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प्रियंका को न लड़ा, कहीं कांग्रेस ने मोदी को ज़ोर का झटका धीरे से तो नहीं दिया

(ए.के. लारी)

सवाल उठ रहे है कि क्या प्रियंका गांधी की बनारस से उम्मीदवारी को हवा देकर अंत में न लड़ाने का फैसला कर कांग्रेस ने मोदी को ज़ोर का झटका धीरे से दिया है। राजनीतिक पंडितों के तर्क अलग-अलग है। कुछ का कहना है कि कांग्रेस ने बनारस में एक दिलचस्प मुक़ाबले का डंका तो बजा दिया, टिकट भी बेच दिया, स्टेडियम भी भर गया लेकिन अखाड़े में जब पहलवान उतरे तो रिंग में मोदी अकेले खड़े दिखे। अब प्रधानमंत्री मोदी, अजय राय और शालिनी यादव के त्रिकोणीय मुक़ाबले में किसकी दिलचस्पी होगी?
सवाल यह कि कांग्रेस ने ऐसा क्यों किया। सियासी पंडित बताते हैं कि प्रियंका ने ये तीर जानबूझ कर चलाया। बनारस का फीडबैक भी जुटाया। राहुल ने भी खूब सस्पेंस बनाया। फिर अपने प्रत्याशी का ऐलान कर चौकाया भी। लोग कहने लगे, खोदा पहाड़ निकली चुहिया। दरअसल, ये कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा था। कांग्रेस नहीं चाहती थी कि चुनाव मुद्दों से हटकर व्यक्ति केंद्रित हो। 2014 में बनारस का रण कुछ इसी तरह का था। मीडिया का फोकस सिर्फ़ बनारस होता। प्रियंका के चुनाव लड़ने से पूर्वांचल में भाजपा के साथ-साथ सपा-बसपा गठबंधन को भी नुकसान होता।
सियासी पंडित बताते है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने जानबूझकर ये दाव खेला और अन्तिम समय में मोदी को अकेला रिंग में छोड़ दिया। जिससे वह कम वजन के पहलवानों से टकराते दिखे।
इससे कांग्रेस और गठबंधन का फोकस पूर्वांचल पर होगा और कमजोर प्रत्याशी देख मोदी और उनकी टीम भी बनारस में 14 की तरह कैम्प नहीं करेगी। विपक्ष की रणनीति भाजपा को मुद्दों पर घेरने की है। सियासी पंडितों का ये गणित कितना कारगर है।फैसला तो नतीजे आने पर होगा।पर एक बात तो तय है कि कांग्रेस का पिटारा खुलते ही बनारस के चुनावी रण का सारा रोमांच खत्म हो गया। भाजपा भी चाहती थी कि बनारस के रण में प्रियंका कूंदे। जिससे चुनाव व्यक्ति केन्द्रित हो। इसीलिए पीएम के रोडशो को मेगा इवेंट में बदला। करोड़ों खर्च किया। महीनों प्लान बनाया।पर ऐन रोडशो के दौरान कांग्रेस ने अपने पुराने उम्मीदवार का ऐलान कर गच्चा दे दिया। चर्चाओं का बाजार गर्म है। सबका अपना-अपना नजरिया है। अब किसकी रणनीति कितनी कारगर होती है ये तो नतीजे ही तय करेंगे।

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