -“जूते पहनो, और आज फेरे एक साथ होंगे न तुम आगे न मैं पीछे। तुम्हारी जिद अपनी जगह सही है, डरपोक नहीं दोस्त चाहिए मुझे भी।”
“तो कर ले किस , डर किस बात का? प्यार और बराबरी से ज़िंदगी शुरू करेंगे , तेरी अक्ल से तो चश्मा उतर गया, बादाम घोंट के आधा दूध तुझे पिलाऊँगी ताकि आँखों का चश्मा भी उतर जाय।” दुल्हन कहते हुए दूल्हे के सामने जूते पहनकर खड़ी हो गई।
“चल मेरी नजरबट्टु … सबके चश्में उतार दिए तूने ।” कहते हुए दूल्हे ने उसका माथा चूम लिया।
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खाओ विटामिन वाला खाना
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“ये कैसे बैगन हैं ? और ये गोभी तो देखो जरा …. आँखें नहीं हैं क्या तुम्हारी ? सब्जी खरीदकर लाई हो या कूड़े से उठाकर लाई हो ?” हेडमास्टर साहब सब्जियों को देखते ही भन्नाए।
“लाई तो पैसे ही देकर हूँ।”
“तो फिर ये कीड़े नहीं दिखाई दिये ? चश्मा तो चढ़ा हुआ है आँखों पर !” प्रिंसिपल साहब पैसों का नाम सुनकर तुनकते हुए चिल्लाये।
“तुम्हारी करतूत आ गई है अखबार में । बच्चों को जबरन कीड़े वाला खाना खिला रहे थे, एक मासूम बच्ची का हाथ तोड़ दिया । अब तुम भी खाओ विटामिन वाला खाना। लोलुपता और डर के दो-दो चश्में चढ़े हुए हैं न तुम्हारी आँखों पर।” पत्नी ने भी कड़े स्वर में कहा।
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जिस्म के कोठों पर
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“बेड़े मियां ! लौंडे को सम्हाल कर रखो जरा, कल मैंने उसे देखा। माहौल 35 टुकड़े करने वाले गरमाया हुआ है।” वह सलाम में हाथ उठाते हुए बोला।
“सही कह रहे हो बेटा, मज़हब से मुल्क तक़सीम हुआ। अब नफ़रत से आदमी तक़सीम हो रहे हैं। सालमा ने बाँके के बेटे को दूध पिलाया था और बीरबल की दादी ने मेरे अब्बा को।”
“वो दिन तो कब के लद गए मियां।”
“दिन नहीं लदे बेटा ….अब के लोगों के दिल चले गए। मोहब्बत इबादतगाहों से निकलकर जिस्म के कोठों पर बैठ गई।”
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ज़िन्दा जवान बेटे की लाश
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“अरे बेटा ! कैसे आना हुआ ? मैंने तुम्हारे पापा से कहा था कि सब्जी मंडी में आढ़ती के साथ काम करना होगा। सुबह चार-पाँच घंटे का काम था और बाकी समय तुम्हारा था।” लड़के को देखते ही वह बोले।
“हाँ, पापा ने बताया था मुझे , लेकिन मुझे डिग्रियों पर भरोसा था । मैं कई जगह गया लेकिन काम नहीं बना । दुख तो इस बात का है कि पापा का इनवेस्टमेंट जो मेरी पढ़ाई पर किया था … डूब गया। पापा को लगता था कि मैं सुबह उठ नहीं पाऊँगा .. पर अब मैं उठ गया हूँ झूठ की नींद से।” वह लड़का बोला।
“हा हा हा .. फिर गलत सोच रहे हो बेटा, पढ़ाई-लिखाई कभी बेकार नहीं जाती। मैंने तुम्हें मौका दिया था कि तुम अपनी पढ़ाई का अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी इस्तेमाल करो। वहाँ हर तरह के आदमी से मुलाकात होती । वहाँ का धर्म भूख है, तो वहाँ का कर्तव्य किसी को भूखा नहीं रहने देना सीखने को मिलता। मुझे उम्मीद थी कि तुम अपने लिए भी और उन सब के लिए कुछ बेहतर कर पाओगे।”
“उनके लिए तो पता नहीं, पर अपने लिए बेहतर कर के आया हूँ।” वह अपना सिर झुकाए बोला।
“क्या मतलब ? क्या कर आए हो ? मैं कुछ समझा नहीं।”
“अंकल ! पीएचडी कर के मेरा दोस्त चपरासी की जॉब के लिए फॉर्म भरता है, पर उसे वह भी नहीं मिलती। तो मैं खुद के बारे में सोचने लगा और मैंने आजादी पा ली उस अहंकार से, जो इस काम को छोटा समझ रहा था। वो डिग्रियाँ जैसे मेरा मजाक उड़ाती थीं । जो डिग्री दिखा नहीं सका, वह क्या बन गया , और मैं दिखा सकता हूँ, मगर कुछ नहीं बन सका । आज बोझ हल्का कर लिया, सब जला दिया। आढ़त पर नहीं, पल्लेदारी को भी तैयार हूँ । मुफ़्त की रोटियाँ जवान होकर कैसे तोड़ूँ ? मेरी आत्मा और पिता जी में आस्था मरी नहीं है। मुझे काम दिला दीजिए अंकल। ज़िन्दा जवान बेटे की लाश पिता जी के कंधों पर आखिर कब तक ?” वह हाथ जोड़ते हुए बोला।
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अक़ीदा
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“भगवान के नाम पे कुछ दे दो बाबा …. अल्लाह के नाम पे कुछ दे दो बाबा। ” गंदे कपड़ों में लिपटा हुआ वह अपाहिज सा आदमी अपनी फरियाद का कटोरा आते-जाते लोगों के सामने पसार रहा था।
“अबे! ये क्या बकवास कर रहा है तू ?”
“क्या हुआ भाई ?”
“या तो अल्लाह के नाम पर मांग या भगवान के नाम पर मांग। दोनों के नाम पर माँगेगा तो भूखा मरेगा। धर्मनिरपेक्ष जैसा कुछ नहीं होता।”
“कहता तो ठीक है, आजकल नफरत ऐसी है कि एक-दूसरे को कोई देख नहीं रहा है । इस तरफ या उस तरफ का रिवाज़ चल रहा है भरे पेट वालों का।”
“भरे पेट वालों का रिवाज़ …..क्या मतलब है तेरा ?”
“पहले अल्लाह और भगवान से कह कि आदमी -आदमी में फर्क हो सके ऐसा करने के लिए पेट को अलग जगह लगाए । जब पेट,भूख और मजबूरी दोनों की एक जैसी हैं तो तू ख़ामख़ाह मूसलचंद क्यों बन रहा है ? मजबूरी के कटोरे का मज़हब देखने वाला ज़ाहिल होता है।”
वह कभी ख़ुद को देखता कभी उस भिखारी को जिसके दाढ़ी थी और सर पे टोपी भी, और मंदिर के सामने बैठा जैसे कोई संदेश दे रहा था । जेब से कुछ नोट निकाले और जय श्री राम कहते हुए आगे बढ़ गया ।
“अल्लाह तेरा भला करे।” पता नहीं उसने सुना या सुनना नहीं चाहता था पर अक़ीदा उसे समझ आ गया था।
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राहू-केतुओं का प्रकोप
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“भाई साहब ! आपके बेटे की कहीं जॉब लगी क्या ? भाभी जी बात रहीं थीं कि बहुत अच्छे नंबर आए हैं बी टेक में।”
“नहीं, अभी कोई सरकारी जॉब निकाल ही नहीं रही है। बस एक्सपीरियंस के लिए एक प्राइवेट जॉब कर रहा है।”
“मुझे तो लगता है कि कुछ ग्रह नक्षत्रों का उपाय कीजिए, आपको तो आरक्षण भी मिलता है। जल्द बेटे को बढ़िया नौकरी मिल जाएगी।”
“मैं इस सब में भरोसा नहीं करता, वैसे कार्तिक ने भी तो अपना बी टेक अच्छे नंबरों से पास किया है, बेटा बात रहा था। और उसने तो माला , अंगूठी सब पहन रखा है, उसे कितने पैसे मिल रहे हैं आजकल ?”
“अरे भाई साहब ! रिजर्वेशन ने उसके रास्ते बंद कर रख हैं। अस्सी परसेंट नंबर हैं पर जॉब नहीं है।”
“मेरे बेटे के ब्यानवे परसेंट मार्क्स हैं पर जॉब नहीं है। ये ग्रह नक्षत्रों का नहीं नीति बनाने वाले राहू-केतुओं का प्रकोप है और इसका उपाय … मंत्रों में, नगों में नहीं अंगूठे में है चुनाव मशीन पर।”
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कंपीटीशन
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“सर! आपकी पार्टी के कार्यकर्ता को गिरफ्तार करना पड़ रहा है, उसने तैश में आकर विपक्षी का हाथ काट डाला।” पुलिस थाने से फोन पर बताया।
“इतना कट्टर समर्थक है, वाकई शेर है।”
“पर आपके ही लोग थाने का घेराव किए हुए हैं, ऊपर से पुलिस कार्यवाही के आदेश हैं। अब हम तोड़ना शुरू करेंगे।”
“हम्म … आधे घंटे का समय दो। अगर मेरा फोन नहीं आया तो साले को मार देना और आरोप भीड़ पर लगा देना । हम उसके परिवार के लिए कुछ भेज देंगे संवेदना पत्र के साथ । पार्टी की छवि का सवाल है भाई। हम शांतिप्रिय देशभक्त पार्टी हैं। तुम्हारे लिए बिस्कुट पहुँच जाएंगे।”
“नाम बिस्कुट का और डिब्बे में पाँचकुट … बेईमानी का कुछ तो मोल डालो। हम भीड़ का कोई चेहरा ढूंढते हैं । भाई कानून व्यवस्था भी कायम रहनी चाहिए.. हा हा हा।”
“तुम्हारा मुँह बहुत बड़ा होता जा रहा है, सरकार बड़े मुँह के कुत्ते पसंद नहीं करती।”
“ऐसा क्यों?”
“अपने कंपीटीशन में जो नहीं चाहते किसी को हम।”
उसने फोन रखा और बोला -“तुमसे से तो मक्कारी में रंडी भी हार जाय, वाकई पूरे दलाल हो। रुमाल बिछाकर चादर का काम लेते हो, तुम्हारे कंपीटीशन में कौन टिक सकेगा।”
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नया पैंतरा
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“सर! कोई भी पार्टी का मुखिया बनने को तैयार नहीं है। लोगों के बीच जाने से डर रहे हैं लोग।”
“हम राष्ट्रीय पार्टी हैं, सबसे ज्यादा लोग हमारे मेम्बर हैं, सबसे ज्यादा फंड हमें मिलता है।”
“सर! आपकी सारी बातें सही हैं पर लोग लीडर तलाश रहे हैं डीलर नहीं। लोग वादों की डिलीवरी का पूछ रहे हैं।”
नेता जी नया पैंतरा खोज रहे हैं।
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इमेज़
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“नमस्ते पापा!”
बेटे ने आज अलग ही अंदाज में पैर छूते हुए कहा तो दिमाग में हल्का -सा भूकंप आया कि हमेशा हाय डैड और गुड मॉर्निंग तक न उठने वाला बेटा, आज नमस्ते कह रहा है। दिमाग की दही होना लाजिमी था। सो मैंने भी महाभारत का डायलोग प्रयोग किया, ये सोचकर कि शायद इसे हिन्दी का बुखार चढ़ा हो और कहा -“आयुष्मान भवः।”
“समझा नहीं पापा । या तो अङ्ग्रेज़ी में बोलो या फिर अपनी मनपसंद भाषा में जो मुझे सिर्फ उतनी समझ आती है जितनी मैं समझना चाहता हूँ । यू नो मुझे सेलिब्रिटी बनना है और उसके लिए डिजिटल कैमरे की जरूरत है।”
अब तक मुझे भी औलाद के जेब काटू मंसूबे समझ आ चुके थे। फोटो से भी क्या कोई सेलिब्रिटी बना है । हाँ, वे लोग जो जीवन को फोटो में कैद करते हैं, वे लोग थोड़ा अलग हैं, पर ये तो मैं भी जानता हूँ कि महज एक फोटो की खातिर कितना रिस्क रहता है उनका । और मेरी आलसी औलाद को मैं अच्छी तरह जानता हूँ । सो मैंने भी पूछ लिया -“डिजिटल कैमरा क्यों जरूरी है, जब मोबाइल में 49 पिक्सिल का कैमरा है तुम्हारे पास ।”
“हद है यार , आप समझते ही नहीं हो कि इमेज़ तभी इमेज़ लगती है जब उसके नीचे लिखा हो कि ये उस शानदार कैमरे से ली गई है ।”
“तुम पीएम नहीं हो। और हाँ, इमेज़ को महज़ फोटो समझने की भूल मत करो । इमेज़ का मतलब चरित्र भी होता है और वो कोई फ़ोटो नहीं होता, बल्कि उसे कमाया जाता है और वो भी बिना कैमरा क्लिक के अपने आचरण से , अपने प्यार से और अपने विश्वास से ।”
“यार पापा! मुझे मत समझाओ । मैं पोस्ट ग्रेज्युएट हूँ और वो भी डिग्री वाला। मुझे ईमेज का डिजिटल और फिजिकल अर्थ मालूम है।”
“ईमेज का मेंटल अर्थ समझो , वो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है । लोग तो मीडिया खरीदकर ईमेज़ बना लेते हैं, और तुम कैमरे की बात कर रहे हो ….. जुमले और जीवन का फ़र्क पहले समझो …ये डिजिटल का भूत और इमेज़ का भूत बिना झाडे के उतर जाएगा, जब ख़ुद की कमाई से कैमरा खरीदोगे।”
दिमाग में इमेज़ बादल में बिजली की तरह और हर घर नल की सूखी परियोजना की तरह कौंधता रहा । ईमेज़ जो कागज पर उतरी जमीन पर नहीं।
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बधाई हो
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पत्नी कलेंडर को साफ कर रही तो उसने एक निशान पर देखा और मुसकुराती हुई सफाई करती रही । काम पूरा होने पर दो कप चाय बनाकर लाई और पास में बैठते हुए बोली -“धर्मेश भाई साहब का आज जन्म दिन है, तुम्हें याद है न।”
ऐसा लगा की चाय का कप हाथ में टूटकर अभी बिखर जाएगा।
“क्यों याद रखूँ उस आदमी को , उसकी वजह से मेरा नुकसान हुआ और इस बात का एहसास तो होना दूर की बात, उसके मुँह से सॉरी भी नहीं निकला।”
“तो क्या हो गया, नहीं पड़ी होगी उनकी हिमात माफी मांगने की। पता उन्हें भी है कि तुम्हारा नुकसान हुआ है। तुम दीवाली पर भी उनके यहाँ नहीं गए थे, पर मैं गई थी।”
“मुझसे पूछे बिना तुम क्यों गईं उसके घर ?”
“क्योंकि लड़ाई तुम्हारी हुई है मेरी नहीं। मैं कैसे भुला देती उन बच्चों को जो मुझे ताई जी ताई जी कहते हुए लिपट जाते हैं। तुम्हारा नुकसान तो फिर भी भरा जा सकता है पर ये जो दोस्ती का नुकसान कर रहे हो और अपनी सेहत का कुढ़कर नुकसान कर रहे हो उसकी भरपाई नहीं हो सकती । पत्नी तो उसे मिनीमाइज़ कर रही हूँ । कल त्योहार है उनका । मैंने कल घर बुलाया है सबको।”
“और वो मान भी गया ?”
“नहीं, मान नहीं रहा था। पागल अपनी बीवी के गहने बेचकर तुम्हारा नुकसान पूरा करने की बात कर रहा था, सो मैंने लगा दी उसे एक चपत धर के।”
“क्या कह रही हो ….तुमने उस पर हाथ उठा दिया !”
“हाँ, मगर वह रोने लगा और मुझसे देखा नहीं गया। मैंने बुला लिया है उन्हें । अब तुम्हें तय करना है कि तुम्हें क्या करना है। अगर तुम आज घर में नहीं रुके तो ये दरार और गहरी हो जाएगी । जब गलती का अहसास हो तो उसे माफ कर देना चाहिए ।”
“आने दे उसे एक चमाट खींचकर लगाऊँगा उसे, बेबकूफ गहने बेच सकता है पर जुबान नहीं हिला सकता अपनी ….और वो ख़ुद ही तो नहीं आया , जब वो नहीं आया तो मैं भी नहीं गया । उसने मुझे क्या ऐसे ही बड़ा भाई समझा हुआ है? मैं तो कब का माफ कर चुका हूँ । गलती थी उसकी मगर जिम्मेदार वो नहीं था। जरा अपने फोन से उसे फोन लगाओ, पता नहीं मेरा फोन उठाएगा या नहीं …डरपोक कहीं का।”
“मतलब …..तुमने उसे माफ कर दिया ?”
“हाँ, मगर सजा तो दूँगा उसे और बड़ी सजा दूंगा। शाम को अच्छा खाना बनाना सबके लिए।”
“तो फोन लगाकर विश कर दो उसे ।”
“नहीं, सीने से लगकार विश करूंगा।” तभी निगाह पत्नी के फोन पर गई , वह तो पहले से चालू था । मतलब ये कि हमारी सारी बातें कोई सुन रहा था।
“तुम्हारा फोन चालू क्यों है ?”
“ओह ! मैं प्रीति से बाते करते हुए तुमसे बात करने लगी । ध्यान ही नहीं रहा।” और पत्नी मुझे देखकर मुस्कुराने लगी।
“बधाई हो प्रीति …. सुन रही है न तू । तुम्हारे प्यार में अपने खसम को धोखा दे रही है तेरी जेठानी। मेरा घाटा उसने कराया उसे माफ किया पर तूने जो घाटा किया है उसे माफी तभी मिलेगी जब आज का खाना तू बनाएगी । कह दे उस नालायक डरपोक से ….बधाई हो।”
पत्नी ने फोन कान पर लगाया और दुपट्टे से आँखों को पोंछते हुए बोली -“जल्दी से आ जा अब । ये कोई मदद नहीं करने वाले ….हा हा हा।”
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दिलदार
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“अरे रफीकन! आज इतवार है, बच्ची को तैयार कर ले। हम भी आज गुरुद्वारे चलेंगे।” अहमद ने कहा।
“हम और गुरुद्वारे चलेंगे?” रफीकन ने आश्चर्य से लगभग चौंकते हुए कहा।
“तुम इतनी परेशान क्यों हो रही हो? वहाँ भी तो अल्लाह का घर है। और.. ।” वह कहते हुए रुक गया।
“तुम कहते हुए क्यों रुक गए? और क्या हुआ था उस दिन जब तुम्हारे चेहरे पर चोटों के निशान थे।” रफीकन ने उसके चेहरे की तरफ देखते हुए पूछा।
“बहुत बड़ा हादसा हुआ था उस दिन। आज उस लम्हे को याद करता हूँ तो जिस्म का पोर-पोर कांपने लगता है।”
“हाय अल्लाह, भला ऐसा क्या हो गया था ? जो तुमने मुझे बताया भी नहीं और आज तुम इस तरह से बात कर रहे हो? आज तो लोगों की छुट्टी रहती है, आज अगर तुम रेहडी लेकर जाते तो ज्यादा कमाई होती।”
“मैं सब जानता हूँ , लेकिन वह दिल का बादशाह वहीं पर मिलता है।”
“कौन वहीं पर मिलता है? कौन है वह दिल का बादशाह?”
“ज्यादा सवाल मत करो, बच्ची को तैयार करो हमें गुरुद्वारे चलना है। और हाँ , मैंने अपनी औकात के हिसाब से थोड़ी सी दाल, चावल और नमक ला कर रखा है, उसे अपने साथ ले चलना मत भूलना।”
“वह तो ठीक है पर तुम मुझे कुछ बताते क्यों नहीं हो?”
“तो सुनो, तुम्हें सारी बात बताता हूँ । तुम्हें तो याद है कि मैं वेल्डिंग का काम करता था। फिर जिंदगी में यह नामुराद कोरोना आया और मेरी नौकरी चली गई। मालिक ने बकाया देने में भी अपनी मजबूरी गिना दी। तुम्हें याद होगा कि जिस दिन मेरे चेहरे पर चोटों के निशान थे उस दिन घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं था। मेरे पास अपने आप को बेचने के अलावा कुछ भी नहीं बचा था। जीनत ने भी सुबह से कुछ नहीं खाया था। उस दिन मैंने चोरी की थी। मुझे ब्रेड चुराते हुए दुकानदार ने पकड़ लिया था। आसपास के लोगों ने मेरी पिटाई भी की। पुलिस को बुला लिया गया और मुझे पुलिस के हवाले कर दिया गया। उन्हीं पुलिस वालों में एक भला सरदार था। उसने पहले मुझे सुना और मेरी मजबूरी को जानते हुए अपने बटुए की जेब से तीन हजार रुपये दिए। उसने मुझसे कहा कि जब भी भूख लगे तो किसी गुरुद्वारे में चले जाना, लेकिन चोरी कभी मत करना। यह कुछ पैसे तुम्हें दे रहा हूँ, इन पैसों का सही से इस्तेमाल करना। तुमने देखा था कि एक रोज में रोटियां और दाल लेकर आया था। उन पैसों से मैंने सब्जी खरीद कर बेचना शुरू किया। हमारा घर अच्छे से चलने लगा। मैं जानता था कि उस भले आदमी की बात को मुझे हमेशा याद रखना है। उसने मेरी मदद की है। एक रोज मैं गुरुद्वारे चला गया। वहाँ पर मैंने उसे देखा, वह नंगे पैर लोगों को खाना खिला रहा था। मैंने तो उसे पहचान लिया, लेकिन उसने मुझे नहीं पहचाना। जब मैंने उसे याद दिलाया और उसके पैसे वापस करने चाहे तो उसने मुझसे पैसे लेने से मना कर दिया। वह मेरी तरफ देखते हुए बोला-” मैंने गुरु की गोलक के पैसे तुम्हें दिए थे। मैं हर महीने अपनी कमाई से दसवां हिस्सा गुरु को देता हूँ । मेरी नौकरी गुरु की देन है। अगर कुछ वापस करना है तो गुरु को ही वापस कर दे।“ पहले तो मैं समझ नहीं पाया था लेकिन उसने कहा कि तुम्हारे जैसे और भी बहुत सारे लोग हैं, उनकी मदद करना ही गुरु की सेवा करना है। बस तब से जो मुझसे हो पाता है मैं करने की कोशिश करता हूँ । और तुम्हें सच बताता हूँ कि जब से मैंने ऐसा करना शुरू किया है मेरा काम और बढ़ता गया है। अब मैंने फैसला कर लिया है कि मैं हर हफ्ते अपने जैसे लोगों की मदद करूंगा।”
“इसका मतलब वह पुलिस वाला सरदार है?” रफीकन ने पूछा।
“हाँ, वह देखने में तो सरदार है, लेकिन दिल से दिलदार है। अल्लाह उसको सलामत रखे।”
“पर तुम तो जानते हो कि जमाने में आजकल क्या चल रहा है, अगर हमें मुसलमान समझ कर वहाँ से भगा दिया गया तो?”
“पागल हो गई है तू। उनके सबसे बड़े गुरुद्वारे हरमंदिर साहब की नींव हमारे मियां मीर साहब ने रखी थी। गुरुओं का काम लोगों को अल्लाह का रास्ता दिखाना है, वहाँ आदमी आदमी में कोई भेद नहीं होता। मैं तो उस अल्लाह के नेक बंदे का नाम भी नहीं जानता। उसके सीने पर लिखा रहता है लेकिन मैं अनपढ़ हूँ , बस उसे दिलदार सरदार जी कह देता हूँ , वह हँसने लगता है। और उसकी हँसी को देखकर मुझे लगता है कि अगर दुनिया में अल्लाह अपना लिबास बदलकर आता होगा तो बिल्कुल वैसा ही लगता होगा।”
“तो क्या तुम्हारे दिलदार सरदार जी हर इतवार को मिलते हैं?”
“हाँ, वह अपनी बीवी और बच्चों के साथ वहाँ पर आकर सेवा करते हैं। मुझे तो यह भी नहीं पता कि पुलिस में उनका रुतबा क्या है, लेकिन जिसका दिल बड़ा हो, जो दिलदार हो, कोई बड़ा ही आदमी होगा। तू जल्दी कर आज मेरा भी मन कर रहा है कि मैं भी अपने हाथों से लोगों को खाना खिलाऊँ।”
“और अगर हमारे लोगों को पता लगा तो हमारे बारे में लोग क्या कहेंगे?”
“कौन लोग? और क्या कहेंगे? मोहब्बत और मदद का मजहब तलाशेंगे ? जब हम भूखे थे तो हमारी मदद करने कौन आया था? उसकी कहानी सुना दूंगा, मुझे नहीं लगता कि कोई आँख उठाकर बात भी कह पाएगा। जो आदमी मदद करके भी अपना सिर झुका लेता है, जिसकी मदद की, उसे याद नहीं रखता, वह सचमुच में बहुत बड़ा दिलदार है। अब अब हमें चलना चाहिए। उसके चेहरे का नूर देखकर तुम्हें भी लगेगा कि कोई फरिश्ता हमारे सामने खड़ा है।”
रफीकन मुस्कुराते हुए अंदर चली गई और कुछ देर बाद अपनी बेटी का हाथ पकड़े हुए अपने हाथ में थैला थामे हुए घर से बाहर आ गई उस दिलदार आदमी को सजदा करने के लिए।

