लघुकथा : दादागिरी
चौराहे पर कुछ लोग डंडे के इशारे से वाहनों को रोक रहे थे और एक डिब्बा सामने कर रहे थे जिसमें लोग पैसा डालकर आगे बढ़ जाते . कुछ लोग इस घटना को मोबाइल में कैद भी कर रहे थे .
“क्या हो गया ? क्यों तमाशा लगा रखा है ? तुमने बकार ही ट्रेफिक रोक दिया है . हटो आगे से , मुझे देर हो रही है .” एक पत्रकार बोला .
“अरे! साहब को जरा जल्दी पहुंचा दो .” वह अपने साथियों को संबोधित कर बोला . तीन चार लोगोग गाडी के पहियों की हवा निकालने लगे . तो वह बाहर आया .
“अरे! रोको इन्हें .” और जेब से दस का नोट निकालकर डिब्बे में डाल दिया .
“हवा भरी नहीं है जो टिप दे रहे हो . निकाली है . श्रद्धा और औकात क्या दस रुपये की ही है तेरी ?” वह लड़का डिब्बा हिलाते हुए गुर्राया .
“एक तो गैर कानूनी काम कर रहे हो और ऊपर से दादागिरी . जानते नहीं मैं पत्रकार हूँ . अभी फोन किया तो तेरी अक्ल ठिकाने आ जायेगी .”
फटाक …की आवाज से उसके कान में सीटी बजने लगी .
“साले! जब राजनैतिक पार्टियां चंदा लेकर भी किसी को बताने के लिए बाध्य नहीं हैं तो हम क्यों ? कहाँ मर गया था तेरा अखबार जब लोकतंत्र में चोर घुस रहे थे ? जब पानी नहीं आता, लोग मरते हैं तो तुम चुप रहते हो . बस तुम्हें चाहिए बलात्कार, डकैती और नेता जी की कुतिया का ब्याह . जा कर दे रिपोर्ट . अबे! यहाँ पुलिस भी सर झुकाती है . मैं अपने लिए नहीं उन बूढों के लिए दादागिरी करता हूँ .” लड़के ने उसकी मुंडी पकड़कर एक और कर दी . जहाँ पर कई लोग बैठे हुए थे लाइन में एक दरी पर .
पत्रकार ने पर्स से पांच सौ का नोट निकाला और गाडी स्टार्ट कर आगे चला गया .
शब्द मसीहा

