रचनाकार

कहाँ लुकाये बदरा

( साक्षी साहू सुरभि )

कहाँ लुकाये तै हां बदरा, कहां लुकाये न।
खेत खार ह सुक्खा परगे, कहां लुकाये न।
कहां लुकाये तै हा बदरा

बतर बियासी के दिन बीतत हे,संसो म पड़े हे सियान।
सुक्खा खेत ल देख के,मुड़ धर रोवय किसान।
न गली म पानी के रेला,न भरे कोनो खचका डबरा
कहां लुकाये तै हा बदरा।

करिया करिया बादर तै,सबके आस ल बंधाये।
घुमड़ घुमड़ के आये फेर,कोन जनी कहां नंदाये।
झूम के बरस जा न बदरा,खेत म बोहा जही लहरा।
कहां लुकाये तै हा बदरा।

बिजहा खेत म परे परे,भीतर भीतर सर गे।
नान्हे नान्हे पिकी मन,घाम म सब्बो मर गे।
थोकिन मया बरसा दे न रे,हरिया जही धरती दाई के अँचरा।
कहांँ लुकाये तै ह बदरा
कहां लुकाये न

साक्षी साहू सुरभि, महासमुंद छत्तीसगढ़

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