“श्रावणी का श्रृंगार”

( किशोर कुमार धनावत )
बरस रहा पानी झमाझम,
नाच रही बूंदें छमाछम|
हरसिंगार फैलाया चादर,
रंगत देख मुस्काया बादर|
धरा धारायें गले लगाती,
नाचत दादुर मेढ़की गाती|
कणकण सारे पुलक रहे,
फूल और गजरे महक रहे|
आओ-आओ मेरे प्यारे सावन,
तेरा रुप-सौन्दर्य मन भावन|
जब तू आता मन खिल जाता,
रति नाचती काम मृदंग बजाता|
प्रियतमा ने जब ली अंगड़ाई,
प्रियतम ने दोनों बाहें फैलाई|
श्रावणी ने जब किया श्रृंगार,
इन्द्रधनुष ने उड़ेला ढ़ेरों प्यार|
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किशोर कुमार धनावत,
११-८-२०२१

