धर्म! सत्यम शिवम सुन्दरम् के उद्घोष को जन-जीवन में चरित्रार्थ करने का पर्व हैं शिवरात्रि

मनोज कुमार सिंह…

सत्यम शिवम सुन्दरम् ,सत्यमेव जयते, अहिंसा परमोधर्मः जैसे उपनिषदीय उद्घोष हमारी सदियों पुरानी सनातन संस्कृति का मार्गदर्शन और पथ प्रदर्शन करते रहे हैं। अत्यंत प्राचीन काल से हमारी आध्यात्मिक, दार्शनिक , सामाजिक और सांस्कृतिक परम्परा, परिपाटी और विरासत पर निरन्तर हमले होते रहे हैं। इन हमलों से हमारी आध्यात्मिक, दार्शनिक सामाजिक और सांस्कृतिक परम्परा विरासत अनगिनत बार क्षत-विक्षत और लहू-लुहान हूई तथा भारतीय वसुंधरा पर राजनीतिक अराजकता एवं अस्थिरता तथा सामाजिक संक्रमण की स्थिति उत्पन्न हूई। इस राजनीतिक अस्थिरता एवं अराजकता और सामाजिक संक्रमण के दौर में भी सत्यम शिवम सुन्दरम्, सत्यमेव जयते और अहिंसा परमोधर्मः जैसे उद्घोषो ने न केवल सामाजिक ताने-बाने को ध्वस्त होने से बचाया अपितु इन्हीं शाश्वत उद्घोषो के कारण आधुनिक काल तक हमारे समाज में अनुशासन एकता अंखडता एवं भाईचारा बना रहा।
वस्तुतः नीलकंठ भगवान शिव को समर्पित महाशिवरात्रि सत्यम शिवम सुन्दरम् को व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक जन-जीवन में चरित्रार्थ और फलितार्थ करने का पर्व है । भारतीय वसुंधरा सत्य की साधना में सर्वस्व न्योछावर कर साधनारत सन्यासियों की भूमि रही हैं। गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र, दधिचि ,महावीर स्वामी, महात्मा बुद्ध ,शंकराचार्य रामानुज ,नागार्जुन, कणाद, चरक, सुश्रुत, अश्वघोष ,पातंजलि और वराहमिहिर जैसे अनगिनत संतों और मनीषियों ने अपनी तपश्चर्या से जिन भौतिक तथा अभौतिक सत्यासत्य नियमों का उद्घाटन किया उससे न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व आज भी दिव्यालोकित हो रहा हैं। लोक जीवन में लोक मंगल और लोक कल्याण का साम्राज्य परावर्तित करने के लिए के हमारे संतों सन्यासियों ने सत्य से साक्षात्कार किया और उस सत्यासत्य विचार का भारतीय लोकमानास में संचार किया। इसलिए लोकमान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि सत्यात्य का साक्षात्कार करने ,उससे अभिसिंचींत होंने तथा जन जीवन में उसका संचरण करने का पर्व है। भौतिक और अभौतिक सत्यासत्य नियमों का साक्षात्कार कर ही मनुष्य अपने जीवन को अहंकार रहित, अनुशासित और संयमित कर सकता हैं। अहंकार रहित, अनुशासित और संयमित जीवन शैली द्वारा ही स्वस्थ, समरस और सहिष्णु समाज का निर्माण किया जा सकता है। वर्तमान दौर आधुनिकीकरण, औद्योगिकरण और शहरीकरण की अंधी दौड़ का हैं। इस दौर की इस अंधी दौड़ में मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों को निर्ममता से निचोड़ रहा हैं। इसलिए प्रकृति और सृष्टि के शाश्वत सत्यों का ज्ञान और प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है। प्रकृति और सृष्टि शाश्वत नियमों के ज्ञान और बोध द्वारा ही समग्र समाज में सृजनात्मक, रचनात्मक और सकारात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न किया जा सकता है। जिससे मनुष्य के अन्दर प्रकृति के प्रति बढती क्रूरता को रोका जा सकता हैं तथा प्रदूषण मुक्त पर्यावरण बनाया जा सकता हैं तथा पोषणीय विकास की संकल्पना के अनुरूप विकास को परिभाषित किया जा सकता है।
सत्य से साक्षात्कार के लिए एक ही साधन, एक ही मार्ग अहिंसा हैं। मनसा वाचा कर्मणा अहिंसक मन मस्तिष्क और अंतः करण ही सत्य की खोज कर सकता हैं। अहिंसक होने के लिए ईर्ष्या द्वेष कलह क्रोध लोभ लालच और घृणा जैसी हिंसक मनोवृत्तियों से निर्मुक्त होना आवश्यक है। इस तरह की हिंसात्मक प्रवृत्तियों से निर्मुक्त व्यक्ति ही किसी भी प्राणी को तन मन बचन और भावाभिव्यक्ति से तनिक भी नुकसान नहीं पहुंचाता, किसी के बारे में लेशमात्र भी अहित नहीं सोचता और न ही किसी हृदय को दुखित करता है। लोक मान्यताओं के अनुसार आज भगवान भोलेनाथ की आराधना प्रतीकात्मक रूप से प्रकृति के विषाक्त फूल पत्तों भांग धतूरा बेलपत्र इत्यादि से की जाती हैं। प्रकारांतर से भगवान नीलकंठ विषाक्त और गरल पदार्थो का रसपान करते हैं और सम्पूर्ण संसार को सुन्दर स्वच्छ और अमृतमय बनाते हैं। भगवान शिव के परिवार के सदस्यों के वाहनों का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तो उनमें सहकार समन्वय साझेदारी और आपसदारी की अनूठी समझदारी पायी जाती है। जहरीले साॅप, चूहा गरूण और नंदी बैल स्वभावतः एक दूसरे के परस्पर विरोधी विनाशक और शत्रु है। परन्तु भगवान शिव के परिवार में सभी प्राणी समस्त प्रकार की शत्रुताओं का भाव त्याग कर आपस में मिलजुलकर रहते हैं। समस्त प्रकार की शत्रुताओं और संकीर्णताओं का परित्याग कर ही सामाजिक जन जीवन में सहकार समन्वय और साझेदारी का संगम स्वाभाविक रूप से सृजित किया जा सकता है। अगर सम्पूर्ण मानव जीवन में यह संगम सर्वत्र नजर आने लगे तो शिवत्व की संकल्पना स्वयमेव फलीभूत होने लगेगी। सहकार समन्वय सहिष्णुता और आपसदारी द्वारा विविध प्रकार की मानव निर्मित समाज में असमानताओं, सामाजिक और वैचारिक विषाक्तता को कम कर सकते हैं। इसलिए न केवल मनुष्य बल्कि प्रत्येक प्राणी के रहने लायक बसुधा बनाने के लिए शिवत्व की संकल्पना धरातल पर उतारना अनिवार्य है। शिवत्व अर्थात मध्यवर्ती शिवम् के सफलीभूत होने के लिए इसके पूर्ववर्ती ( सत्यम) और उत्तरवर्ती ( सुन्दरम् ) का परस्पर पूरक होना आवश्यक है। प्रकारांतर से जब सत्य सौन्दर्य से निमज्जित और सुसज्जित हो तथा सुन्दरता शाश्वत सत्य की दृष्टि से परिभाषित परिमार्जित पल्लवित पुष्पित और विकसित हो। तभी मध्यवर्ती शिवम् की सार्थकता सिद्ध होती हैं। मध्यवर्ती शिवम् का अर्थ होता हैं कल्याण । एक सभ्य, सुसंस्कृत और सचेत समाज में कल्याणकारी राज्य की स्थापना हेतु निरन्तर सत्य की साधना आवश्यक है तथा साधना के फलस्वरूप निगमित सत्य का सौन्दर्य से निमज्जित और सुसज्जित होना आवश्यक है। इसी तरह सृष्टि में सौंदर्य का सौरभ सर्वदा विद्यमान रहे इसके लिए सुन्दरता को सत्य की अंतर्दृष्टि से निरंतर परिभाषित और परिमार्जित करना आवश्यक है। इन्हीं पवित्र भावों और विचारों के साथ हर वर्ष महाशिवरात्रि के पर्व पर भगवान शिव की आराधना की जाती है। भगवान शिव की आराधना का यह चलन-चलन जब तक जिन्दा तब लोकमानस में लोक मंगल की संकल्पना जीवंत रहेगी। लोक मंगल की कामना के साथ महाशिवरात्रि के पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं।
मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता
बापू स्मारक इंटर काॅलेज दरगाह मऊ।



