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“अवंतिका विशाल” की सोलह रचनाएं

@ अवंतिका विशाल, पंजाब…

अब हम मुक़्कमल आराम चाहते हैं…

इन थके काँधों को आकर थाम ले तू ,
अब हम मुक़्कमल आराम चाहते हैं ..

जाने कब टूट जाए ये जीवन की डोर ,
लड़खड़ाते क़दमों में लगाम चाहते हैं ..

गुज़ारे संग जिंदगी के खुशनुमा लम्हे ,
तुझ संग थोड़े से लम्हे उधार चाहते हैं ..

देखे उतार चढ़ाव हमने तेरे साथ साथ ,
महसूस कर अब हम विराम चाहते हैं ..

रूखसत होने से पहले हो दीदार तेरा ,
तुझ संग इक़ हसीन शाम चाहते हैं ..

सिर्फ़ इक़ आखरी मुलाक़ात चाहते हैं ,
अब हम मुक़्कमल आराम चाहते हैं..


सुना है अब मोहब्बत नहीं उसे हमसे…

फ़लक पर दूर एक महताब रहता है।
मिरे सफ़हों पे बन वो किताब रहता है॥

मिरी रहगुज़र से जब भी वो गुज़रता है।
शमशीर चला के देता वो खिताब रहता है॥

शाम ढले तक बाँहों में पनाह रखता है।
अँधेरों में चिराग़ों सा वो आफ़ताब रहता है॥

ख़ामोशियों को शूल बन कर चुभता है।
हर पल मुझसे वज़्ह-ए-इताब रहता है॥

सुना है अब मोहब्बत नहीं उसे हमसे।
हम बेख़बर नादां थे वो देता ताब रहता है॥


टुकड़े-टुकड़े हो बिखर गए .. फिर ना जुड़ पाए कभी ..!!

मैं एक खुली किताब थी ..
जिसका हर एक पन्ना कोरा था ..
तुमने इस कोरे पन्ने को ..
प्यार की स्याही से भर दिया ..
इसे पहले खंगाला तुमने ..
फिर दिल से पढ़ा इसे ..
तुमने इसका हर पन्ना ..
बेशकीमती रंगों से रंग दिया ..
अनमोल लफ़्ज़ों से सजाया ..
वक़्त की तपिश से बचाया ..
अपनी प्यार की नमीं से सींचा ..
मेरी ज़िंदगी के हर लम्हे को ..
ख़ुशियों से दिलनवाज़ा ..
जी भर कर जी लगा पढ़ा मुझे ..
पर ज़िंदगी के झंझावातों में ..
पन्ने कब कैसे जर्जर हुए ..
टुकड़े-टुकड़े हो बिखर गए ..
फिर ना जुड़ पाए कभी ..!!


पर क्या परवाह की है कभी .. कितनी टूट कर जुड़ जाती हूँ..!!

अनायास ही मुस्कुराती हूँ ..
कोई गीत रच डालती हूँ ..
फिर उसे ..गुनगुनाती हूँ ..
हमेशा ख़ुश तो नज़र आती हूँ ..
पर क्या कभी तुमने मुड़कर देखा है ..
जाने कितने ..ग़म छुपाती हूँ ..!!

सजती हूँ ..ख़ुद को संवारती हूँ
कर तो लेती हूँ सोलह श्रृंगार ..
ओढ़ लेती हूँ रंगीन दुपट्टा
पर इस पोटली में जाने ..
कतने ज़ख़्म बांध लेती हूँ …
पर क्या कभी एक नज़र देखा है..
ख़ूबसूरत कब नज़र आती हूँ ..!!

आँचल लहराती अल्हड़ सी दौड़ती..
बच्चों में बच्चा बन ..बड़ों में बड़ी बन..
पर बच्चों सी ज़िद कब कर डालती हूँ ..
पर क्या कभी पहचाना है मुझे..
इस चेहरे के पीछे कितनी उदासी छुपाती हूँ ..!!

हाँ मैं जैसी हूँ वैसी कब कहाँ नज़र आती हूँ ..
ना जाने कितने ग़म पी जाती हूँ …
तन्हाई में भी तो मुस्कुराती हूँ ..
हँसती हूँ खिलखिलाती हूँ ..
बहुत खुश भी नज़र आती हूँ ..
पर क्या कभी जानने की कोशिश की ..
अपने दामन में जाने कितने दर्द ..
समेट.. जाती हूँ…..

बनावटी मुखौटा पहनती हूँ …
चेहरे का हर दुख छुपाती हूँ …
ख़ुद में क्या क्या दफन कर जाती हूँ…
जाने कब कहाँ कैसे कितनी दफ़ा ..
जीते जी दफ़नाई जाती हूँ…
पर क्या परवाह की है कभी ..
कितनी टूट कर जुड़ जाती हूँ..!!


पर ख़ुद की तस्वीर, क्या नहीं है पहचानी

लिखी थी दास्तां
तेरे संग जीवन की
घर कर गई असंख्य
पीड़ाएँ मन की
सुनाए थे तुमने
प्रेम अतरंगी किससे
जिए थे हमने
मोहब्बत के हिस्से
लिखी थी एक
बेमिसाल कहानी
बनी थी वो
बेइंतहां रूमानी
कहा था हमने
मरेगें तुझ संग
तुमने पर क्या
बात हमारी मानी
देखते रहे तुम
हमारी आँखों में
पर ख़ुद की तस्वीर
क्या नहीं है पहचानी


कौन है वो वही तो है आपका प्यार आपका साथ आपकी मन्नत आपकी मोहब्बत ….!!

कौन है वो बेसब्री से आपका इंतज़ार करता है
कौन है वो आपकी खुशी में खुश होता है
कौन है वो आपके चेहरे पर मुस्कान लाता है
कौन है वो जो तुम्हारी आँखों को पढ़ता है
कौन है वो इक़ पल भी दूर नहीं रह पाता है
कौन है वो बिना देखे सुकूँ नहीं पाता है
कौन है वो बरसों से तुममें बसर करता है
कौन है वो तुम्हारी जुबां पर हमेशा रहता है
कौन है वो जिसका चेहरा दुआओं में आता है
कौन है वो जो हर पहर साथ साथ चलता है
कौन है वो जो आप में बेचैनी भरता है
कौन है वो बेइंतहां सब्र और हक़ रखता है
कौन है वो वही तो है आपका प्यार आपका साथ आपकी मन्नत आपकी मोहब्बत ….!!


सुलाते हैं मुझे ..अपने लफ़्जों की ..चादर उढ़ाकर ..

मेरी डायरी ..
के सफ़हे ..
मुझसे ..
घंटों बातें करते हैं ..
तुम्हारे बारे में ..
करते हैं मुझसे ..
ढेरों सवाल ..
रात को ..
तन्हा नहीं छोड़ते ..
निभाते हैं हरपल ..
मेरा साथ ..
एक टक ..
निहारते हैं मुझे ..
बिल्कुल तुम्हारी तरह ..
गुनगुनाते हैं ..
मेरे साथ ..
नींद से जगाते हैं मुझे ..
मधुर ध्वनि के साथ ..
सुलाते हैं मुझे ..
अपने लफ़्जों की ..
चादर उढ़ाकर ..

———————————————-

“मन”
ए मन तू मुझसे क्यों बातें करता है.. अपना होकर क्यों बेगाना पन दिखाता है.. रुठता है सताता है .. दर्पण में निहार मुस्कुराता है .. तो कभी मायूस हो जाता है.. कभी हँसता है तो कभी रो पड़ता है..मेरे दर्द को तू क्यों समझता है.. मेरे ज़ख़्मों पर मरहम क्यों लगाता है.. मेरे अश्क़ों को क्यों पोछता है.. मुझे क्यों समझाता है..आखिर मुझे तू क्यों सोचता है..जानता है समझता है ..फिर भी नादानी करता है .. क्यों बेकार की नाकाम कोशिशें करता है ..क्यों मुझसे लड़ता झगड़ता है.. क्यों मुझे यूँ ही परेशां कर जाता है ..कितनी मुझसे शिकवे शिकायतें करता है.. ए मन क्यों इतना शोर करता है.. मेरी धड़कनें क्यों बढ़ाता है..मेरी ख़ामोशी क्यों छेड़ता है .. मुझमें आकर क्यों ठहरता है..मेरे लबों मुस्कान क्यों बिखेरता है ..मेरी आँखों को तू क्यों पढ़ना चाहता है.. खुशहाली छीनता तन्हाई भरता है..नमीं सुखाकर क्यों रंग भरता है .. क्यों बेइंतहां मुझसे तू मोहब्बत करता है ..मेरी जुल्फ़ें उड़ाकर क्यों दीवाना बनता है .. क्यों मुझे पल – पल छेड़ता है..क्यों अकेला मुझे नहीं छोड़ता है ..क्यों हर वक्त आकर मुझे छलता है.. क्यों मेरे दिल को नहीं समझता है.. बेवज़ह मेरी धड़कनें क्यों बढ़ाता है.. मेरी ज़िंदगी को आखिर क्यों पढ़ना चाहता है .. मुझमें बदलाव क्यों लाना चाहता है ..अपने मन की मुझ पर क्यों मढ़ता है.. आखिर तू क्या गढ़ना चाहता है ..ए मन मेरे चेहरे को तू क्यों पढ़ता है .. मुझमें ही रहकर मेरी क्यों नहीं सुनता है.. मेरा होकर भी पराया तू क्यों बनता है ..ए मन अब तू ही बता आखिर तू मुझसे क्या चाहता है ..क्यों मुझे ही मुझ से छीनता है .. आखिर मेरा कुसूर क्या है..
जो तू अपनी मनमानी करता है .. तू मुझसे मुलाक़ात तो करता ही है ..घंटों मुझसे बतियाता रहता है.. फिर भी तू मेरी कहाँ सुनता है.. हर पहर मुझ में बसर करता है ..फिर भी मेरी बातों को क्यों नहीं समझता है…ए मन अब तू ही बता आखिर तू करना क्या चाहता है..!!


चल पड़े गलियों में, हम वही बंजारे थे ॥

कुछ पक्के वादे थे
कुछ नियम कायदे थे
टूटने से भी ना टूटे
कुछ कच्चे इरादे थे ॥

हर सपने सुहाने थे
बचपन के फ़साने थे
रूठने मनाने में
बुन लिए याराने थे ॥

दिल तो दीवाने थे
कुछ हुए पुराने थे
चल पड़े गलियों में
हम वही बंजारे थे ॥


बड़ी सिद्दत से तुम्हारा ..साथ निभाऊँगा ….!!

कुल पल बिता लो ..
अपनी झूठी ..
मुस्क़ान के साथ ..
कुछ लम्हे चहक लो ..
ठहाके लगा लो ..
कुछ वक्त इतरा लो ..
ख़ुद पर अपने ..
साजो श्रृंगार पर ..
मैं नज़र नहीं लगा रहा..
मैं तुमसे मिलने आऊँगा..
जब होगी तुम ख़ामोश ..
पलकों पे नमीं समाई होगी..
तुम्हारे इर्द गिर्द ..
पसरी होगी ख़ामोशी ..
मैं दबे पैर आ धमकूँगा ..
छेड़ जाऊँगा तुम्हारे ..
दिल के तारों को ..
तब तुम पल पल ..
टूट रही होगी ..
तब मैं दूँगा तुम्हें ..
अपना काँधा ..
रो लेना जी भर ..
कर लेना अपने दिल ..
का बोझ हल्का ..
और जी लेना ज़िंदगी ..
मेरे साथ – साथ ..
तुम हो तन्हा ..
और मैं हूँ तन्हाई ..
तुम्हें छोड़कर ..
कहीं नहीं जाऊँगा ..
बड़ी सिद्दत से तुम्हारा ..
साथ निभाऊँगा ….!!


दिल से”अवि”इक़ बार अपनाया तो होता॥

किया क्या कुसूर बताया तो होता।

नाराज़गी दिखा हक़ जताया तो होता॥

ख़ामोश रह कर सहते रहे हर पल।
बयां करके ही सही सताया तो होता॥

हम दम इतने ख़ास ही थे जब हम।
धड़कनों में कुछ क्षण बसाया तो होता॥

हम तुम्हें लिखकर जीते रहे ग़ज़लों में।
लबों पे लाकर हमें गुन गुनाया तो होता॥

बेगाना बन तू दिखाता रहा तल्खियाँ।
दिल से”अवि”इक़ बार अपनाया तो होता॥


उन पलों का.. उन लम्हों का.. दिल से..
शुक्रिया… शुक्रिया….. शुक्रिया…

ए मेरे हमसफ़र ..तेरा मेरी ज़िंदगी में ..
आने का शुक्रिया ..तेरा हर क़र्ज़ मुझ पे ..
किसी जन्म में भी ..ना उतार पाऊँगी ..
पर हर जन्म में ..मैं तेरी हमसफ़र ..
बन कर आऊँगी ..तूने हर इक़ फ़र्ज़ ..
दिल से बखूबी निभाया,तहे दिल से ..
तेरा शुक्रिया .. शुक्रिया
जीवन के हर एक ..उतार चढ़ाव में ..
मेरा हाथ थाम कर ..रखने का शुक्रिया ..
मिला तेरे काँधे का सहारा ..तेरी बाँहों का घेरा ..
तेरे साये में महफ़ूज ..रखने का शुक्रिया …
ए मेरे हमसफ़र ..तेरे बिना मैं क्या हूँ ..
कुछ भी तो नहीं ..तेरा मुझे अपने जीवन में ..
खास बनाने का शुक्रिया ..तेरा जितना चाहूँ..
शुक्रिया.. अदा करूँ उतना कम है ..
तुझे जितना चाहे सम्मान ..प्यार,जान भी दे दूँ तो कम है ..तेरे लिए सालों साल भी मर कर जन्म लूँ ..
करूँ तेरा इंतज़ार .. ये लम्हें पकड़ लूँ ..
मेरी रूह तेरे पास है ..संभाल कर रखना ..
हम जन्म लेगें दोबारा ..मेरा हाथ थाम कर रखना ..
तेरे और मेरे दरमियां ..जो रूहानी जज़्बात हैं..
उन पलों का.. उन लम्हों का.. दिल से..
शुक्रिया… शुक्रिया….. शुक्रिया…


मुझ जैसी थी पहेली सी, इक़ लड़की अलबेली सी

इक़ लड़की अलबेली सी
लगती है पहेली सी
ना कोई बूझ सका उसे
वो पगली खड़ी अकेली सी ||

उछलती कूदती अल्हड़ सी
हवाओं संग बातूनी सी
हिरनी संग कूदी खेली
ना कोई पा सका उसे
वो झल्ली कितनी वेली सी ||

नटखट वाचाल भोली सी
मुस्कान करोड़ों सितारों सी
ना कोई पहचान सका उसे
वो नादांन सबकी सहेली सी ||

मासूम नैनों में चंचलता सी
विशाल हृदय अनोखी सी
शीतलता बौछारों सी
वो बन बैठी हमजोली सी
मुझ जैसी थी पहेली सी
इक़ लड़की अलबेली सी ||


जहाँ गीत सुर छेड़ता है, वहाँ ग़ज़लें जन्म लेती हैं

जहाँ भावनाएँ मूक होती हैं
वहाँ अल्फ़ाज़ जन्म लेते हैं
जहाँ जज़्बात मर जाते हैं
वहाँ ख़ामोशी पलती है
जहाँ दिल टूट जाता हैं
वहाँ आँखें नम होती हैं
जहाँ क़लम उदास होती है
वहाँ स्याही बह जाती है
जहाँ शब्द मायूस होते हैं
वहाँ कविता बोलती है
जहाँ दर्द उभरता है
वहाँ मोहब्बत पनपती है
जहाँ चेहरा ज़ख़्म छुपाता है
वहाँ प्यार भी तो रोता है
जहाँ गीत सुर छेड़ता है
वहाँ ग़ज़लें जन्म लेती हैं


लगे दुनिया सपनों सी, ज़ज़्बातों में तूफां है !!

सुबह अज़नबी सी
ग़मों से डूबी शाम है
लम्बी रात अँधेरी सी
ख़्वाहिशें बेमिसाल है !!

दिल अलबेला सा
बहुत ही नादान है
गहरा समुन्दर सा
बड़ा ही बेपरवाह है !!

नयनों में नीर सा
साजिशों का वार है
हुआ तो अधीर सा
पलकों पे ख़्वाब हैं !!

लफ़्ज़ों में ख़ामोशी सी
लबों पे गुमनाम है
लगे दुनिया सपनों सी
ज़ज़्बातों में तूफां है !!


करती है इज़हार ए मोहब्बत, हर पहर आँहें भरती है॥

अज़ीब है मेरी ख़ामोशी भी
बिन बात मुझ से झगड़ती है
करती है शिकायतें कितनी
बिन बादल मुझ पे बरसती है॥

अज़ीब है तुम्हारी आँखें भी
पल – पल मुझे तकतीं हैं
रखतीं हैं कितने शिक़वे
फिर भी मनातीं रूठतीं हैं॥

अज़ीब है तुम्हारी क़शिश भी
हर वक़्त तड़पाती रहती है
करती है इज़हार ए मोहब्बत
हर पहर आँहें भरती है॥

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