प्रणाम! हाँ! यहीं से तो शुरू करती थीं लता दीदी अपनी बात…!

ओमा The अक्©…
कोई कितना बड़ा हो सकता है?… कदाचित आकाश जितना… पर आकाश इतना बड़ा होता ही क्यों हैं?… कदाचित इसलिए कि वो किसी ‘आकार’ (छवि) में नहीं बंधता… केवल बढ़ता रहता है… फैलता रहता है..!
अश्विन मास की दशमी तिथि… पुष्य नक्षत्र वृष व मिथुन का संधिलग्न… चंद्रमा अपनी ही राशि कर्क में बैठा था…
व्योम के नीलमपटल से ओस की तरह एक कोमल स्वर टपका और भूमि पर खिल उठा… ज्योतिष और संगीत के महाविद्वान पण्डित दीनानाथ मंगेशकर ने कहा भगवान् मंगेशी महादेव की कृपा बन “हेमा” आ गई …. झट उसके नन्हे पैरों में सोने की पायल डाल दी…कि मेरी राजलक्ष्मी बिटिया छम-छम करती मेरे आँगन में घूमेगी… पण्डित जी ने अपनी दूसरी पत्नी और बच्ची की “माई” से कहा – “देखना यह कन्या विश्वप्रसिद्ध होगी और तुम्हे सौ-पुत्रों से बढ़कर सुख-सम्मान देगी! अहह! किन्तु मैं वह सब देखने संसार में न रहूँगा!”… माई उन्हें सहमी हुई हतप्रभ देखती रह गई…!
पण्डित दीनानाथ मंगेशकर “अभिषेकी ब्राह्मण कुल” के थे… यह कोंकण-क्षेत्र का वह कुल था जिसने अपने देव-मंदिरों को “पुर्तगाली-अत्याचार” से बचाने के लिए अनेकानेक बार अपने रक्त से भूमि-अभिषेक करते रहे थे… एक सनातनी-गर्व उनके रूधिर का सार था… उनके रूधिर में निहित वैदिक-अग्नि का प्रभाव था कि वह बड़े ऊँचे सुर बहुत सहजता से लगा लेते थे…साथ ही वे एक राग को गाते हुए उसके सुर अचानक बदल कर अर्थात किसी भी सुर को “सा” बनाकर इस प्रकार परिवर्तन कर देते थे कि वह कुछ नया ही हो जाता था परन्तु पुनः लौट कर उसी पुराने राग पर भी अत्यंत कुशलता से आ जाते थे… पण्डित जी का नाम सारे गोवा-कोंकण में विख्यात था साथ ही दूर पुणे और महाराष्ट्र के अन्य भागों में भी पण्डित दीनानाथ मंगेशकर की आवाज़ की गूँज बढ़ती जा रही थी… उनके घर में रात दिन राग-रागिनियाँ गूँजती रहती थीं… अनेक संगीत-रसिकों और छात्रों का जमावड़ा लगा रहता था… एकदिन वह अपने संगीत-छात्रों को अभ्यास के लिए छोड़ कहीं यात्रा पर गए थे… उन दिनों उनकी “नाटक मण्डली” बड़े नाम कर रही थी… लौट कर आए तो क्या सुनते हैं कि पाँच-वर्ष् की नन्ही हेमा जो अब “लता” कहलाने लगी थी उसने उनके एक प्रिय शिष्य को उसके राग में त्रुटि बता दी थी… पण्डित जी ने लता को बुला कर कहा- “क्या यह त्रुटि सुधार कर तुम गा सकती हो?”… “हां!”… नन्ही लता ने एक विश्वास के साथ उत्तर दिया और गा कर सुना दिया… पण्डित दीनानाथ एक सुखद आश्चर्य से भर गए और अपने “कुल-दीपक” को संगीत-अभ्यास के ईंधन से भरने लगे…!
२४ अप्रैल १९४२ … वो वसंत मंगेशकर कुटुंब में पतझड़ ले आया था… पण्डित दीनानाथ निर्धनता और तपेदिक जैसी व्याधि से लड़ते हुए इहलोक से अचानक बहुत थोड़ी सी आयु में चले गए… उनकी मृत्यु ने बालिका लता को तोड़ दिया… किन्तु यह झुक नहीं सकती थी… उसमें मराठी-ब्राह्मण रक्त अपनी पूरी ताप के साथ प्रवाहमान था… उसने अपनी पारिवारिक कला-देवी माँ सरस्वती के समक्ष वसंत-पंचमी को प्रार्थनापूर्ण-संकल्प लिया कि – “हे माँ भारती! मैं जब तक जियूँ तूम्हारी कृपा से सुर-साधना कर गाती रहूँ तथा जब यह न कर सकूँ तब मैं तुम्हारे चरणों में माथा टिकाए सदा के लिए सो-जाऊं!”… वीणाधारिणी ने मौन-स्वर में यह संकल्प स्वीकार कर लिया!
१९४३ में केवल १४वर्ष् की वय में लता मंगेशकर कोल्हापुर से मुंम्बई आ कर एक संगीत महोत्सव में गायन प्रस्तुत कर रहीं थीं… उनके पिता की बनाई राग मालकोस पर आधारित एक बंदिश… उसकी अदायगी पर मुग्ध हो कार्यक्रम की मुख्य-अतिथि और तब की “ग्लैमरस-अभिनेत्री” “ललिता पवार” ने उन्हें २५रुपये नगद परितोषक तो प्रदान किया ही साथ ही अपने कानों की स्वर्ण-बाली भी उसे पहना गईं… यह पण्डित दीनानाथ मंगेशकर की पहली संतान का पहला सम्मान था और पहली बड़ी कमाई…!
मास्टर विनायक उन दिनों मराठी सिनेमा का बड़ा नाम थे… इस किशोरी गायिका के भीतर उन्हें एक महान कलाकार निहित दृष्टिगत हुआ… उन्होंने अपना पूरा प्रयास किया और लता को मराठी से हिन्दी सिनेमा तक ले आए… “पहली मंगलागौर” से “आपकी सेवा में”… इन फ़िल्मो में लता को अपने अभिनय व सुर दोनों को आज़माने का अवसर मिला… किन्तु सफलता तो अब भी उनसे कहीं दूर खड़ी थी…!
नाना-चौक के शिवालय के द्वार पर बैठी लता प्रायः कोई स्वान्तःसुखाय भजन गातीं किन्तु उसे सुन कर भक्त व पुजारी भी अंतरतम तक तृप्त हो जाते… इन दिनों मंगेशकर परिवार बहुत कष्ट झेल रहा था… पिता की बरसी के लिए माँ के गहने गिरवी रखे जा चुके थे घर के बर्तन भी बिक गए थे एक बार तो किन्तु लता बरसी करने में तनिक भी संकोच न करती… वस्तुतः वो अपनी पिता को सर्वदा धनवान देखना चाहती थी… और ऐसा उसने आजन्म किया भी।
मास्टर गुलाम हैदर को बहुत गुस्सा आया जब शशिधर मुखर्जी ने यह कह कर उनकी शागिर्द लता मंगेशकर को “रिजेक्ट” कर दिया कि इसकी आवाज़ बहुत बारीक है!… ग़ुलाम हैदर ने उस वक़्त न मालूम किस ग़ैबी(अदृश्य) ताकत के प्रभाव में कह दिया – “आप ग़लत हैं, यह कोहिनूर है और एक दिन सारे मुल्क में इसकी आवाज़ गूँजेगी!”… परन्तु हाय रे! वक़्त का सितम मास्टर ग़ुलाम हैदर मुल्क के बंटवारे में लता से बिछुड़ गए… शायद यही कारण रहा कि लता के दिल का एक टुकड़ा उनके उस्ताद के पीछे पीछे पाकिस्तान चला गया और पूरा जीवन वहीं रहा…!
१९४९ के वर्ष् में सारे भारत ही नही आसपास के सभी देशों में केवल तीन नाम गूँज रहे थे कमाल अमरोही-मधुबाला और कामिनी… और इसका कारण थी वह फ़िल्म जो भारतीय सिनेमा में अबतक का सबसे अनूठा कारनामा थी “हॉरर सस्पेंस”… नाम था महल… सारी देश उसकी अभिनेत्री मधुबाला की सुंदरता और कामिनी की आवाज़ पर मुग्ध था… परन्तु यह कामिनी कौन थी?… यह कामिनी थी लता मंगेशकर और गीत था “आएगा आनेवाला आएगा”…. इस एक गीत ने सबकुछ हमेशा को बदल दिया था… भारत के गीतों में “स्त्री की आवाज़” के अर्थ ही अब बदल गए थे… मोटी मोटी आवाज़ों के बीच ये “बारीक” शीशे के टकराने सी आवाज़ एक नशा बन कर छा गई थी… हर अभिनेत्री अब इसी आवाज़ को अपनी आवाज़ बनाना चाहती थी… और हर संगीतकार इसी गायिका को अपनी धुन देने को लालायित होने लगा था… देखते ही देखते केवल ५ सालों में यानी १९५४ आते आते देश में हर ओर लता मंगेशकर की आवाज़ ज्येष्ठ के सूर्य की तरह तमतमा उठी थी।
साल १९५८ देश में पहली बार गायकी में फ़िल्म फेयर सम्मान मिला और वह लता मंगेशकर को “मधुमती” के गीत “आजा रे परदेशी”… तदुपरांत उन्हें १९६२, १९६५, १९६९ लगातार यह सम्मान मिलता रहा(इसके मध्य पुरुष गायकों को यह सम्मान मिला) बाद में लता मंगेशकर ने यह सम्मान लेना बंद कर दिया किन्तु बहुत आग्रह पर १९९३ और १९९४ में उन्होंने दो बार यह सम्मान और लिया… इसके अतिरिक्त ३ बार १९७२,१९७५ और १९९० में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला… फिर पद्मभूषण, पद्मविभूषण, दादासाहेब फाल्के “भारत रत्न” तथा “डॉटर ऑफ नेशन” जैसे सर्वोच्च सम्मान भी इस महान गायिका के नाम जुड़े… किन्तु यह गायिका तो किसी से न जुड़ी सिवाय गायकी और राष्ट्र के।
१९४४ से २०१९ तक वो गाती रहीं…इतना लंबा “करियर” तो शायद ही किसी क्षेत्र में किसी व्यक्ति का हो तथा वह भी इस बुलंदी पर… १९४९ से २००४ तक पूरे ५५ वर्ष् लता मंगेशकर का एकाधिकार सा रहा भारतीय हिन्दी सिनेमा के संगीत संसार में… उनमें भी १९५० से १०९० तक तो लगभग हर दूसरी बड़ी फ़िल्म बिना लता मंगेशकर के नाम के “रिलीज” ही नहीं होती थी… इसके चलते उनसे इर्ष्या करने वाले अथवा प्रतियोगिता में असफल हो जाने वाले उन पर “मोनोपोली” का आरोप मढ़ते रहते थे जिन्हें वो बिना किसी मनमुटाव के हँस कर टाल जातीं… उन्हें पता था कि लता मंगेशकर का मुकाबला यदि किसी से है तो वह केवल लता मंगेशकर से अन्य कोई भी गायक-गायिका उनके आसपास भी नहीं है… परन्तु उन्हें इस बात पर कोई घमण्ड नही था अपितु एक सहज कृतज्ञता थीं ईश्वर, गुरु, माता-पिता और अपने प्रेमी-श्रोताओं के प्रति…!
यह पूछने पर की आपने कितने गीत गाए अबतक? वो हँस कर कहतीं – “लता में क्वांटिटी में नहीं केवल क्वालिटी में गीत गाने पर विश्वास रखा है!”… वस्तुतः सुगमसंगीत की “क्वालिटी” का यदि कोई अंतिम सोपान होगा तो वह एकमात्र लता मंगेश्कर ही हो सकती हैं जिनके गायन में सुर-लय-ताल के साथ ही भाव-प्रभाव व उच्चारण का ऐसा तालमेल मिलता है जिसका दूसरा कोई सानी नहीं है। अचरज तो तब होता है जब आप इस “मराठी-मुलगी” को देश और दुनिया भर की अनेक भाषाओं-बोलियों में पूरे अधिकार से गाते सुनते हैं अब चाहे वो अंग्रेजी में “यू नीडेड” हो या भोजपुरी में “काहे बंसुरिया बजौले” हो… कमाल तो यह है कि वो जिस भावपूर्ण ढंग से मीरा और तुलसी के पद गाती हैं ठीक उसी भाव में गीता के संस्कृत श्लोक और ग़ालिब की “फ़ारसी माइल ज़ुबान” में ढली ग़ज़लें… अर्थात कोई भी लफ्ज़ जिसे लता मंगेशकर के लबों ने छू लिया वह ठीक वैसे ही जी उठा जैसे जी उठे थे मुर्दे ईसा-मसीह की रूहानी हथेलियों को छू कर!
लता जी कभी किसी छवि में न बंधी न किसी खेमें में रहीं… वह “प्रतिभा से सफलता” का आधुनिक विश्व मे सबसे बड़ा प्रतीक कही जा सकती हैं… उन्होंने अपने सपनों को पूरा करने के लिए किसी “शॉर्टकट” का प्रयोग न कर के संघर्ष का लंबा मार्ग चुना और उस मंज़िल तक पहुँच गईं जहाँ न कोई उनसे पहले गया न कोई उनके पश्चात पहुँच ही सकता है… अन्यथा यह कैसे सम्भव था को कोई लड़की “बदनाम फ़िल्मी दुनिया” में रहते हुए “माँ सरस्वती” की उपाधि से सम्बोधित की जाए… अथवा जो सिद्धांत के बड़े बड़े पूंजीपतियों से टकराकर अपने अस्तित्व को बनाए ही न रखे बल्की विस्तृत भी करती चली जाए।
एक पूरी सदी के आसपास का समय बीत गया उनकी आवाज़ सुनते हुए… एक दो नहीं कोई चार पीढियों ने उनकी मखमली आवाज़ और जादुई अंदाज़ को सराहा है… पर क्या इतनी लंबी यात्रा कोई केवल “अभ्यास और प्रतिभा” के बल पर कर लेगा… नहीं! वास्तव में इतना लंबा सफ़र केवल किरदार के बल पर ही पूरा हो सकता था और लता जी का किरदार किसी हिमालय से कम नहीं रहा है… यदि ऐसा न होता तो क्या वो १९८३ की दमदार किन्तु निर्धन भारतीय क्रिकेट टीम की मदद के लिए दिल्ली में ४ घण्टे तक गा कर २२ लाख रुपए जुटातीं अथवा देश के सैनिकों का मनोबल बढ़ाने सीमा पर चली जातीं… या अपने जीवन भर के पैसों से गरीबो और लाचारों के लिए “मास्टर दीनानाथ मंगेशकर हस्पताल” बनवातीं या चुपचाप निर्धन और बेसहारा संगीतकारो-कलाकारों और साहित्यकारों की मदद करतीं…. और तो और क्या बिना विराट-चरित्र के वह उन लोगों छमा कर पातीं जो उनके मान ही नहीं उनकी जान के शत्रु बने रहे अपनी ईर्ष्या में ।

भारत रत्न लता मंगेशकर को तो सब जानते हैं… किन्तु मैं उन थोड़े से भाग्यवान लोगों में हूँ जिन्हें स्वयम सुरसाम्राज्ञी जानती थीं तथा अपने प्रिय ज्योतिष की तरह मानतीं थीं… अतः मैं उन्हें थोड़ा अधिक जानने का दावा कर सकता हूँ… वो सामान्य से कहीं अधिक प्राणवान थीं… उनमें अद्भुत साहस था.. और अकल्पनीय प्रेम… वह सिद्धांत की कठोर किन्तु मन से तरल थीं… उन्हें गुस्सा कम हँसी अधिक आती थी… उनको स्वाभिमान से कोई समझौता स्वीकार नहीं था किन्तु क्षमा मांग लेने पर झट से गले लगा लेती थीं… उनके पास विलक्षण अंतर्दृष्टि थी मनुष्यों को पहचान लेने की और अनिर्वचनीय कला थी भावों को अभिव्यक्त कर देने की… आध्यात्मिक दृष्टि से वह देव-कन्या थीं जो कतिपय दोष के कारण भू-लोक पर कुछ काल के लिए जन्म ले आई थीं और अपने सुर-स्वर से विश्व को तनिक और धनाढ्य करने में लगी रहीं।
लता मंगेशकर को सावरकर से प्रेम था और अपने हिन्दू होने पर गर्व किन्तु उन्हें पाकिस्तान या मुसलमान से कोई बैर नहीं था अपितु वह जब तब किसी पाकिस्तानी हुनर का ज़िक्र करती रहती थीं… उन्हें वैदिक देवताओं आस्था थी किन्तु मोहम्मद पैगम्बर की शान में नातिया क़लाम गाते हुए भी उनका हृदय प्रेम से छलक उठता था… उन्हें “कामायनी” जितनी प्रिय थी उतनी ही “दीवाने-ग़ालिब”… उन्हें बंटवारे का और गाँधी की हत्या का गहरा दुःख था और वो दुबारा इस देश में ऐसा कोई विभाजन नहीं चाहती थीं… राजनीति में उनके प्रिय नायक भगत सिंह और पण्डित नेहरू थे… उन्हें इंदिरा गाँधी श्रेष्ठतम प्रधानमंत्री लगती थीं तो अटल बिहारी वाजपेयी संसद के सबसे आकर्षक वक्ता लगते थे… राजीव गाँधी से उनके आत्मीय सबन्ध थे तो नरेन्द्र मोदी को उन्होंने प्रधानमंत्री होंने का वरदान भी दिया था यहाँ तक कि अखिलेश यादव के देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बनने पर पहली बधाई का फोन भी लता जी ने ही किया था … वह प्रत्येक नई बात को सराहती थीं यदि वह सुन्दर और कल्याणकारी हो… उन्हें गले की “पिच” का मुकाबला दुनिया के कुछ गिने चुने गायक ही कर सकते हैं… वो “शार्प-सी” तक आसानी से गा जाती थीं… उनको कभी किसी बात का भय नही रहा यहाँ तक कि मृत्यु का भी।
लगभग एक दशक से मैं उनसे बात करता रहा हूँ… उन्होंने मुझे अनेक उपहार और सम्मान दिए… अपने पिता मास्टर दीनानाथ मंगेशकर की ७५वीं पुण्यतिथि पर मुझे मुम्बई आमन्त्रण दे कर बुलाया और सम्मान दिया.. अपने पूरे परिवार के मेरे घर तक भेजा और प्रायः यह कहती रहीं की स्वस्थ हो जाऊं तो आपको मिलने काशी आऊँगी संकट मोचन हनुमान के दर्शन करूंगी और बाबा विश्वनाथ का अभिषेक करूंगी…और देखूँगी अर्धचंद्र-जाह्नवी को।
मैं याद कर रहा हूँ एक बार उन्होंने कहा था – “स्वामी जी! जब मैं ५२ में बनारस आयी थी तो मेरे ठहरने का स्थान श्मशान के पास था… दोपहर बाद जब मैं बरामदे में खड़ी थी तो सामने एक जलती हुई चिता से शव उठने लगा… यह देख कर मैं तो डर से बेहोश हो गयी और लोग मुझे आनन-फानन में मुंबई ले आए… उसके बाद काशी आने का बरसो साहस नहीं हुआ..(हंस देती हैं)… पर अब आऊँगी यह सोचती हूँ तो शरीर साथ नही देता है!”
परसो जब उषा मंगेश्कर जी ने मुझे बताया लता जी की बीमारी बढ़ने की बात तो मैं केवल वसंत पंचमी बीतने की राह देखने लगा… न मालूम क्यों मेरे मन को यह भय सताने लगा कि सरस्वती की यह मानवी छाया कहीं अपनी मूल प्रतिमा में समाहित न हो जाए… और वही हुआ… रात सोने से पहले जो मनहूस विचार मेरे मन मे था सुबह वो सच साबित हुआ… मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख लता मंगेश्कर की आवाज़ मेरे जागने तक हमेशा के लिए सो गई थी… मैं रोता रहा भीतर भीतर और देखता रहा टीवी पर उस महादेवी के पार्थिव देह की अंतिम विदाई… सुनता रहा लोगों का रुदन और शोक संदेश… देता रहा लोगो को उत्तर जो करते प्रश्न उस चरित्र के संदर्भ में जिन्हें मैं जन्म के पहले से जनता हूँ… मैंने किसे प्यार किया है जीवन यह बताना हो तो उसकी शुरुआत में हमेशा “लता जी” का नाम होगा… आज मैं शाम उन्हें चंदन की चिता में लेटते देख कर सोच रहा था एक चिता देख कर इतना सहम जाने वाली इस कोमल हृदय सुकन्या को इन लपटों में कितना कष्ट होगा न… परन्तु जब उन्हें चिता में जलते देखा तो आभाष हुआ नहीं.. जो जल रही है वह तो मिट्टी भर है… और लता मंगेशकर तो आकाश हैं… कभी न समाप्त होने वाला नाद-स्वरूप अनन्त आकाश!
अचानक मुझे उनके बहुत सुन्दर कोमल सोने के पायल पहने नन्हे पांवों की याद आयी जो उन्होंने बहुत संकोच से मुझे दिखाया था… और तब मेरे मुख से कुछ नहीं निकला केवल अतिरिक्त एक शब्द के – “प्रणाम”!
हाँ! यही तो होता था उन्हें हर बार मेरा उत्तर!!”
६ फ़रवरी २०२२
(मेरी आत्मा का सम्बल आदरणीय लता दिदी के देहावसान सशोक पर स्मृतिपत्र💐)


