कान्हा से वार्तालाप
( किशोर कुमार धनावत )
बहुत दिनों के बाद तुम्हें ,
याद मेरी आई है।
महामारी के समय में,
बंसी मधुर बजाई है।
मेरी नैया डोल रही है,
तू ही आशा की डोर हो।
अमावस की रात घनेरी,
तुम ही सुनहरी भोर हो।
भय का भूत पिछा ना छोड़े,
मेरा नहीं कोई सहारा है।
देख दिखावा भरा है जग में,
एक विश्वास तुम्हारा है।
जन्मांतर से भटक रहा मैं,
अब तो करदो मेरा उद्धार।
मेरे प्यारे सखा मनमोहन,
भूल गया क्या अपना प्यार।
आवाज आती है,
मैं तो तेरे साथ खड़ा हूँ,
तूने परदा डाल लिया है।
बार-बार समझाया तुझको,
ये कैसा तूने हाल किया है।
मत घबरा गौशाला जाकर,
गौमूत्र का पान किया कर।
जब भी मुझसे मिलना चाहो,
आत्मतत्व का ध्यान किया कर।
हाथ बढाया गले लगाया,
मेरे भय को दूर भगाया।
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किशोर कुमार धनावत, रायपुर
८-५-२०२१

