खास-मेहमान

कीमती

“पापा ! दादा -दादी भी चल रहे हैं हमारे साथ .” बेटे ने पिता से पूछा .

माँ ने झिडकते हुए कहा – “नहीं , वो क्या करेंगे वहाँ ?”

“बेटा ! घर की देखभाल के लिए किसी बड़े का रहना जरुरी है इसलिए दादा-दादी हमारे साथ टूर पे नहीं जा रहे हैं .” पिता बोला .

“तब उनका ख्याल कौन रखेगा ?”

“अरे! नौकर हैं न …वो लोग दादा-दादी का ख्याल रखेंगे . चलो बेटा देर हो जायेगी .” माँ ने जवाब दिया .

“ओके …तिजोरी की चाबी कहाँ है ? क्या उसकी देखभाल भी नौकर करेंगे ?” बेटे ने सवाल किया .

“नहीं, मैंने चाबी को लोंकर में रख दिया है . नौकरों के हवाले तिजोरी नहीं छोड़ सकते बेटा .” माँ ने जवाब दिया .

“अरे! पापा , जब तिजोरी नौकरों के हवाले नहीं छोड़ सकते तो दादा-दादी को नौकरों के हवाले कैसे छोड़ सकते हैं , क्या दादा-दादी कीमती नहीं हैं ?”

शब्द मसीहा

One thought on “कीमती

  • रत्नेश सिंह

    Marmik

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