रचनाकार

रचनाकार ! “मीठी बोली भूल गया”

डा. प्रमोद कुमार अनंग…

बाजारों के चकाचौंध में , गोबर होली भूल गया।
खरी-खड़ी वह बोल रहा है,मीठी बोली भूल गया।।

नशा कमाने का लत ऐसा, क्या अपने क्या बेगाने।
आजादी का वह दीवाना ,हंसी-ठिठोली भूल गया।।

तरह-तरह की मजदूरी कर,जोड़ लिया है थोड़ा धन।
अलग मकान बनाने में वह,थी हमजोली भूल गया।।

भोज किया बापू भी आए,पर दिन भर मेहमान रहे।
एक गरीब बहन उसकी, जो थी मुंहबोली भूल गया।।

शहरीकरण भुला देगा , सारे संबंधों – नातों को।
माटी- गोबर -कीचड़ की वह, रंग-रंगोली भूल गया।।

घुघनी-रस में दिन कट जाता ,रात भुने आलू में जी।
सामूहिक जीवन में किसने,यह बिष घोली भूल गया।।

नून-मिर्च-हथरोटी खाकर , बलशाली था अब रोगी।
टुकड़ों पर पलने वाला वह ,अपनी टोली भूल गया।।

बेटी-बहन किसी घर की हो,उसको अपनी लगती थी।
बढ़कर कंधा देने वाला , प्यारी डोली भूल गया।।

सारे द्वार खुले थे अपने , बैठ गए तो सब अपना।
काका के संग वह रस-दाना,काकी भोली भूल गया।।

चौखट पर दीपक जलवाना , राही को पानी देना।
केक काटने के चक्कर में ,अक्षत-रोली भूल गया।।…”अनंग ”

“कभी उपहास न करना”

टूट जाएगी सांस, कभी उपहास न करना।
रहे साथ विश्वास, कभी उपहास न करना।।

रखना लाज, समाज बहुत है जटिल हमारा।
उतरो मेरे जीवन में, बन झिलमिल तारा।
कुछ भी हो संत्रास।। कभी उपहास न करना।।

अवलम्बन है, स्नेह और श्रद्धा जीवन का।
प्रेम मिला आभारी हूं, मैं इस कण-कण का।
बनने दो इतिहास।। कभी उपहास न करना।।

नव-किसलय पर, मधुर रश्मियों के आने से।
स्वर्णाभा है बिखरी, पलके खुल जाने से।
बन जाना अनुप्रास।। कभी उपहास न करना।।

कोलाहल के बीच, मुझे पहचाना तुमने ।
रहना ही है साथ, ये मन में ठाना तुमने।
तुम हो बिल्कुल पास।।कभी उपहास न करना।।

ग्रह – गोचर – संजोग , किनारे जाकर बैठे।
जन – मन है स्तब्ध, कहें हम क्या कर बैठे।
जगी नई अभिलाष।।कभी उपहास न करना।।

हम पाषाण नहीं, पुष्प केवल उपवन के।
कोई ध्यान नहीं रखते, बीते अनबन के।
जगा रहे उल्लास।। कभी उपहास न करना।।

जड़- चेतन- संसार , पहल करने आयेगा।
स्वयं सत्य के साथ , खड़ा जो हो पायेगा।
धरा साथ आकाश।।कभी उपहास न करना।। …”अनंग”

 

पानी भी अनल हो जाएगा…

टूटेगी मर्यादा रेखा , जब नयन सजल हो जाएगा।
जल जाएगी लंका तेरी,गढ़ उथल पुथल हो जाएगा।।

मुख भी काला हो जाएगा,घर का भेदी हो जाने पर।
भाई हो कुंभकर्ण जैसा ,सुनकर विह्वल हो जाएगा।।

बाधेंगे सुनो समुद्र तुम्हें ,रक्षा करते हो रावण की।
होगे विराट अभिमान तेरा,सब चूर सकल हो जाएगा।।

आक्रांता बन जब कोई यवन,डालेगा हमपर बुरी नजर।
सोना छोड़ेगा राज कुंवर ,जंगल भी महल हो जाएगा।।

रखो संभाल कर खुद को तुम,वरना दीपक बुझ जाएंगे।
कितना हो बढ़ा कुटुंब तेरा,सब खल मंडल हो जाएगा।।

कोई न बचेगा रोने को ,खिलवाड़ न करना इज्जत से।
फूंके जाओगे रावण सा, सत्कर्म विफल हो जाएगा।।

सोने का महल बना लो तुम,हमको रत्ती भर चाह नहीं।
सम्मान हमारा छीनोगे , पानी भी अनल हो जाएगा।।

सेवा की शक्ति जहां होगी,दरबार भरा सच कह दोगे।
रहकर मर्यादा में देखो , जंगल – मंगल हो जाएगा।।…” अनंग ”

 

” आह्वान बेटियां “
(भारत की भाग्य रेखा)

घर – समाज – राष्ट्र की , पहचान बेटियां।
हाँ ! अपने मां – पिता की हैं, जान बेटियां।।

आंगन की वही रौनक,पुतली हैं आंख की वो।
अपने पिता के घर की , मेहमान बेटियां।।

परिवार तभी पूरा , बेटी हो यदि घर में।
करती रहेगी रोशन , अभिमान बेटियां ।।

सदियों से सर्जना की , कारण वही रही हैं।
धरती पर उतर आईं , वरदान बेटियां।।

सत -पथ पे चल रही हैं, सोपान चढ़ रही हैं।
बनकर चिराग दिखतीं , विद्वान बेटियां।।

वेदों की लालिमा थीं,शास्त्रों पुराण की भी।
गौरव कुटुंब की हैं , गुणवान बेटियां।।

चारों तरफ उजाला , उनसे ही हो रहा है।
दुश्मन के सामने हैं , तूफान बेटियां।।

सेवा सहायता से,भारत की भाग्य रेखा।
रक्षार्थ स्वाभिमानी , सम्मान बेटियां।।

उपहार हो धरा की ,उत्तम समाज गढ़ना।
सूत्रपात तुम करोगी , आह्वान बेटियां।।…”अनंग ”

 

“पाओगे ना ऊंचाई “

हसरत है तो, मिटा लो।
कांटा हूं मैं , हटा लो।।
अच्छा -बुरा हो कुछ भी।
जो ‘हां’ कहे, सटा लो।।
हैं लोग बहुत, हमको।
गिनती में अब, घटा लो।।
कुछ लोग , दुम दबाकर।
आएंगे तुम , पटा लो।।
मैं साफ , कह रहा था।
वह सांप है , कटा लो।।
मजबूरियां , बहुत हैं।
चाहे जिसे खटा लो।।
ईमान कटघरे रख।
तुम भी कसम उठा लो।।
झूठों की , भीड़ में तुम।
खुद हाथ भी, बटा लो।।
पर पाओगे , ना ऊंचाई।
कितना भी छटपटा लो।।
बस हाथ , मलोगे तुम।
कितना भी पिटपिटा लो।।…”अनंग ”

 

“सदी जीत लेंगे”

भरी बाढ़ में भी, नदी जीत लेंगे।
सृजन के सहारे, सदी जीत लेंगे।।

यकीं है हमें कि, सभी खुश रहेंगे।
कलम के सहारे, यदि जीत लेंगे।।

चलो ज्योति-पथ पर तमस दूर होंगे।
सितारे चमक कर, बदी जीत लेंगे।।

जहां नम्रता है, वहीं है उजाला।
विनय के भरोसे, खुदी जीत लेंगे।।

पराक्रम से अपने,शिखर छूने वाले।
साहस से कुछ भी,कभी जीत लेंगे।।

घमंडी रथारूढ़ होकर भी हारे।
धरम साथ है तो, पदी जीत लेंगे।।

अगर धैर्य-संतोष, हमको हुआ तो।
धरा से गगन तक सभी जीत लेंगे।।…”अनंग”

“मैं ही गांडीवधारी हूं”

हवा मगरुर है लेकिन , उसे भी साथ जुड़ने दो।
क्षितिज-आकाश मेरा है, मुझे एक बार उड़ने दो।।

विलक्षण शक्तियों से डर के , मेरा पर कुतरते हैं।
चला हूं कारवां बनता गया, कुढ़ते है कुढ़ने दो।।

भागीरथ की तरह मैं , साधना-संदेश वाहक हूं।
मेरी गंगा की धारा को , हमारे साथ मुड़ने दो।।

मैं शंकर की तरह,मस्तक पे धीरज-चांद रखता हूं।
धरा का विष वमनकर चढ़ रहा हूं,हमको चढ़ने दो।।

हमारे रक्त की स्याही से, तुम इतिहास लिख देना।
जवानी जब उमड़ती है , बिना बाधा उमड़ने दो।।

मुझे मथकर अगर अमृत निकलता है,तो मथ लो तुम।
मैं सागर की तरह तपकर बना बादल , घुमड़ने दो।।

मैं ही गांडीवधारी हूं , शिवा – राणा का हूं वंशज।
मसल दूंगा मैं शत्रु को , उछड़ता है उछड़ने दो।।

किनारों के कोलाहल से , निकालना जानता हूं मैं।
नदी हूं लक्ष्य है मेरा , मैं बढ़ता हूं तो बढ़ने दो।।…”अनंग”

” शिकायत नहीं है “
कभी भी किसी से,शिकायत नहीं है।
खुला हाथ मेरा , किफायत नहीं है।।
उड़ो मत, हमारी ही भाषा में बोलो।
नगर -गांव अपना,विलायत नहीं है।।
वफा पर भरोसा , बहुत है हमें भी।
मेरी दोस्ती यूं , तवायफ नहीं है।।
सही बात कहता , रहा हूं हमेशा।
अकेले हूं , नजरे इनायत नहीं है।।
जरूरत किसीको मेरी,आ गई तो।
उन्हें छोड़ जाऊं , रवायत नहीं है।।
है तहजीब आती,कई पीढ़ियों से।
बुजुर्गों से सीखो,हिदायत नहीं है।।
जिन्होंने बचाया है,कश्ती हमारी।
वही लोग अच्छे,हिमायत नहीं है।।…”अनंग”

” सुनहरी शाम “
चले आओ कि फिर वैसी,सुनहरी शाम हो जाए।
तुम्हारे साथ जुड़ कर के , मेरा भी नाम हो जाए।।
बहुत दुश्वारियों में जी रहा हूं , जिंदगी में भी।
अगर तुम चाह दो मन से,तो मेरा काम हो जाए।।
बना लो तुम मुझे अपना ,अकेले रह न जाऊं मैं।
समर्पण कर दूं मैं जीवन , मुझे आराम हो जाए।।
किसी का है नहीं कोई,मिलावट की ये दुनिया है।
जहां ऐसी हमें दे दो कि ,अल्ला- राम हो जाए।।
नगर में बस गए जबसे ,दीवारें कैद कर डाली।
सभी बेचैनियों से अब यहां , विराम हो जाए।।
दीवारें कान बनकर सुन रहीं ,चुगली करोगे तुम।
बच्चे हम हर बुराई से , भले बदनाम हो जाएं।।
मुझे साथी बना लो प्रेम की,गलियों में खो जाएं।
भले ही जिंदगी के रास्ते , सब जाम हो जाएं।।
किसी के काम आ जाना,सफलता है जी जीवन का।
जुबां पर हर किसी के बस , यही पैगाम हो जाए।।…”अनंग ”

” सौभाग्य सजाकर मस्तक पर “
सौभाग्य सजाकर मस्तक पर ,सिंदूर लगाया करती है।
मर्यादा भारत की सिर रख वह,मांग सजाया करती है।।

वह पार्वती है,अडिग,अचल,लाज सजाकर आंखों में।
कुल का सम्मान बचाने को,कुर्बान हो जाया करती है।।

धरती- सा धैर्य वरण करती , हरियाली वह देने वाली।
सारे दुःख-दर्द सहन करके,वह सृष्टि बढ़ाया करती है।।

देवासुर – रण की कैकेयी, उर्मिल -सीते -द्रोपदी वही।
झांसी की रानी नारी में , तलवार चलाया करती है।।

रख करवा,चौथ,तीज का व्रत,साधती सदा जीवन अपना।
पति-पुत्र सुखी हो जाएंगे,खुद को समझाया करती है।।

सती की शक्ति से धर्मराज , डरकर वापस हो जाते हैं।
सबके सुख खातिर खुद का ही,अरमान मिटाया करती है।।

वह मौन तपस्वी घर को ही , अपना सर्वस्य समझ लेती।
वह धरती स्वर्ग बनाने को , संसार में आया करती है।।

हे कुशल साधिके! हे देवी, तुम हो तो सारा जग सुंदर।
तुमको प्रणाम सत कोटि नमन,तू हमें बनाया करती है।।…”अनंग”

“उजाला आए”

चलिए वक्त निकाला जाए।
घर को खूब संभाला जाए।।

चढ़कर खेले जिन कंधों पर।
श्रद्धा से अब पाला जाए।।

उनके साथ बैठकर अपना।
बचपन खूब संभाला जाए।।

धीरे-धीरे हाथ पकड़कर।
लेकर उन्हें शिवाला जाए।।

हंसी-खुशी के गुब्बारों को।
उनके साथ उछाला जाए।।

हैं भगवान सहज ही घर में।
अब सिर पैर पे डाला जाए।।

इनके जीवन के अनुभव से।
‘सार’ चाहिए , चाला जाए।।

भर-भरकर आशीष मिलेंगे।
घर में खूब उजाला आए।।

प्यार बहुत करते हैं हमको।
कुछ कह दें तो टाला जाए।।

जीवन जिये हमारे खातिर।
अब खुद को भी ढाला जाए।।…*”अनंग”*

“एक पड़ोसी कम कर दे”

दीवारों से जाकर कह दो , कानाफूसी कम कर दे।
थोड़ा देश की चिंता कर ले, अब जासूसी कम कर दे।।

कुछ लोगों के पेट भरेंगे, अगर खजाना खोल दिए।
सेठों से जाकर कह दो कि, अब कंजूसी कम कर दें।।

अकर्मण्य लोगों को अपने , पास नहीं आने देना।
कह दो उससे काम करे कुछ, चापलूसी कम कर दे।।

झूठ बोल कर वह माहौल,बिगाड़ रहा है,माहिर है।
छोड़ मजहबी चिंताओं को,वतनफरोशी कम कर दे।।

तुम क्या हो ये लोग जानते , मिट्ठू बनना छोड़ो जी।
कुछ दिन ही फरेब टिकता है,गर्मजोशी कम कर दे।।

नौजवान जिस दिन उठ जाएगा, सिंहासन डोलेगा।
उससे कह दो झुकना सीखे,अब मदहोशी कम कर दे।।

धनपतियों से वाह-वाह ले-लेकर , खुश हो जाता है।
लोकनीति बात करे मत, अब मुफलिसी कम कर दे।।

सीने की चौड़ाई दिखलाने से , काम नहीं चलता।
उससे कह दो बहुत जोर है, एक पड़ोसी कम कर दे।।…”अनंग”

” ख्वाहिश “
शेर सब लाजवाब हो जाए।
शब्द – अक्षर किताब हो जाए।।
बाप की एक ही तो ख्वाहिश है।
मेरा बेटा नवाब हो जाए।।
चंद लमहें बचे हैं जीवन के।
थोड़ी मस्ती जनाब हो जाए।।
ऐसा अवसर न दो कभी तुम कि।
उनकी नीयत खराब हो जाए।।
चैन से बैठना नहीं तब तक।
जब तक पूरे न ख्वाब हो जाए।।
काम ऐसा करो कि जाओ जब।
हर आंखों में आब हो जाए।।
दोस्ती में न द्वंद रखना तुम।
साफ सारे हिसाब हो जाए।।
मैंने मांगे थे राह में कांटे।
क्योंकि जीवन गुलाब हो जाए।।…”अनंग ”

“कृष्ण दोबारा आना होगा”

कृष्ण दोबारा आना होगा।
बंशी आज बजाना होगा।।
यमुना नागों के चंगुल में।
फन पर नाच दिखाना होगा।।
कौरव – कंस पुनः कुर्सी पर।
जन – हित में टकराना होगा।।
व्यभिचारी हंसते हैं तुम पर।
महारास समझाना होगा।।
हथियारों के दम पर शासन।
गीता – ज्ञान सुनाना होगा।।
गोकुल गोरस हीन हो गए।
फिर से उन्हें बचाना होगा।।
चलो कन्हैया स्वयं बंधा लो।
” मां ” महान बतलाना होगा।।
सामर्थी सारथी बना क्यों ?
सेवक – धर्म बताना होगा।।
अन्यायी के साथ रहे तो।
कर्ण – भीष्म सा जाना होगा।।
गाली या अपमान सहन कर।
शांति धरा पर लाना होगा।।
वैभव छोड़ सुदामा जैसे।
मित्र हमें अपनाना होगा।।
आओ कृष्ण धरा पर आओ।
कदमों तले जमाना होगा।।…”अनंग”

 

 

 

 

 

 

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