रचनाकार

कविता : बीती यादें

रिया अग्रवाल

@ रिया अग्रवाल, फरीदाबाद हरियाणा से

आंखों में आसूं थे
या गंगा का पानी
छोड़ रहे थे जब हम
चौखट पुरानी..

भीतर कुछ टूटा था
बहुत कुछ छूटा था
चूल्हे की रोटी
वो पनघट का पानी..

जहां बीता था बचपन
जिया था लड़कपन
छोड़ कर सब नाते
चले जीने हम जवानी..

बनने को ज़िम्मेदार
संभालने को परिवार
कमाने नाम, लिखने
अपनी नई कहानी..

गांव की मिट्टी को
मां की चिट्ठी को
चूमते हम चुपके से
ठंडक पड़ती सुहानी

कभी गुदगुदाती है
कभी रुलाती है
पुरानी एल्बम और
यादों की रवानी

वो आंगन बुलाता है
हरदम लुभाता है
निभाऊंगा फर्ज़
कर्ज़ मेरी जिंदगानी..

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