खास-मेहमान

राधे-राधे

“अबे! सुहैल , कैसे नामाकूल हो यार ! मसीहा की पोस्ट पे राधे-राधे लिख दिया. याद नहीं रहा कि तुम दोस्त होने से पहले मुसलमान हो. “अनीस भाई गरियाते हुए बोले.

“हा हा हा ….पगला गए हो का बे ? का गलत किया है हमने . अबे! जब रहीम साहब , नज़ीर साहेब , रसखान साहेब को हिन्दू लोग सर आँखों पे उठा सकते हैं तो हम क्या इतने गरीब हैं कि आत्मा की आवाज को भी दबा दें ?” सुहैल बोला .

“क्या मतलब है तुम्हारा ? राधे-राधे में कैसी आत्मा की आवाज ? वो तो कृष्ण ग्वाले की प्रेमिका थीं .”

“यही तो फर्क़ है भाई जान ! हम दूसरे की बात को सुनते समझते हैं नहीं और ठप्पा लगा देते हैं मजहब का . प्यार को तकसीम नहीं करना चाहिए . वो न हिन्दू है …न मुसलमान …प्यार इबादत है . तुम राधा को जिस्म समझते हो . मगर राधा तो रूह है जो परवरदिगार के लिए तड़पती है . क्या तुम्हारी रूह तुमसे बात करती है ?” सुहैल बोला .

“क्या बात कर हो भाईजान , रूह भी बात करती है क्या ?”

“हाँ, रूह भी बात करती है . शायर की रूह उससे बात करती है . जानते हो हमारी असली परेशानी क्या है ? असली परेशानी है कि हम सिर्फ अपने सच को सच मानते हैं , दूसरे के सच को तस्लीम नहीं करते …एक शे’र सुनिए

नकली मंदिर मस्जिदों में जाए सद अफ़सोस है
कुदरती काबे का साकिन दुःख उठाने के लिए ।

कुदरती काबे की मेहराब में सुन गौर से
आ रही धुर से सदा तेरे बुलाने के लिए ।

क्यों भटकता फिर रहा तू ऐ तलाशे यार मे ,
रास्ता शाह रग मे है दिलबर पे जाने के लिए ।

मुर्शिदे कामिल से मिल सिदक और सबुरी से ताकि,
जो तुझे देगा फहम ,शाह रग के पाने के लिए।

गोशे बातिन हो कुशादा जो करे कुछ दिन अमल,
ला इलाहा अल्लाह हू अकबर पे जाने के लिए।

“अमां भाई जान ! ये तो किसी अपने मुसलमान भाई ने ही लिखा होगा . वाह क्या बात कही है …लाजवाब …माशाल्लाह .”

“हा हा हा ….ये भी सुन लो भाईजान …

यह सदा तुलसी की है आमिल अमल कर ध्यान दे,
कुन कुरां मे है लिखा अल्लाह हू अकबर के लिए।” सुहैल बोला .

“तुलसी !…मतलब …कोई हिन्दू ? नामुमकिन . इतनी खूबसूरत बात कोई हिन्दू और वो भी असली दीन के बारे में कहे ….भरोसा नहीं होता .” अनीस ने कहा.

“हाँ, सही कहा आपने . हमें उस अल्लाह , ख़ुदा या भगवान् पे भरोसा ही नहीं रहा , तभी तो हम फसाद पैदा करते हैं . क्या ख़ुदा इतना कमजोर है कि उसके लिए पिद्दी से आदमी को लड़ना पड़े ? मगर आदमी गुरुर में गाफ़िल है अपने. वो नहीं जानता कि वो अपने अलफ़ाज़ से किसी का दिल दुख रहा है. अरे! जहाँ ख़ुदा रहता है उस दिल को मत दुखाओ भाई …यही दीन कहता है. अब बताओ …क्या मैं मुसलमान नहीं हूँ ?”

“भाईजान ! आप सही कहते हैं . मुआफ़ कर दीजिये मुझे . मैं इल्म में अँधा था और तुम इबादत की रौशनी में …राधे-राधे .”

शब्द मसीहा

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