अदृश्य प्रेम
@ पंकज शुक्ला (आवारा)
प्रेम की प्रतिज्ञा लिखूं या लिखूं प्रेम व्यवहार
लिखूं कृष्ण सा त्वरित प्रेम या मीरा की मार ।
प्रेम लिखूं मैं माता की या पुत्र मोह का प्यार
रामायण महाभारत का कारण भी प्रेमाचार ।।
प्रेम न सह पाए पीड़न मन की
न ज्वार की मधु सुहाती है ।
संभल न पाए बैरागी मन
सुध बुध सब बिसराती है ।।
तुम प्रियवर मेरे हो मेरे रहना
ऐसा वचन बद्ध हो जाओ न ।
प्रेम का जो रूप तुम्हे पसंद है
वही रूप में मेरे हो जाओ न ।।
पंकज शुक्ला (आवारा)
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