चर्चा में

लंका से उठी धूल में खो गई बनारस की खुशबू

संपादकीय…

✍️ गोविंद तिवारी, राष्ट्रवादी चिंतन पत्रकार

अब चाची की कचौड़ी और पहलवान की लस्सी कहां मिलेगी?”

“कचौड़ी के भाप संग उड़ गइल बनारस के खुशबू — अब लस्सी कहां से पियब!”

अब लंका प बोलावल जाई कहां — ना चाची के कचौड़ी, ना पहलवान के लस्सी!

काशी की पहचान अगर बाबा विश्वनाथ हैं, तो उसकी आत्मा चाची की कचौड़ी और पहलवान की लस्सी जैसे मोहल्ले के स्वाद में रची-बसी थी। जो शहर अपनी गलियों में इतिहास बुनता है, वहां हर दुकान, हर ठेला, हर कुल्हड़ में परंपरा की गंध होती है। लेकिन नगर निगम के बुलडोजरों की गड़गड़ाहट में लंका की आत्मा दब गई। रविदास गेट के पास की लगभग 35 दुकानों का अतिक्रमण के नाम पर सफाया कर दिया गया। इनमें दो ऐसी दुकानें भी थीं, जिन्हें सिर्फ दुकान कहना अन्याय होगा — चाची की कचौड़ी और पहलवान की लस्सी। मैं गोविंद तिवारी राष्ट्रवादी चिंतन पत्रकार बार-बार यह बात दोहराता हूं कि काशी के सौंदर्यीकरण के नाम पर जो नीतियां लागू की जा रही हैं, वे शहर के मूलभाव और संस्कृति के विरुद्ध हैं।

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हम विकास की बात करें, यह आवश्यक है, लेकिन क्या वह विकास उस बनारस को मिटाकर हो जो हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों में गूंजता रहा है? लंका चौराहा सिर्फ एक सड़क नहीं था। वह एक संगम था — स्वाद का, संवाद का और बनारसीपन का। यहां सुबह-सुबह साइकिल से आने वाले विद्यार्थियों की भीड़ होती थी, बगल में खड़े होकर चाय की चुस्की लेने वाले बुद्धिजीवी, कचौड़ी के तसले से उठती गरम भाप और पहलवान की लस्सी की झाग… यह सब मिलकर लंका को जीवंत बनाते थे। लेकिन अब जब वहां से गुजरिए, तो न स्वाद है, न वो बात है। बस धूल है, और पीछे रह गई आंखों की नमी।मैं गोविंद तिवारी राष्ट्रवादी चिंतन पत्रकार लिखता हूं कि “विकास की परिभाषा अगर धरोहर की हत्या से शुरू हो और उद्यमियों की आत्मा को कुचलकर खत्म हो, तो वह विकास नहीं, विनाश का आरंभ है।” चाची की कचौड़ी की दुकान केवल भोजन का स्थान नहीं थी। वह उन हजारों विद्यार्थियों की सुबह थी, जो परीक्षा देने जा रहे होते, नौकरी की तैयारी में होते या जिनकी जेब में पैसे कम होते लेकिन भूख बड़ी होती। उसी तरह पहलवान की लस्सी एक स्वाद नहीं, एक परंपरा थी। कुल्हड़ में ठंडी लस्सी, ऊपर से मलाई की परत, और फिर पहलवान की हंसी — “का बिटुआ, लस्सी से दिन बन जाई का?”।

यह संवाद बनारस का अपना तरीका था कहने का कि हम यहां सिर्फ ग्राहक नहीं, रिश्तेदार हैं। लेकिन अब वह दुकान नहीं है। मंगलवार की सुबह जब बुलडोजर दुकान के सामने पहुंचा, तो पहलवान मनोज यादव ने अपनी दुकान को नमन किया। आंखों में आंसू और हाथ जोड़े, जैसे कोई अपने पूर्वज की समाधि पर खड़ा हो। कुछ ही मिनटों में वह सब मिट गया, जिसे बचाने के लिए किसी ने आवाज तक नहीं उठाई। मै गोविंद तिवारी राष्ट्रवादी चिंतन पत्रकार कहना चाहता हूं कि प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह व्यवस्था बनाए, लेकिन यह भी जरूरी है कि व्यवस्था में संवेदनशीलता और स्थानीय जीवन के प्रति सम्मान बना रहे। क्या इन दुकानों को पुनर्स्थापित करने की कोई योजना बनाई गई? क्या वर्षों से वहां जीवन यापन कर रहे दुकानदारों को कोई वैकल्पिक स्थान दिया गया? काशी का स्वरूप तभी सुंदर लगेगा, जब उसमें उसकी आत्मा जीवित हो। अगर हम उसकी आत्मा को मलबे में दबा देंगे, तो काशी का सौंदर्य सिर्फ पत्थरों का प्रदर्शन बनकर रह जाएगा। लंका का वह इलाका अब वीरान लग रहा है।

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जहां कभी सुबह-सुबह कचौड़ी तलने की आवाज आती थी, वहां अब पुलिस की तैनाती है। जहां लस्सी की खुशबू थी, वहां अब धूल उड़ रही है। यह दृश्य देखकर बनारसी दिल रो पड़ा। कई बुजुर्ग स्थानीय निवासी कह रहे थे — “अब का बचल ह? इ लंका नइखे, ई त बर्बादी ह।” प्रशासन का यह निर्णय अगर नियमानुसार भी था, तो उसे मानवीय दृष्टि से देखना भी आवश्यक था। पूर्व सूचना, पुनर्वास और संवाद जैसे बिंदु कहीं नजर नहीं आए। यह सवाल बनारस के हर नागरिक के मन में है — क्या काशी के सौंदर्यीकरण में बनारसी गंध मिटा दी जाएगी? मै गोविंद तिवारी राष्ट्रवादी चिंतन पत्रकार कहता हूं कि, बनारस जैसे शहर में “विरासत संरक्षण क्षेत्र” बनाए जाने चाहिए, जहां ऐसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण दुकानों को संरक्षित रखा जाए। अगर शहरों को केवल सरकारी नक्शों पर देखकर बदला जाएगा, तो वहां से वह आत्मा चली जाएगी जो उन्हें जीवंत बनाती है। बनारस की आत्मा है उसकी सहजता, उसकी मिठास, और उसकी परंपराएं। जब हम इन परंपराओं को बुलडोजर से मिटा देंगे, तो बचेगा क्या? चाची की दुकान पर कभी गरीब भी खाता था, तो उसे सम्मान मिलता था। पहलवान की लस्सी में चाहे पैसे पूरे न हों, लेकिन प्यार पूरा मिलता था। यह वह बनारस था जो हर किसी को अपनेपन से भर देता था। यह वह संस्कृति थी जो सिर्फ घाटों पर पूजा करके नहीं, बल्कि हर मोड़, हर दुकान, हर ठेले से बहती थी। आज जब प्रशासन ने इन दुकानों को तोड़ा, तो यह तो बता दिया कि शहर सुंदर दिखेगा, लेकिन यह नहीं बताया कि वह सुंदरता किनकी कीमत पर आई। न तो पहलवान को कोई नई दुकान मिली, न चाची की कचौड़ी अब कहीं तल रही है। मै गोविंद तिवारी राष्ट्रवादी चिंतन पत्रकार यह चेताना चाहता हूं कि अगर हम ऐसे निर्णय लेते समय संवेदना को भूल जाएंगे, तो एक दिन बनारस अपनी जड़ों से कट जाएगा। और एक जड़ से कटा हुआ शहर कभी भी संस्कृति का केंद्र नहीं रह सकता। प्रशासन को चाहिए कि वह इस विषय को गंभीरता से ले। चाची की दुकान और पहलवान की लस्सी जैसे नाम सिर्फ बनारस के स्वाद नहीं थे, वे उसकी पहचान थे। उन्हें दोबारा स्थापित किया जाना चाहिए। लंका की परंपरा को वापस लाने की पहल होनी चाहिए। बनारस को यदि हम सच में स्मार्ट बनाना चाहते हैं, तो हमें उसे संवेदनशील बनाना होगा। हमें उसके दिल को नहीं तोड़ना होगा। यह समय है पुनरावलोकन का, न कि केवल कार्रवाई का। यह समय है पुनर्सृजन का, न कि ध्वंस का। लंका की वह धूल जो मंगलवार को उठी, उसने न सिर्फ दुकानों को ढका, बल्कि बनारस की उस आत्मा को भी ढक दिया, जिसे अब उठाने के लिए संवाद, सम्मान और सहानुभूति की ज़रूरत है।

लेखक गोविंद तिवारी के बनारस को लेकर लिखे ये शब्द अक्षरशः मन में चुभ रहे। उनके शब्दों में बनारस की आत्मा कराह रही है लेकिन उसका एहसास करने वाला कोई नहीं है। तिवारी अपने लिए राष्ट्रवादी चिंतन पत्रकार (काशी की आत्मा की आवाज बनकर लिखने की बात कहते हैं जो बिल्कुल सही है और जो बनारस को जानता है जीता है वह समझ सकता है। उनके शब्दों में बनारस की परंपरा को बचाने की सुगंध आती है।

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