रचनाकार

शब्द मसीहा की कहानी : प्यार का नशा

“अरे यार! जब देखो तब तुम कुछ न कुछ लिखती-पढ़ती ही रहती हो, क्या उखाड़ लिया है तुम्हारे इन लेखों ने?” अनुपम ने घर में घुसते ही पत्नी को कुछ लिखते हुए देखकर पूछा।

“खाना बनाकर रख दिया है जनाब। आराम से खा लीजिए। मुझे अपनी इतनी चिंता नहीं है जितनी मुझे अपनी बेटी की चिंता है। मुझे आने वाली बहू की भी उतनी ही चिंता है। मैं नहीं चाहती कि उनका जीवन घुट-घुट कर बीते।” मेघना ने जवाब दिया।

“आखिर तुम औरतों को कितनी आज़ादी चाहिए? तुम्हें क्यों लगता है कि तुम किसी क़ैद में हो।” अनुपम ने अपने कपड़े उतारते हुए कहा। कपड़े उतार कर उसने जमीन पर फेंक दिये थे।

“अभी एक छोटा-सा ही उदाहरण ले लो, तुम्हें हमेशा लगता है कि घर को संभालने का काम मेरा है। क्या तुम इन कपड़ों को उठाकर उनकी सही जगह पर नहीं रख सकते ? यही तो छोटी-छोटी बातें हैं, जो औरत को गैर बराबरी का अहसास दिलाती हैं।” मेघना ने कपड़ों को उठाते हुए कहा।

“सॉरी यार, बात तो तुम्हारी सही है। पर आदमी पैसा कमाता है, घर से बाहर जाता है, तो इन छोटी-छोटी बातों पर उसका ध्यान नहीं जाता।” अनुपम ने जवाब दिया।

“मैं तुमसे पहले उठी हूँ, सबके लिए खाना बनाती हूँ, टिफिन लगाती हूँ। काम पर जाती हूँ। आकर फिर से खाना बनाती हूँ। तुम्हारी इच्छा भी पूरी करती हूँ । कितना आराम मिलता है मुझे?” मेघना ने फिर से सवाल किया।

“अरे यह तो हर औरत करती है, इसमें नया क्या है?” अनुपम ने तपाक से जवाब दिया।

“अच्छा, क्या आज मेरे लिए तुम कोई कविता लिख सकते हो, वैसे तो स्त्रियों के ऊपर बहुत कविताएं लिखते हो।” मेघना ने कहा।

“यह कैसा सवाल है?” अनुपम थोड़ा झल्ला गया था।

“अच्छा यह सब छोड़ो, आज मेरे लिए भी एक ड्रिंक बना दो। बहुत थकान हो रही है।” मेघना ने मुस्कुराते हुए कहा।

“तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?” अनुपम जोर से चिल्लाया था।

“और तुम्हारा दिमाग सही हो जाता है, तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान आ जाती है, जब मैं अपने हाथों से तुम्हारे लिए ड्रिंक बना कर देती हूँ। तुम ड्रिंक के साथ में हरी मिर्च के पकोड़े खाना चाहते हो, प्याज के पकौड़े खाना चाहते हो। मैंने तो सिर्फ़ बोतल को गिलास में उड़ने के लिए कहा है।” मेघना ने अलमारी से अनुपम के लिए कपड़े निकालते हुए कहा।

“आज तुमने भांग तो नहीं पी रखी है? कैसी अजीब-अजीब बातें कर रही हो?” अनुपम ने खिसियाते हुए कहा।

“अच्छा मुझे एक बात बताओ? कितनी औरतों ने आदमी के सौंदर्य को लेकर के कविताएं लिखी हैं? तुम लोग तो हमेशा कहते रहते हो कि औरत आदमी से कहीं ज्यादा कामुक होती है। दो-चार ऐसी लेखिकाओं के नाम बताओ जिन्होंने आदमी के बालों पर, गालों पर, उसके सीने पर या उसकी ताकत के ऊपर कविताएं लिखी हैं?” मेघना ने फिर से अपने सवाल को अनुपम की तरफ उछाल दिया था।

“लज्जा और संकोच तो औरत का गहना है, उसकी क्वालिटी को हमेशा से इसी तरह से बताया गया है।” अनुपम बोला।

” और औरत को पति की सेज पर वेश्या की तरह व्यवहार करने के लिए भी कहा गया है…. हा हा हा।” मेघना ने अपना एक और तीर छोड़ दिया था।

“हाँ, ये बात बिल्कुल ठीक है कि ऐसा हमारे शास्त्रों में लिखा गया है कि औरत को अपने पति को खुश करना चाहिए।” अनुपम ने कहा।

“ऐसा किसी शास्त्र में क्यों नहीं लिखा गया कि अगर औरत खुश न हो तो पति को क्या करना चाहिए? क्या औरत के जज्बात की कोई कीमत नहीं है? क्या औरत को आदमी के लिए शेरो- शायरी लिखना नहीं आता? क्या औरत ने ही शालीनता का सारा दोष अपने सिर पर रखा हुआ है? और फिर भी आदमी को सम्मान चाहिए?” मेघना ने फिर से अपने सवाल अनुपम की तरफ फेंक दिये थे।

“आज तुम्हें हुआ क्या है? आज के पहले तो तुम कभी भी इस तरह की बातें नहीं करती थीं?” अनुपम ने पूछा।

“तुम्हें तो बात करना भी बुरा लग रहा है, और हमारे साथ तो ये सब होता है… रोज होता है। आदमी ने ही हर सामाजिक प्रथा बनाई, उसने औरत के बारे में सोचा ही कब ? उसने ताकत से ही औरत को दबाया। उसे प्रेम करना आया ही नहीं, आज भी शादी के बाद किसी औरत से रिश्ता रखना आदमी की मर्दानगी और आज़ादी है, लेकिन औरत ऐसा करे तो बदचलन?” मेघना ने कहा।

“तो क्या तुम मानती हो कि औरत को आज़ादी दो, तो वह आदमी के लिए प्रेम कवितायें लिखेंगी ? चलो मैं तुम्हें आज़ादी देता हूँ।” अनुपम बोला।

“क्या तुम मुझे बदले में मेरे जितना प्रेम दे पाओगे? मैंने तो तुम्हें ही अपनाया है, सब कुछ माना है, अपना घर, अपने संबंध अपने दोस्त सब छोडकर आई हूँ …. और शायद वो अल्हड़ मुस्कान भी …. जो मेरे होने का सबूत था। मैं तो दीवार में गढ़ी हुई खूंटी हूँ, जिस पर पूरा परिवार अपनी फरमाइश और इच्छा टांग देता है। क्या महीने भर मेरा काम अपने सिर ले सकते हो?” मेघना बोली।

अनुपम सोफ़े पर बैठ गया था। दिमाग जैसे भन्ना गया था उसका।

“आई असेप्ट …. कि हम तुम्हें जगह नहीं देते। हम अपने लिए कविता के हकदार नहीं हैं। तुम अपना ये काम बंद करो , मैं मुँह हाथ धोकर खाना गरम करता हूँ । मैं ही लगाऊँगा खाना।” और अनुपम ने अपने उतारे हुए कपड़े मेघना के हाथों से लेकर वाशिंग मशीन में डाल दिये , फिर वह फ्रेश होने लगा।

मशीन नहीं होती है औरत
उसमें में मगर लगता है जंग
वह भी महसूस करती है ओवरलोड
एक मुस्कान का स्नेहक
थोड़ी -सी काम की तारीफ़
फूँक देती है नए प्राण औरत में

औरत की रात बड़ी नहीं होती
लेकिन बेहतर तो हो सकती है
ताकि प्रेम में उनिदी औरत
लिख सके अपना प्रेम स्वप्न
मेरा भी मन करता है कि
मैं तुमसे कहूँ, जी नहीं भरा
प्रेम घट को तृप्त हो जाने दो
मत सो जाओ पीठ फेरकर
हाँफती हुई साँसों को अपनी
मेरे सीने से टकराने दो
इस अनंत जीवन में हमारे
पतवार ही नहीं , नैया को भी
अपनी मर्जी से मन बहलाने दो

मत पूछो न, देर से आने पर सवाल
कभी तो कहो … थक गईं होंगी
आज मैं चाय बनाता हूँ
चलो , खाना बाहर से मँगवा लेते हैं
एक बार घर लौटने पर मेरे
मेरा माथा ही चूम लिया करो
मुझे भी एहसास करवाओ कि मैं चीज नहीं हूँ
मैं एक ज़िंदा औरत हूँ , और
ज़िन्दा हूँ तो सिर्फ़ तुम्हारे लिए
कभी तुम भी ऐसा कहो न !

अनुपम लौट आया था । लेपटॉप अभी भी खुला हुआ था और मेघना खाना गरम कर चुकी थी। अनुपम की निगाह लेपटॉप पर गई तो उसने कविता को पढ़ा । जैसे ही मेघना पास आई तो उसने हाथ पकड़कर उसे गोद में बैठा लिया । चेहरे से बालों को हटाया और उसके माथे को चूम लिया।

“तुम्हारे सवालों का जवाब मेरे पास नहीं है मेघना, लेकिन मैं कोशिश करूंगा कि ये सवाल और न बढ़ें। आज सचमुच तुम्हारे लिए ड्रिंक बनाता हूँ।” अनुपम ने मेघना का गाल सहलाते हुए कहा।

“मुझे किसी नशे की जरूरत नहीं ….मेरे लिए प्यार का नशा ही काफी है अनु ।” और मेघना ने उसके गले में बाहें डाल दीं।

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