खास-मेहमानचर्चा में

शब्द मसीहा की कहानी : बदमाश लड़की

                    (केदारनाथ शब्द मसीहा)

गर्मियों में जरा सा भी भागने पर उम्र की याद आ जाती है . उस रोज भी यही हुआ था . दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मुझे गाडी पकड़नी थी . घर से ऑटो लिया तो रस्ते में जाम के कारण फँस गया . किसी तरह रेलवे स्टेशन पहुंचा भागता हुआ. गाड़ी का सिग्नल हो चुका था . गाड़ी हलके-हलके मूव हो रही थी . मैं पूरी ताकत से दौड़ता हुआ अपने कोच के पास पहुंचा और अपना सूटकेस अन्दर फेंक दिया . किसी तरह खुद भी चढ़ गया . सांस फूल रही थी सो दरवाजे के पास ही खड़ा रहा . एक लड़की जो वहीं दरवाजे पर खड़ी थी, चुपचाप मेरी हालत को देख रही थी .

“आपका रिजर्वेशन तो है न अंकल ?”

“हाँ, रिजर्वेशन है . सात नंबर सीट है मेरी .”

“आप गलत साइड पर चढ़ गए हैं . वो तो दूसरी तरफ है कोच में . क्या आप अपना लगेज ले जा सकेंगे या मैं कोई मदद करूँ ?”

“नहीं , अभी थोडा सांस ठीक हो जाएँ तो मैं ले जा सकूंगा .’ मैंने हाँफते हुए कहा .

“चलिए मैं छोड़कर आती हूँ आपको . अन्दर ए सी में बैठने से राहत मिलेगी .” उसने मेरा सूटकेस का हेंडिल पकड़ा और उसे खींचते हुए आगे बढ़ गयी . मैं उसके पीछे चल पड़ा .

“यही है आपकी सीट . आप कहें तो बेडशीट बिछा देती हूँ .” वह बोली .

“नहीं , मैं कर लूँगा . थैंक्स !”

वह मेरे सामने वाली सीट पर बैठ गयी . उसने मेरा सूटकेस भी सीट के नीचे सरका दिया . अभी तक मेरी निगाह उसकी और नहीं गई थी. जब थोडा सा शान्ति मिली तो मैंने देखा कि वह ऊपर एक कॉटन की सफ़ेद कुर्ती और जींस की हाफ पेंट पहनी हुई थी . लड़कियों जैसा कोई सिंगार नहीं था . न नेल पोलिश न ही लिपस्टिक . उसने अभी तक बिस्तर भी नहीं लगाया था अपना .

“आप कहाँ जा रही हैं ?” मैंने पूछा .

“होशियारपुर .”

“वहां कौन है आपका ?”

“मम्मी- पापा हैं ….और शायद कोई भी नहीं है .”

“समझा नहीं .”

“अंकल ! वो मेरे बॉय फ्रेंड के माँ -पापा हैं .”

“अच्छा तो शादी होने वाली है वहां पर . सास-ससुर पर डोरे डालने जा रही हो …हा हा हा .” मेरी इस बात पर वह हौले से मुस्कुराई और बोली –

“अब शादी की कोई उम्मीद नहीं . जिस से प्यार था उसे बाहर जाने की जिद थी . चला गया और रस्ते में ही ख़त्म हो गया . कभी वापसी नहीं होगी उसकी . उसके घर वाले मेरा आना पसंद नहीं करते लेकिन मेरे दोस्त को अपने मम्मी-पापा की बहुत चिंता रहती थी . बस मैं उनसे ही मिलने जाती हूँ .”

“हम्म …बहुत दिलेर हो तुम . सब कुछ ख़त्म होने पर भी वहाँ जाती हो मगर किस रिश्ते से ?”

“अंकल ! रिश्ता मैं मानती हूँ , वो नहीं और प्यार में शायद किसी रिश्ते की जरुरत भी नहीं होती .”

“सही कहा बेटी !”

मेरे बेटी कहते ही वह जैसे चौंक गयी .

“क्या हुआ ? मैंने कुछ गलत कह दिया क्या ? मैं अपने शब्द ….”

“नहीं , सफ़र में ये शब्द बहुत कम सुनने को मिलता है . अब कोई ऐसे बुलाता ही नहीं है .” वह बोली .

“क्यों नहीं बुलाता भला ! तुम तो इतनी अच्छी और केयरिंग लड़की हो !”

“मेरे माँ-पापा और छोटा भाई बैंगलोर कार एक्सीडेंट में ख़त्म हो गए . चाचा-चाची आये थे अपना हक़ जताने . पर मामा ने मना कर दिया तो अब कोई रिश्ता नहीं बचा . बिलकुल अकेली हूँ . न कोई डांटने वाला , न कोई पूछने वाला .” उसने अपना चेहरा छिपाते हुए कहा . शायद वह अपनी आँखों में उतर आये दर्द को छिपा रही थी . मैंने विषय बदलते हुए कहा –

“मेरी भी कोई बेटी नहीं है . बस दो बेटे हैं . मगर किसी काम के नहीं . बेटी होती है तो माँ-बाप दोनों का ख्याल रखती है .”

“मैं नहीं रख पायी उनका ख्याल . बहुत प्यार करते थे मुझे . कभी कोई भेद नहीं किया . लड़कों की तरह ही पाला . मुझे इंडिपेंडेंट बनाया . मुझे क्या मालूम था कि आने वाले दिनों में मैं अकेली रह जाउंगी .” वह बोली .

” तुम्हारा नाम क्या है ?”

“बेटी . अभी तो बोला न आपने !” वह हंसते हुए बोली . जैसे सारे गम को एक झटके में कहीं फेंक दिया हो . हमारी ऊपर वाली सीटों के लोग भी आपस में बात कर रहे थे और अब हम पानीपत के पास पहुँच गए थे .

“क्या खिलाओगी तुम मुझे ? तुम बेटी बनी हो तो क्या खाना नहीं खिलाओगी ?”

“हा हा हा ….मैं तो खुद केक, बिस्किट और ये मसाला चना खा रही हूँ . आप ये खाओगे तो खिला सकती हूँ .” वह बोली .

“नहीं , ये तो बच्चे ही खाते हैं . तुम्हारी आंटी ने क्या रखा है वो चेक करते हैं . मेरी जरा मदद करो और सूटकेस बाहर निकालो .” मैंने एक अजीब से अधिकार से कहा . वह नीचे झुकी और उसने सूटकेस बाहर निकाल लिया .

“इसे आप ही खोल सकते हैं . लॉक लगा हुआ है .”

“196705 नंबर मिलाओ और खोलो !”

“अरे ! मैं रात में चोरी भी कर सकती हूँ . आपने नंबर बताकर अच्छा नहीं किया !” वह फिर से मुस्कुराते हुए सूटकेस खोलते हुए बोली . एक पोलीथिन बाहर निकाल मेरे सामने रख दिया .

“लो अंकल ! अब खाना खा लो . पानी है या मैं लाकर दूं पेंट्री से .” वह बोली .

“रुको ! सब है इसमें .” मैंने थैली को खोलते हुए कहा . मैंने कागज़ की प्लेट में चार पूड़ियाँ रखीं . अचार और भिंडी की सब्जी भी दो जगह डाल दी और उस लड़की से कहा –

“मैं तुम्हारी आंटी के हाथ का खाते हुए परेशान हो गया हूँ . सारा तो मैं खा नहीं सकता अब तुम मेरी मदद करो . आ जाओ यहाँ .” मैंने पीछे सरकते हुए कहा . वह मेरे पास आकर बैठ गयी . न जाने मन में कहाँ से ये विचार उतर आया था कि मैंने एक कौर तोडा और थोड़ी सी सब्जी लेकर उसके मुंह की तरफ बढ़ा दिया . वह एकदम से अचकचा गयी . मैंने उसे देखा और हौले से मुस्कुराया .

“नहीं , मैं खुद खा लूंगी .”

“मुँह खोलो !” जैसे ही मैंने अधिकार से कहा उसने मुंह खोल दिया . कौर मुंह में जाते ही दोनों आँखों से झर झर आंसू टपक पड़े .

“इतनी बहादुर लड़की रोती है क्या ?” मैंने ये भी नहीं सोचा कि मेरी उँगलियों पर सब्जी लगी है . मैंने हाथ बढाकर उसके आंसू पोंछ दिए . मेरे ऐसा करते ही उसकी हिचकियाँ बंध गईं . मुझसे रुका न गया . मैं उठा और उसकी कमर पर हाथ रख दिया अपना . सर पे हाथ रखते ही वह मुझसे लिपट गई. अब बहुत कुछ बिना कहे ही संवाद हो रहा था . दो-तीन मिनिट ऐसे ही रहे . मैं अपनी जगह बैठ गया . मैंने फिर से एक कौर उसकी तरफ बढ़ा दिया . इस बार पहले जैसा कुछ नहीं हुआ . वह इत्मीनान से खाने लगी . अब मैं भी खाना खा रहा था .

कुछ देर बाद मैंने अपना खाना ख़त्म कर लिया तब मैंने पूछा- “कुछ मीठा हो जाय क्या !”

“हम्म्म …” वह कुछ नहीं बोली . मैंने थैली को टटोला और एक डिब्बा निकाला जिसमें बेसन के लड्डू थे .

“लो मीठा खाओ !” उसने हाथ बढाकर एक लड्डू ले लिया . कुछ देर बाद मैंने प्लेट को उठाया तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया – “रहने दीजिये . मैं फेंक कर आती हूँ इसे .”

मैं बस मुस्कुराकर रह गया . उसने प्लेटों को उठाया और दूसरी तरफ चली गई कूड़ा फेंकने . जब वह वापिस आई तब मैंने कहा- “अब कहीं जाना मत और सामान का ख्याल रखना . मैं अभी आता हूँ .”

जब मैं वापिस पहुंचा तो मैंने देखा कि बेडशीट बिछा दी गयी थी तकिया लगा हुआ था . कम्बल के साथ चादर लगी हुई थी . उसने अपना बिस्तर भी लगा लिया था .

“ये क्यों किया तुमने ? तुम मेरी आदत बिगाड़ दोगी तो बीबी को तकलीफ होगी मेरी .” मैंने कहा .

“मुझे मालूम है नहीं होगी . अब आप सो जाओ . मुझे अभी किताब पढनी है . मुझे जब जाओ तो जगाकर जाना . आप तो तीन बजे उतर जाओगे न !”

मैं कुछ नहीं बोला बस सर को हिला दिया और लेट गया आँखें बंदकर . सुबह तीन बजे का अलार्म लगा रखा था . गाडी कुछ लेट हो गई थी . बाहर देखा तो अभी फिल्लौर स्टेशन था . मैं टॉयलेट में चला गया . वापिस आया तो वह अपनी सीट पट बैठी हुई थी .

“अभी देर है स्टेशन आने में .” मैंने कहा .

“अच्छा हो कि और लेट हो जाय गाडी . आप से कुछ देर और बात कर सकूँ .” वह बोली .

“अच्छा ! तो अनजान आदमियों से डर नहीं लगता तुम्हें ?” मैंने मुस्कुराते हुए कहा .

“आप जैसे अनजान से नहीं लगता !”

“ठीक है . मेरा सूटकेस खोलो !”

उसने सूटकेस खोल दिया -” अब जरा कपड़ों के नीचे देखो . वहां कोई किताब है , उसे निकालो .”

उसके हाथ में किताब थी . मैंने उसे अपने हाथों में लिया और पेन निकालकर लिखने लगा ……प्यारी बदमाश लड़की को सस्नेह भेंट .

“लो , ये तुम्हारे लिए हैं .” उसने किताब को हाथों में लेकर कवर को देखा तो मुस्कुराई .

“मुझे मालूम ही नहीं हुआ कि आप लेखक हो .” वह बोली .

“हाँ, मेरे सिर पर कलम जो नहीं उगी हुई हैं ….हा हा हा .”

तभी गाडी धीमी होने लगी . मैंने सूटकेस को उठा लिया .

“रहने दो आप . बाहर कोई बदमाश लड़की नहीं है जो आपको सम्हालेगी .” और वह मेरा सूटकेस लेकर आगे बढ़ ली . मैं नीचे उतरा स्टेशन पर तो वह मेरे पैर छूने लगी . मैंने उसे उपने सीने से लगाते हुए सिर पर हाथ रख दिया .

“जाओ ! अब सो जाओ सुबह आठ बजे पहुंचेगी गाडी . घर पहुंचकर मुझे फोन करना .”

वह वापिस चली गयी . थोड़ी देर बाद एक मेसेज आया .

“थैंक्स …एक बदमाश लड़की को जीवन के पल देने के लिए “

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