यह बात 1997 की है, जब दिवंगत अटलजी प्रधानमंत्री के रूप में भूत हो चुके थे। तेरह दिवसीय पीएम बनकर पद को निर्मल ढंग से छोडकर अपनी छवि को और उज्ज्वल किया। 1997 में दिल्ली की एक संस्था की ओर सू 20-25 पत्रकारों को सम्मानित किया जाना था। सम्मान से मैं किस कारण विभूषित हो रहा था यह तो कई बार सम्मानित होने के बाद भी बूझ नहीं पाया। हां तो पुरस्कार सम्मान चूंकि अटल जी से मिलना था और आयोजकों के मान मनुहार से मैं भी मन ही मन रोमांचित था। कार्यक्रम के दिन कंस्टटीट्यूशन क्लब के सभागार में अटलजी का इंतजार किया जा रहा था।
अनामी शरण बबल तभी थोड़ी देर में देखा कि मोहक मनोहर सदाबहार मुस्कान बिखेरती हुई सुषमा स्वराज सभागार के अंदर प्रवेश की। श्रीमती सुषमा को देखकर मन तो खिल उठा मगर अटलजी के नहीं आने की संभावना से ज्यादातर उपस्थित जनसमूह का मन बूझ सा गया। मगर मंच पर आसीन श्रीमती सुषमा ने लोगों की भावनाओं को ताड कर फौरन माइक पर आ गयी। अटलजी की तरफ से क्षमा मांगी उन्होंने कहा कि एक जरूरी काम के चलते मुझे अपने घर पर बुलाकर बतौर प्रतिनिधि जाने का आदेश दिया। चतुराई से मोहक अंदाज में बातो को मोड़ने में माहिर सुषमा की सफाई से माहौल खिल उठा। लगभग सभी की शिकायतें खत्म हो गई। पुरस्कार सम्मान आरंभ करने से पहले तमाम पत्रकारों के नाम का उल्लेख करके पूरे माहौल को सुषमामय कर दिया। इस घटना के बाद बतौर प्रधानमंत्री की तेरह माह वाली दूसरी पारी का दौर शुरू हो गया था। दिल्ली नगर निगम चुनाव अभियान के दौरान फिरोज दिल्ली गेट के अंबेडकर स्टेडियम के निकट शहीद पार्क के पास जनसभा थी। जांच की कड़ी व्यवस्था थी। अमूमन पत्रकारों को अपना कार्ड दिखाने पर जांच की औपचारिक बाध्यता से मुक्ति मिल जाती है। जनसभा से पहले वे पत्रकारों से बतिया रहे थे और मैं जांच सुरक्षाकर्मियों की औपचारिक में ही फंसा हुआ था। मैंने जरा जल्दी करने की गुहार की तो एक सुरक्षाकर्मी ने मेरे शरीर पर हाथ फेरते हुए टोह लेने लगा और मेरे घुटनों पर लगे नीकैप को देखकर आशंकित हो उठा। मैंने फॉर दोनों पैर के घुटने में लगे नीकैप को फौरन निकालकर जांच टेबल पर निकाल फेंका। इसे क्यों पहनते हैं? मेरी तरफ सवाल उछाला गया। मौके की नजाकत और गंभीरता को देखते हुए प्रतिवाद करना नुकसानदेह हो सकता था तो जरा अनुनय के साथ बोला कि सर एक एक्सीडेंट में एक पांव का घुटना टूट गया है तो कभी-कभी पांव की लचक से बचने के लिए ही पहनता हूं और जांच अधिकारी के हाथ को पकड कर जबरन उसके हाथ को अपने घुटने पर् ले जाकर रख दिया। घुटने के कटोरी को नदारद देखकर वह चौंक उठा। आवाज और अंदाज में सहानुभूति आ गयी। जांच खत्म होते ही मैं दोनों नीकैप को हाथ में पकड़े ही फौरन अंदर गया। मेरी हडबडाहट और हाथ में नीकैप को देखकर अटलजी बोलें क्या लेकर आए हैं? मैंने शिकायती लहजे में कहा कि आपकी सुरक्षा में तैनात अधिकारियों को घुटने पर लगे इस पैजामें (नीकैप) पर संदेह हो रहा था तो उतारना पडा। नीकैप को पजामा कहे जाने पर वे खिलखिला उठे। जनसभा के लिए मंच पर जाने से पहले किसी बात पर अपने नाटकीय लहजे में अटलजी बोल उठे मैं किसी का कर्ज या बकाया नहीं रखता। यह बात सुनते ही मैं फौरन टपक पडा़। मेरा एक कर्ज तो आप पर अभी तक उधार है। मेरी बात सुनकर वे अचंभित हो गये। कौन सा कर्ज बकाया है। मैंने पुरस्कार सम्मान कार्यक्रम की घटना दोहरा दी। कि टंकित है कि अटलजी से यह सम्मान मिल रहा है पर हकीकत में तो यह सुषमा स्वराज जी के मार्फत दिया गया। आपका हिस्सा तो बाकी ही है। इस पर मोहक मुस्कान के साथ हाथों को नचाते हुए बोले। नहीं कोई बकाया कभी नहीं रहेगा और खासकर पत्रकारों का कोई बकाया कभी नहीं। इसके बाद अटलजी की पीएम वाली तीसरी पारी पांच साल की रही। मगर फिर कभी मुलाकात नही हुई। 2004 में दोबारा भूत हो जाने के बाद भी सार्वजनिक जीवन से लोप हो गये इस अद्भुत व्यक्तित्व से फिर मेलमिलाप नहीं हो सका और इस तरह मेरे और उनके बीच का हिसाब बराबर नहीँ हो सका। इसके बावजूद किसी शिकायत के बगैर इस मोहक पुरुष और भारत रत्न से विभूषित कवि ह्रदय अटलजी को भावभीनी श्रध्दांजलि।
लेखक- अनामी शरण बबल रांची एक्सप्रेस में एडिटर हैं।