रचनाकार

समाजवाद की लाज रखना/अपने मुलायम की तुम मान रखना।

मेरी कलम से…

आनन्द कुमार

 

हां मुझे मालूम है,
तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो,
तुम मेरे रग-रग में बसते हो,
तुम मेरे मन मंदिर के,
अन्तर्मन् में रमते हो,
तुम्हारे बदौलत ही तो,
मैंने राजनीति में वह पहचान पायी थी,
हर उस मुकाम पर,
समाजवाद की अलख जगाई थी,
कुछ के नजर में बुरा हूं मैं,
तो बहुतों की नजर में अच्छा हूं मैं,
चाहे जैसा हूं मैं,
लोहिया से सब सीखा हूं मैं,
कठोर परिश्रम से,
तुम्हारे मुलायम ने,
राजनीति का ककहरा सीखा था,
खून पसीना एक कर,
इस बाग को सींचा था,
जैसा था खुली तस्वीर था मैं,
किसी को चुभता था तो,
किसी के लिए नजीर था मैं,
धरातल के अखाड़े से,
राज-नीति के अखाड़े तक पंहुचा था,
मुठ्ठी भर परिवार संजोया था,
तो सेर भर समाज को जोड़ा था,
हर कदम की कीमत समझा,
संघर्षों को माला पिरोया था,
वक्त और हालात मुताबिक,
मैं सरकार चलाया था,
बहुत रह लिया अब तेरे साथ,
अब तो मुझको जाना होगा,
पक्ष-विपक्ष के साथी संग,
ऊपर रिश्ता निभाना होगा,
सब मुझको पुकार रहे हैं,
गुस्से की नजरों से धिक्कार रहे हैं,
सब कह रहे, बहुत हो चुका मुलायम,
अब तो लौट आओ…
अब तो जाना होगा,
तो सुनो साथियों,
मेरे प्यारे समाजवादियों,
मैं जा रहा हूं, मेरे बगिया को,
संभालकर रखना,
समाजवाद की लाज तुम रखना,
अपने नेता का सम्मान तुम रखना,
प्लीज साथियों,
अपने मुलायम की मान तुम रखना।

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