खास-मेहमान

शब्द मसीहा की गजब कहानी : इंसानियत का धर्म

बद्रीप्रसाद शहर से लौट रहा था . राह में सुरेन्द्र दुबे और रोहित चौबे भी बैठे हुए थे . बद्रीप्रसाद को उदास देख सुरेन्द्र ने कहा –

“भाई ! बद्रीप्रसाद राम राम . कहाँ से आ रहे हो ? कुछ उदास लग रहे हो !”

“भैया जी ! शहर गये थे बैंक में लोंन की अर्जी लगाने . पर वहाँ काम होगा ऐसा लगता नहीं है हमको .”

“क्यों भाई ! ऐसा क्यों कहते हो ?”

“भैया जी ! ऐसा लगा कि हम आज चाहे इक्कीसवी सदी में जी रहे हों मगर हमारी जाति की खुशबू अब भी इनके दिमाग में बदबू बनकर भरी हुई है .”

“हा हा हा ….अरे ! बद्रीप्रसाद…अब दुनियाँ बदल रही है . वैसे कितना लोन चाहिए तुमको ? कौन से बैंक में अर्जी दी है .”

“एक लाख का लोन है और वो भूतेश्वर वाले बैंक में अर्जी दी है .” बद्रीप्रसाद बोला .

“ह्म्म्म …चिंता की कोई बात नहीं है . अगले हफ्ते मैं भी चलूँगा साथ में .” सुरेन्द्र बोला .

बद्रीप्रसाद अपने घर की तरफ चला गया . बेटी का एडमिशन करवाना था उसे इसलिए पैसों की जरुरत थी . अब उसके रिश्तेदार और गाँव का कोई भी उसकी जाति का आदमी इतना अमीर तो था नहीं कि उसकी मदद कर सकते सोमवार के रोज गाँव के दसियों लोग तैयार थे उसके साथ जाने कू सुरेन्द्र ने सबको पहले ही अपनी प्लानिंग बता दी थी . सब लोग शहर के उस बैंक में पहुँच सीधे मेनेजर के कमरे में पहुँच गये .

“मैनेजर साहब ! आपके बैंक में भेदभाव होता है . इसलिए हम सब यहाँ से अपने खाते बंद करवा रहे हैं .”

“अरे! भाई ये कैसे हो सकता है ? किस ने किया है ये ? आप तो हमारे ग्राहक हैं सालों का साथ है . बात क्या है वो बताइए ?”

“ये बद्रीप्रसाद है . इसके साथ बदसलूकी हुई है और एक हफ्ता हो गया इसका लोन भी पास नहीं हुआ . हम सब अपना पैसा निकालकर दूसरे बैंक में जमा करवाएंगे और इनके एक लाख का इंतजाम हम खुद करेंगे .”

“आप रुकिए ! मैं जरा उनको बुलाता हूँ . हम तो गरीबों की मदद के लिए लोन देते हैं . सरकार के आदेश हैं , फिर ये ऐसा कैसे कर सकते हैं .”

कुछ देर बाद ही वह कर्मचारी मैनेजर के सामने था . वह बद्रीप्रसाद को देख ठिठक गया था .

“जी साहब ! आपने इनकी खातिर बुलाया है मुझे . साहब इनके जैसे लोग पैसा लोन पर लेते हैं और वापिस नहीं करते . इन छोट लोगों का काम ही ये है .” वह बोला .

“हम्म्म ..हम यहाँ किस लिए बैठे हैं . इनका केस आपने मुझे क्यों नहीं दिखाया ? जानते हैं आप की वजह से मेरे बैंक के बीस कस्टमर अपने खाते बंद करवा रहे हैं . हम यहाँ पर जातिवाद फैलाने के लिए बैठे हैं या लोगों की मदद के लिए ? इनकी फ़ाइल लाइए !” वह फ़ाइल लेने चला गया . बद्रीप्रसाद के चेहरे पर आशा की किरण दौड गई . मेनेजर ने फ़ाइल देखी और बोला –

“देखिये इनकी फ़ाइल में बस एक ही कमी है कि इनका कोई गारंटर नहीं है .बाकी कोई कमी नहीं है .”

“अरे! हम सब गारंटी देने को तैयार हैं बद्रीप्रसाद की . हमारे गाँव की होनहार बेटी है चम्पा . कहाँ शाइन करने हैं आप बताइये !”

मैनेजर ने साइन करवाए और एक घंटे रुकने को कहा . वे लोग वहीँ इंतज़ार करते रहे . एक घंटे बाद सुरेन्द्र फिर मेनेजर के पास गया .

“भाई साहब ! मैं उसकी सजा उसको दूंगा . लेकिन मुझे ख़ुशी है कि आप का गाँव जागरूक और एक दूसरे की मदद करने वाला है . बद्रीप्रसाद जी को बुलाइए उनका लोन पास हो गया है और उनके खाते में पैसे भी पहुँच गये हैं .”

सुरेन्द्र ने सभी को ये बात बताई . बद्रीप्रसाद के चेहरे पर रौनक आ गई . उसकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू थे .

“अरे! भाई बद्रीप्रसाद ! हम सब एक हैं और जाति का धर्म गया पुराने जमाने के साथ . अब तो इंसानियत का धर्म चलेगा .” सुरेन्द्र ने बद्रीप्रसाद को अपने गले से लगाते हुए कहा .

बस फिर तो सभी ने बद्रीप्रसाद को गले मिलकर बधाई दी और आश्वासन भी की अगर कोई भी जरुरत हो तो सब उसके साथ हैं .

शब्द मसीहा

One thought on “शब्द मसीहा की गजब कहानी : इंसानियत का धर्म

  • amit kumar yadav

    👌👌👌

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