रचनाकार

शब्द मसीहा : ख़ैरात के क़ाबिल

( शब्द मसीहा केदारनाथ)

उसे बहुत उम्मीद थी कि आज वह अपना ज़मीर बेचकर अपने ज़िंदा रहने का जुगाड़ कर लेगी। वह शहर के नामी अमीर के यहाँ गई और बोली –

“एक दिन के लिए मैं अपना ज़मीर बेचना चाहती हूँ, बताओ क्या दोगे ?”

“बीबी ! मरने के बाद कोई सांसें नहीं लेता । तुम्हारा ज़मीर नहीं चाहिए मुझे ।”

“ऐसा क्यों? उस रोज तो तुम आहें भर रहे थे , मुझे देखकर।” औरत बोली।

“हाँ, ये सच है।”

“तो अब क्या बदल गया है ?” औरत ने सवाल किया ।

“ईमान । उस रोज़ तुम एक औरत थीं , तुम्हारी बहुत इज्ज़त थी मेरे मन में । मैं तुम्हें यकीनन पाना चाहता था , लेकिन आज बहुत कुछ बदल गया है। तुम मुझे औरत की तरह पसंद थीं ….अफ़सोस कि तुम तज़कीर-ओ-तानीस में ढलते हुए आज मादा जिन्स हो गई हो। अब तुम्हारी क्या कीमत ? बस, ख़ैरात के क़ाबिल हो। “

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