चर्चा में

भाई, ये टीके होते ही हैं छलिया, बने तो बनते-बनते बनेंगे; नहीं बने तो कभी नहीं

वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा की कलम से…

यूंकि केजरीवाल ने बतला दिया है और मोदीजी ने जतला दिया है कि हमसे जो हो सकता था कर लिया, अब तुम अपना-अपना देख लो और कोरोना के साथ रहना सीख लो..। जब घर में बहू आ ही गई है तो लल्ला प्यार भी होइये जाएगा..। तो भैये ऐसा है, अब दो ही बातें हो सकती हैं- या तो कोई दवा या टीका आएगा और इस बला से पिंड छुड़ाएगा या फिर वही होगा जो दो दिन से दारू के ठेकों के बाहर हो रहा है…कोई नई बात तो है नहीं- होइहि सोइ जो राम रचि राखा..

यूंकि अब कल ही भक्तों के फेवरेट देश इज़रायल के रक्षा मंत्री ने बताया कि अपनी ‘क्रिएटिविटी’ और ‘यहूदी दिमाग’ (आपने सही पढ़ा! कुछ अंग्रेज़ी अखबारों ने बयान के तर्जुमे में यहूदी दिमाग की क्रिएटिविटी भी लिखा है, लेकिन बात एक ही है) के बूते उनके वैज्ञानिक कोरोनावायरस को चित्त करने वाली एंटी-बॉडी बना चुके हैं. अब ये एंटी बॉडी बोले तो सेल की दुनिया का ऐसा कमांडो जो बॉडी में घुसकर कोरोनावायरस पर सीधे सर्जिकल स्ट्राइक ठोक सकता है. अब इज़रायली छाप है तो इसके मारकपन पर भी आपका ज़्यादा भरोसा उमड़ रहा होगा…

लेकिन अपना ताऊ वहां के याहू जैसा ‘मैचो’ क्यों नहीं, ये ऐहसास-ए-कमतरी मन में आए, इससे पहले तीन बातें जान लें- क) मंत्री नफ्ताली बैनेट ने ये कहीं नहीं बोला है कि एंटी-बॉडी का आदमियों के शरीर के भीतर भी परीक्षण हो गया है- यानी सर्जिकल स्ट्राइक तो हुई है लेकिन अभी सिर्फ अपने अखाड़े में, ख) उन्होंने ये भी नहीं कहा है कि बस भैये कूरियर वाला खोज रहे हैं, उसके बाद हफ़्ते भर में ही अपने तिवारी जी एंटी-बॉडी की सप्लाई के ट्रक को झंडी दिखा रहे होंगे (पीछे से!), ग) क्या कहने वाला था- गो कि इतना शानदार बादल यहां सामने बनता हुआ दिख रहा है- कि याद ही नहीं रहा!

वैसे आज भक्तों के एक और फेवरेट देश इटली से भी अच्छी खबर आई है..। (नहीं, नहीं..मतलब ये थोड़ी कि अब आगे पढ़ोगे ही नहीं..!) वहां के वैज्ञानिकों ने चूहों के अंदर कोरोनायरस के किलर एंटी-बॉडी बना लिए हैं..लेकिन बात वही! असली मैदान आदमी का शरीर है, और पट्ठा वहां भी चलेगा, ये जानने में अभी वक्त लगेगा..( अगर फुर्सत हो तो टेस्टिंग के फेज़-वन, फेज़-टू, फेज़-थ्री क्या होवे हैं, ये पढ़ लिय्यो जाके!)

अभी पिछले हफ़्ते तक जब माई फ्रेंड ट्रंप रोज़ कैमरों के सामने आते थे, और पत्रकारों को सौतन वाली खरी-खरी सुनाकर निकल लेते थे, उनके बाद एक चच्चा और आते थे एंटनी फॉसी,. हिंदी वाले हैं तो यकीनन आपने उन्हें नहीं देखा होगा, क्लाइमेक्स के बाद मेकिंग के सीन कौन देखता है! क्या है कि मीडिया वालों को मसाला ट्रंप से मिलता था और जानकारी फॉसी से..भाई, अब है बंदे में इतनी सलाहियत की पूरी दुनिया इज़्ज़त करती है..व्हाइट हाउस में नौकरी ऐसे ही थोड़ी मिलती है. तो फॉसी साहब का कहना है कि अगर डेढ़ साल में भी हमने कोरोनावायरस का टीका खोज लिया तो ये वर्ल्ड रिकॉर्ड स्पीड होगी..

भाई, ये टीके होते ही हैं छलिया, बने तो बनते-बनते बनेंगे; नहीं बने तो कभी नहीं. हाल ही में चीन की कंपनी कैनसिनोबायो ने 3 साल में इबोला के टीके को मंज़ूरी के लिए तैयार किया तो इसे सहवाग सरीखी एवरेज से सैंकड़ा ठोकने जैसा माना गया. 1984 में एड्स का वायरस खोजने के बाद अंकल सैम भी यही बोले थे कि बस अब साल-दो साल में इलाज खोज ही लेंगे… 40 साल हो गए जनाब! बीच में 1997 में क्लिंटन ने भी कहा था कि अमेरिकियों अगर है तुममे दम तो अगले 10 साल में दिखा देंगे…घंटा! 2020 आ गया है अब तो..

आप तो ये सोचो कि क्या होगा अगर टीका आया ही नहीं तो…तो भी दो बातें हो सकती हैं..

एक तो ये हो सकता है कि भले ही इलाज ना आए लेकिन उससे बचने का कोई टॉनिक वगैरह मिल जाए..म्हारे हिमाचल में आजकल सांसदों को ऐसे ही काढ़ों के प्रमोशन का काम मिला है..लेकिन अपुन बात थोड़ा सीरियसली कर रहा था..बीमारी का इलाज ना सही अगर लंबा खींचने की दवा ही मिल जाए..कम से कम अस्पतालों और वेंटिलेटर का खर्चा तो कम होगा और हम मज़े से बम, बंदूके बनाते रहेंगे..लेकिन उसमें भी आपकी जेब का साइज़ मायने रखेगा..

दूसरा…ना तो कोई टीका मिले ना कोई इलाज…यानी सच्ची-मुच्ची कोरोना के साथ इंसानियत की अरेंज मैरिज हो जाए..ऐसे में दो बातें नहीं, अनेक बातें होगीं- फिर इस जन्म में मुलाकात हो ना हो का ब्लैकमेल करके भी किसी को गले लगाने के लिए नहीं पटा पाओगे….हो सकता है छींक देने पर बॉस खुद ही हफ़्ते भर के लिए छुट्टी पर रवाना कर दे..साथ ही साथ बगल वाले दो-चार का भी शॉर्ट ट्रिप लगाने का उद्धार हो जाए..लेकिन इत्ता खुश ना हो..मालिकान बड़े कमीने होते हैं…नकली छींक पकड़ने की कोई ना कोई तरकीब खोज ही लेंगे…बुखार हो सकता है किसी का मोहल्ले में हुक्का-पानी ही बंद करवा दे..नकाब साला एंटी नेशनल था लेकिन माशूका के लिए फिर ना गाना पड़ जाए..मुख से ज़रा मास्क हटा दो मेरे हजूर..!

और..स्विटज़रलैंड की बर्फ में साड़ी पहनकर झूमती हिरोइनें मन को नहीं जलाएंगी..स्विटजरलैंड जा ही कौन पाएगा सिवाए वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम वालों के! दिल्ली टू उत्तराखंड के लिए भी पता चला अलग से हेल्थ टोल प्लाजा बना दिए हैं..

जब एक-आध करोड़ खप-वप जाएंगे तो हर्ड इम्युनिटी हमें बचा ही लेगी! नॉट हर्ड ऑफ हर्ड इम्युनिटी..? कैसे बूझेंगे, जब गोस्वामी जी नेहरू जी से पूछे ही नहीं अब तक? पता चलेगा जब चौधरी जी वाला डीएनए टेस्ट आएगा..तब तक इत्ता समझ लीजिए कि ई आग का दरिया है और डूब के जाना है…झुंड में ही चलना है, झुंड में ही मरना है और झुंड में ही पार लगना है! हट साला भेड़ कहीं के!

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