यूं ही कोई कलेक्टर, दरोगा नहीं बनता!
तिरछी नजर…
डा०अरविंद सिंह
एक कलेक्टर को एक साथ कई-कई भूमिकाएं निभानी पडती है। कभी उसे कलेक्टर बनना पडता है, तो कभी जिला मजिस्ट्रेट। कभी-कभी उसे दरोगा भी बनना पड़ता है। जब कलेक्टर दरोगा बन जाता है तो उसे सभी जान जाते हैं। जिसको नहीं जानना चाहिए, वह भी। लेकिन एक कलेक्टर दरोगा क्यों बन गया, इस पर भी विचार करना चाहिए। जो कलेक्टर पर्वतारोही बनकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी ‘माउंट एवरेस्ट’ को भी अपने कठोर इरादों से फतेह कर दिया हों, उसे चकमा दोगे तो क्या करेगा। तुलसी बाबा ऐसे ही नहीं लिखे होगें। विनय न मानत..जलधि जड…
फिर ऐसी गंभीर परिस्थिति में
‘हे पार्थ! ‘डंडेमातरम’ अवश्य संभावी हो जाता है।’
वैसे व्यक्तिगत रूप से मैं हिंसा के खिलाफ हूं, लेकिन यह भी सर्वमान्य सिद्धांत है कि शांति की स्थापना सदा से शक्ति से ही तो हुई है।
वैसे आजमगढ के एक्सीयन साहब से डीएम साहब, जिलाधिकारी बनकर जनहित की सूचना मांग रहे थे तो इंजीनियर साहब आना-कानी कर रहें थें। अब आप ही सोचिए बरसात आसन्न है जब बाढ़ग्रस्त गांवों की सूचना देने में इतना आना कानी, तो बचाव और सुरक्षा के इंतजाम में कितना विलंब होगा। ऐसे में ‘कुटम्मस’ बनता है की नहीं! आप ही बताइए। वंदेमातरम के देश में- ‘डंडेमातरम’ से पहले डीएम के ओएसडी द्वारा इंजीनियर साहब की मोबाइल कमरे से बाहर ही रखवा लेने के आरोप पर मत जाइए, इस पर भी मत जाइए कि कमरे के भीतर कितने जगहों पर, किस किस एंगिल से डंडेमातरम हुआ? शरीर के किन किन अंगों ने इस सात्विक अनुभव को महसूसा। यह तो भविष्य में पुरुआ और पछुआ हवा तय ही कर देगी। आज के हालात में आप इस विषय पर सोचिए और विचारिए कि-वह कौन सी परिस्थिति रही होगी, जिसने एक नौजवान कलेक्टर को दरोगा बनने पर विवश कर दिया होगा।यूं ही कोई कलेक्टर दरोगा नहीं बनता! और जब-जब बनेगा तो शारीरिक समीक्षा तो करेगा ही। बाकी के विभाग और उनके प्रशासनिक अधिकारियों से जनहित में अपील है कि हमारे कलेक्टर को कलेक्टर ही रहने दीजिए..
बाकी आप स्वयं समझदार हैं।।


जिलाधिकारी को यही नहीं पता की बाढ से विस्थापित गांव की सूची बनाना राजस्व का काम है।लेकिन आप को क्या ,आपको तो दलाली करनी हैं