स्वयं की पुस्तक प्रकाशन में आई परेशानी से प्रकाशक बनी “प्राजक्ता”, अब अन्य लेखकों की पुस्तक करती है प्रकाशित
(जितेन्द्र शिवहरे )
■ लेखिका प्राजक्ता डाॅन गोधा प्रतिभा ने बताया कैसे बने सफल लेखक
■ दोनों बेटियों में लेखक बनने के सारे गुण, संवार रही है उनका भी भविष्य
■ अच्छी किताबों के सतत अध्ययन से अच्छे विचारों को होता है संचयन- प्राजक्ता
इंदौर। लेखिका प्राजक्ता डाॅन गोधा ‘प्रतिभा’ ने अपने साहित्यिक सफ़र की विस्तृत जानकारी दी। आप विवाह के पूर्व से लेखन क्षेत्र में सक्रिय होकर अभी अनवरत लिख रही है। प्राजक्ता अन्य लेखकों की पुस्तक भी प्रकाशित करती है। प्राजक्ता बताती है कि वे अधिकतर भावनात्मक कविताएँ लिखती है। कहानियां लिखना आपको पसंद है। नारी, देश भक्ति और प्यार पर लिखना आपका पसंदीदा विषय है।
पुस्तक प्रकाशन एक चुनौतीपूर्ण कार्य…
पुस्तक प्रकाशन में प्रूफ रीडिंग के संबंध में आप कहती है कि ‘प्रूफ रीडिंग के कार्य मे वैसे तो कोई दिक्कत नही आती क्योंकि इसमे मेरी दोनो बेटियां भी मेरी मदत करती है जैसे-फोटो से जुड़े जितने भी कार्य है, कविता कैसे सेट करना आदि ये सभी दोनों बेटियां मिलकर मुझे बताती है। दिक्कत तब आती है जब किसी रचनाकार की रचना उनकी क्षेत्रीय बोली से मिलती-जुलती हिंदी में हो और व्याकरण की दृष्टि से गलत हो। जिसे संशोधित करने पर रचनाकार द्वारा अड़ जाना कि हमने जो लिखा वही सही है।’
मिल चूके है अनेक साहित्यिक सम्मान…
प्राजक्ता डाॅन गोधा प्रतिभा को अनेक सम्मान प्राप्त हो चुका है। इंडियाज बस्ती 2019 सम्मान, राष्टीय कवि चौपाल द्वारा साहित्यिक मनीषी सम्मान, राष्ट्रीय शिवशक्ति उन्नयन द्वारा सम्मान, हौसलों की उड़ान साहित्यिक समूह द्वारा विभिन्न अवसरों पर सम्मान किया गया। मधुशाला साहित्यिक संस्था द्वारा महादेवी वर्मा अलंकरण, मुंशी प्रेमचंद्र अलंकरण, यशपाल सम्मानआदि और भी कई सम्मान आपको प्राप्त हुये है।
बेटियों में लेखिका बनने जैसा गुण मौजूद…
सबसे बड़ी यह बात देखकर बहुत खुशी होती है कि मेरी दोनो बेटियो की साहित्य के प्रति रुचि है। मेरी बड़ी बेटी प्रेक्षा लगभग सवा 2 साल की उम्र में विषय देने पर उस विषय पर तुरंत कुछ बनाकर सुना देती थी और प्रेक्षा की उपलब्धियों को देखकर महक भी लिखने को प्रेरित हुई। दोनों बेटियां चित-तरंगिणी जैसे कई प्रतिष्ठित और लोकप्रिय फेसबुक साहित्यिक पटल समूह पर कई बार स्वरचित रचनाओं का लाइव काव्यपाठ कर चूकी है।
प्रकाशन क्षेत्र में कैसे आई?
‘जब प्रेक्षा 5 या 6 साल की थी तब उसकी सभी रची हुई रचनाओं को मैने एक कॉपी में लिख रखा था और लगभग 100 से ज्यादा रचनाएं थी, तो विचार था कि उसकी रचनाओं की पुस्तक प्रकाशित की जाए जिससे सबसे छोटी लेखिका के रूप में उसकी पहचान बन सके ,बहुत प्रयास किया लेकिन कोई रास्ता नही मिला, जब कोई प्रकाशक माने भी तो बहुत अधिक राशि की मांग की लगभग एक 2 साल प्रयास किया लेकिन कुछ नही हो पाया। फिर हार कर पुस्तक प्रकाशित करने का विचार छोड़ दिया फिर जब प्रेक्षा 8 या 9 साल की थी और मैने उसे ये बात बताई तो उसने मुझसे कहा- ‘मम्मी जैसे आप परेशान हुए, ऐसे कई लोग हो रहे होंगे।’ उसकी बातें सोचकर मैंने पुस्तक प्रकाशन का कार्य शुरूकर दिया।
लिखने की प्रेरणा कहां से मिली…
लिखने का शौक तो बचपन से ही था लेकिन कभी उसे सिरियसली नही लिया। सांध्य प्रकाश और दैनिक जागरण में कुछ कविताएँ शादी से पहले भी प्रकाशित हो चुकी है। मुझे फेमस होने का शौक नही था इसलिए अखबारों में कम ही नज़र आती हूँ। मूलतः भोपाल मध्यप्रदेश की निवासी हूँ। और अब दुर्ग छत्तीसगढ़ में संयुक्त परिवार में रहती हूँ।

दोस्तों ने हिम्मत बढ़ाई…
‘जब भी कॉपी के पिछले पेज पर मेरी कविता दोस्त पढ़ते थे तो हमेशा कहते थे तो प्रसिद्ध कवयित्री बनेगी, कई दोस्तो ने तो महादेवी वर्मा तक बोलना शुरू कर दिया था अब वो उनका कमेंट था या कॉम्पलिमेंट ये तो वही जाने।
इन लेखकों की रचनाएं सांझा संग्रह का संपादन कर प्रकाशित करवाई-
हरिप्रकाश गुप्ता ‘सरल’ भिलाई, नंदलाल मणि त्रिपाठी ‘पीताम्बर’ उत्तरप्रदेश, डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’ दिल्ली, डॉ. वसुधा कामत कर्नाटक, वैष्णो खत्री ‘वेदिका’ जबलपुर, राखी टी सिंह कैलाशी दिल्ली, विक्रम सिंह मादावत ‘रायथला जागीरदार’ तेलंगाना, संजय जैन महाराष्ट्र, रविकांत शुभम झारखंड, पुखराज राजपुरोहित राजस्थान, पवन वर्मा ‘जम्मू कश्मीर’ प्रेम शंकर ‘नुरपुरिया’ पंजाब, दीपिका सुतोदिया असम, प्रफुल पांड्या ‘पागल फकीरा’, गुजरात, डॉ. शिवा अग्रवाल हरियाणा आदि लेखकों ने आपके प्रकाशन से पुस्तकें प्रकाशित करवाई है।
निरंतर अच्छा लेखन पढ़ने से बन सकते सफल लेखक…
दुर्ग छत्तीसगढ़ की रहने वाली प्राजक्ता बताती है कि वर्तमान समय में सोशल मीडिया के बहाने असंख्य लेखकों की बाढ़ सरीखी आ गयी है। जो कुछ नहीं कर रहा है वह लिख रहा है अर्थात वह लेखक है। किन्तु यूट्यूब और फेसबुक के माध्यम से आप अच्छे लेखक नहीं बन सकते। श्रेष्ठ साहित्य पढ़ना, उस पर मनन करना तथा साहित्यिक चर्चा में भाग लेना, यह एक अच्छे लेखक के बहुत जरूरी कार्यकलाप है। इसके साथ ही एक अच्छा लेखक वह है जिसके पास अच्छा गुरु है जो लेखक की रचनाओं को मांजता है, संवारता है। जिसके बाद वह परिष्कृत सृजन संसार के समझ आता है।
प्राजक्ता पुन: लेखन क्षेत्र में कदम रख पाई इसका श्रेय वे जयदीप भटनागर जी और रफीक ओथा जी को देती है जिनके विशेष सहयोग से वे निरंतर सफलता सफलता के झंडे गाड़ रही है।
प्रेषक-
जितेन्द्र शिवहरे
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