अपना जिला

मूक-बधिर बच्चों की पहचान को आज आयोजित होगा शिविर

■ प्रत्येक चयनित बच्चों को आरबीएसके के तहत निःशुल्क इलाज की सुविधा

मऊ। जन्मजात मूक-बधिर बच्चों (जन्म से ही बोलने और सुनने में अक्षम) की समय पर पहचान और समय पर इलाज से उन्हें ठीक किया जा सकता है । ऐसे जरूरत मंद बच्चो की राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत निःशुल्क कॉकलियर इम्प्लांट द्वारा सर्जरी से गूंगे व बहरेपन का सही समय पर सही इलाज संभव है। इसी उद्देश्य से आरबीएसके के सहयोग से सदर अस्पताल मऊ में नौ मार्च (मंगलवार) को सुबह 10 बजे से 4 बजे तक विशेष परीक्षण शिविर का आयोजन किया जाएगा । शासन से चयनित कानपुर के डा. एसएन मेहरोत्रा मेमोरियल ईएनटी (कान, नाक एवं गला) फाउंडेशन द्वारा जनपद के विभिन्न ब्लाकों से आये जन्म से पाँच साल के मूक-बधिर बच्चों का परीक्षण किया जायेगा एवं उनके निःशुल्क इलाज, मशीन और चिकित्सा प्रदान कराया जायेगा ।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ सतीशचन्द्र सिंह ने बताया कि शिविर में मूक बधिर बच्चों का परीक्षण किया जायेगा जिसमें कांकलियर इंप्लांट सर्जरी द्वारा चयनित प्रत्येक बच्चे पर मशीन, चिकित्सा और प्रशिक्षण पर आठ लाख रुपये लगभग खर्च आता है जो आरबीएसके के तहत सरकार वहन करेगी । डब्लूएचओ के अनुसार प्रति एक हजार नवजात बच्चों में औसतन छः बच्चा जन्मजात मूक-बधिरपन का शिकार होता है, यदि उसका सही समय पर सही इलाज नहीं होता तो वह गूंगेपन का शिकार हो जाता हैं। फिर भी ज्यादातर बच्चों में इस बीमारी की पहचान नहीं हो पाती या फिर ज्यादातर के बारे में देरी के साथ पता चलता है। इसलिए बच्चे के पैदा होने के बाद उसके विशेषज्ञ डॉक्टरों से लगातार जांच करवाते रहना चाहिए जिससे कि ऐसी बीमारी होने की सूरत में बच्चे का बिना देरी किये इलाज हो सके।
आरबीएसके के नोडल अधिकारी एवं एसीएमओ डॉ बीके यादव ने बताया कि जन्मजात मूक बधिर बच्चों की पहचान के लिए जैसे कि बुलाने पर बच्चों द्वारा कोई कोई प्रतिक्रिया न देना, तेज आवाज होने पर इधर-उधर नहीं देखना या नहीं चौंकना, कुछ ऐसे लक्षणों के होने से बच्चे इस बीमारी की संभावना हो सकती है । यदि छः माह के अंदर ऐसे मूक-बधिर बच्चे की कॉकलियर इमप्लांट सजर्री हो जाए, तो बेहद शानदार नतीजे आते है। देरी की सूरत में पीड़ित बच्चे के दिमाग के बोलने वाले हिस्से पर छह साल की उम्र उपरांत सिर्फ देखकर समझने वाला दिमागी विकास होता है। इसलिए जितने कम उम्र में कॉकलियर इमप्लांट सजर्री होगी, नतीजे उतने ही परिणाम सकारात्मक होंगे।
आरबीएसके डीआईईसी मैनेजर अरविंद वर्मा ने बताया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत मऊ जिले के सदर अस्पताल में शिविर में जनपद में सभी ब्लाकों से आये संस्था के विशेषज्ञ परीक्षण कर उन्हें चयनित कर कानपुर के डॉ एसएन मेहरोत्रा मेमोरियल में इलाज के लिये ले जाते हैं। जहां उन चयनित बच्चों को कॉकलियर एक बेहद संवेदनशील यंत्र (डिवाइस) होता है, जिसको सजर्री द्वारा लगाया जाता है। यह प्रक्रिया करीब दो घंटों के ऑपरेशन के साथ पूरी हो जाती है और मरीज को दो से तीन दिन में अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है। पिछले वित्तीय वर्ष में इस शिविर के माध्यम से वर्ष 2020-21 में जिले के विभिन्न ब्लाकों से 15 मूक-बधिर बच्चों को सरकार से निःशुल्क लाभ प्राप्त हुआ है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *