शब्द मसीहा केदारनाथ की कहानी : बीजी
वैसे तो मैं ज्यादा लोगों से मिल नहीं पाता हूँ, मगर जब से सामने वाले फ्लोर पर एक बुजुर्ग महिला आई हैं, उन्हें देखकर न जाने क्यों मुझे बहुत सुखद अहसास होता है। कई बार जब तब वे छज्जे पर दिख जाती हैं, तो मैं उन्हें दूर से ही नमस्ते कह देता हूँ। उनके मुस्कुराने में एक बहुत ही अपनेपन का अहसास होता है। वे भी मुझे देखकर अपना हाथ मिला देती हैं मुस्कुराते हुए।
आजकल कोरोनावायरस के कारण मैंने भी तीसरी मंजिल पर खुद को क्वॉरेंटाइन किया हुआ है। सामने वाले फ्लोर का दरवाजा ज्यादातर बंद ही रहता है। मैं कई बार अपनी छत पर टहलने के लिए चला जाता हूँ, और लगातार उस बालकनी और छज्जे को देखता रहता हूँ, जहाँ पर बुजुर्ग महिला मुझे देखकर मुस्कुराती हैं।
आजकल अकेला भी हूँ, पत्नी के अलावा और कोई दूसरा मुझतक नहीं आता है। मैंने खुद ही मना कर दिया है कि कोई मेरे पास नहीं आना है। कहीं ऐसा न हो कि किसी और को भी इस कोरोनावायरस का संक्रमण हो जाए। आज पूरे बारह दिन हो चुके हैं मुझे क्वॉरेंटाइन हुए, लेकिन मैंने उन बुजुर्ग महिला के दर्शन नहीं किए हैं। अब तो डॉक्टर ने भी मुझे कह दिया है कि मैं आराम करूं और अब मैं कोरोनामुक्त हूँ।
आज सुबह ही काफी देर तक अपनी छत पर लगे हुए पौधों को मैंने साफ किया और उनकी पीली पत्तियां और बेकार टहनियों को छांट दिया। मैं बहुत देर तक इसी आस में अपनी छत पर था कि शायद आज उन्हें देख सकूंगा, लेकिन मेरे हाथ निराशा ही लगी। मैं अपना काम निपटाकर करीब दो घंटे बाद नीचे उतर आया था अपनी छत से।
अपने लैपटॉप को खोलकर सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है, यह सब देखने लगा, और साथ ही मैंने यूट्यूब पर गाने लगा लिए थे। मन तो अभी भी अंदर से अस्थिर किए हुए था मुझे। न जाने उन्हें लेकर मेरे मन में क्या-क्या चल रहा था। मेरे मन में उन्हें लेकर बहुत अजीब-अजीब से ख्याल आ रहे थे। वैसे तो मैंने कभी उनसे बात नहीं की थी, लेकिन उनके चेहरे को देखकर मुझे मेरी मां की याद आ जाती थी। वैसा ही गोरा और तेज से भरा हुआ चेहरा था उनका। बस उनका शरीर मुझे लगता है कि मेरी मां से भारी था।
अपने बेड पर मैं लेटा हुआ था और मेरा लैपटॉप मेरी जांघों पर रखा हुआ था। तभी मैंने देखा कि सामने वाली बालकनी पर एक महिला खड़ी हुई है। उन्हें मैंने पहले नहीं देखा था। ये लोग नए किराएदार थे शायद इसलिए इस परिवार के बारे में मेरी ज्यादा जानकारी भी नहीं थी। पत्नी ही घर में रहती हैं, इसलिए शायद उन्हें ही पता होगा कि कौन आया है। वैसे भी ऑफिस के काम से मैं सुबह जल्दी ही निकल जाता हूँ और शाम को जब पहुंचता हूँ, तब तक सूरज ढल चुका होता है। मगर यह बात बहुत अच्छी थी मेरे लिए कि जब मैं निकलता था घर से, तब वह बुजुर्ग महिला बालकनी में ही बैठी रहती थीं।
मैं अचानक से बाहर निकल आया था और छज्जे पर जाकर खड़ा हो गया था। मुझे न जाने क्यों लग रहा था कि मैं उन बुजुर्ग महिला के दर्शन कर पाऊंगा। छज्जे पर खड़ी यह नई महिला भी मुझे लगातार देख रही थी। मैं भी उन्हें देख रहा था। वह महिला मुझे देखकर मंद-मंद मुस्कुराती रही थी।
मैं अंदर से सच बताऊं तो इस मुस्कुराहट से असहज –सा महसूस कर रहा था और मेरा ध्यान भी उस घर के दरवाजे की तरफ से लगा हुआ था।
“वीर जी! सत श्री अकाल।” उस महिला ने मुझे संबोधित किया।
“सत श्री अकाल जी। आप नए आए हैं?” मैंने अपना प्रश्न कर दिया था।
“हां जी, मम्मी के घुटनों का ऑपरेशन करवाया है। मैं उनकी बेटी हूँ। भाभी की मदद के लिए मैं भी आ गई हूँ।” उस महिला ने कहा।
“पर आपने मुझे वीर जी क्यों कहा? आप तो मुझे जानते नहीं हैं।” मैंने कहा।
“आपको वीर जी कहने से दुख होता है क्या? वैसे मैं आपको जानती हूँ, मम्मी ने आपके बारे में मुझे बताया था कि आप रोज सुबह-सुबह जब घर से निकलते हैं तब उन्हें नमस्ते कहते हैं। यहां शहर में ज्यादातर लोग अपने आप में ही डूबे रहते हैं। मम्मी पहले गांधीनगर में रहते थे। हमने दो महीने पहले ही घर को खरीदा है। मम्मी को सीढ़ियां चढ़ने में बहुत दिक्कत होती है, इसलिए उनका ऑपरेशन करवा दिया है। मम्मी रोज सुबह आपको अपने काम पर जाते हुए देखते हैं। उन्हें आप बहुत अच्छे लगते हैं।” उस महिला ने बताया।
” लेकिन मैं उन्हें क्यों अच्छा लगता हूँ? मैंने तो कभी उनसे बात भी नहीं की। कई दिनों से उन्हें मैंने देखा नहीं था, इसलिए घर की तरफ देखता रहता हूँ।” मैंने कहा।
“हां, मुझे पता है आपके घर के बाहर कोरोना संक्रमण का पर्चा लगा हुआ था और जिस दिन आपने टेस्ट कराया था, उसी दिन मम्मी का ऑपरेशन भी हुआ था। इसलिए मम्मी अब बेड पर आराम कर रहे हैं। अगर सब कुछ अच्छा रहा तो मम्मी आपसे बात भी कर सकेगी और आपके साथ घर में आकर चाय भी पी सकेंगी।” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
“पर आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया कि मैं उन्हें क्यों अच्छा लगता हूँ?” मैंने अपना सवाल दोहराया।
“इसका जवाब तो मम्मी ही बता सकते हैं, आपके पास व्हाट्सएप है?” उस महिला ने मुझसे पूछा।
“हां, मेरे पास व्हाट्सएप है। अब मेरा फोन ही तो सब से जुड़ने का साधन है मेरे पास। व्हाट्सएप वीडियो कॉल करके उनके हालचाल लेता रहता हूँ। मैं बिल्कुल अकेला हो गया हूँ, तो ऐसे में मेरा फोन ही अब मेरा दोस्त हो गया है।” मैंने कहा।
“वीर जी! आप अपना नंबर मुझे बता दो। मैं आपकी बात मम्मी से करा देती हूँ। अपना सवाल आप खुद ही पूछ लेना। मम्मी को भी अच्छा लगेगा।” उस महिला ने कहा।
“जी, आप मेरा नंबर नोट कर लीजिए।”
उसने अपना फोन ऑन कर लिया था, और मेरी तरफ देख रही थी जैसे कि मुझसे कह रही हो कि मैं अपना नंबर बताऊँ। मैंने अपना फोन नंबर उन्हें बता दिया था। नंबर लेने के बाद वह दरवाजा बंद कर के अंदर चली गई थी। उसके कपड़ों को देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह पंजाब से आई थी। बहुत ही खूबसूरत और गोरी। तीखे नयन-नक्श वाली लेकिन बहुत ही सादगी भरी हुई। मैं अंदर आकर अपने बेड पर लेट गया था।
अभी कुछ ही देर हुई थी कि मेरे फोन पर एक अनजान नंबर से वीडियो कॉल आ रहा था। मैं समझ गया था कि यह कॉल सामने से ही आया होगा। मैंने तुरंत अपने आप को ठीक किया और उठकर बैठ गया। मैंने कॉल रिसीव कर लिया था।
जैसे ही कॉल रिसीव किया तो उन बुजुर्ग महिला का चेहरा मेरे सामने था। मैं उन्हें दोनों हाथ से नमस्ते नहीं कर सकता था, इसलिए मैंने अपना हाथ अपने सिर की तरफ ले जाकर उन्हें नमस्ते कहा।
“जीते रहो बेटा जी। वाहेगुरु जी कि आपके ऊपर मेहर हो। मुझे गुड्डी ने बताया कि तुम्हें कोरोना हो गया है, और तुम घर में अकेले कमरे में पड़े हो। बेटा चिंता नहीं करना, वाहेगुरु जी सब ठीक कर देंगे। हिम्मत रखना।” उन बुजुर्ग महिला ने मेरी तरफ मुस्कुराते हुए कहा।
“जी, अब मुझे कोई खतरा नहीं है। कल मेरी डॉक्टर से बात हुई थी। अब उन्होंने मुझे बाहर निकलने के लिए कह दिया है लेकिन अभी सात दिन और उन्होंने मुझे आराम करने के लिए भी कहा है। दिल्ली सरकार ने सत्तरह दिन का क्वॉरेंटाइन पीरियड रखा है, इसलिए मैं अभी घर में ही रहूँगा। मुझे पता चला है कि आपके पैरों का ऑपरेशन हुआ है।” मैंने पूछा।
“हां, बेटा जी! अब शरीर बूढ़ा हो गया है, इसलिए डॉक्टर के पास जाकर इसकी मरम्मत करवानी पड़ी है। पूरी गली में कोई मेरी तरफ़ नहीं देखता था, लेकिन मैं तुम्हें देखने के लिए हर रोज छज्जे पर आकर बैठ जाती थी।” उन्होंने मुझसे कहा।
“हां, मैं भी आपको अपने कमरे से बाहर निकलकर, आपके घर की तरफ ही देखता हूँ और मुझे लगता था कि आप दिखाई दे जाएंगे, लेकिन मैं कई दिनों से निराश हो रहा था। वो तो आज इन्होंने मुझे देख लिया, और मेरा नंबर लेकर आप से बात करवा दी।” मैंने कहा।
“हां बेटा जी, यह आंखें भी न, देखने की आदी हो जाती हैं। मैं भी यहां घर में ही पड़ी हूँ। कुछ ज्यादा ही खा लिया था मैंने इसलिए मोटी हो गई हूँ, और मेरे घुटने जवाब दे गए मेरा ही खा पी के मेरा हो बोझ नहीं उठाते नालायक। लेकिन तू मुझे क्यों देखना चाहता था?” उन्होंने मुझसे सवाल किया।
“ठीक वैसे ही, जैसे आप मुझे देखना चाहते थे?” मैंने कहा। मेरे मन के अंदर बहुत अजीब तरह की उथल-पुथल मची हुई थी। मुझे लगता था कि अगर मैं इन्हें अपने मन की बात बता दूंगा तो शायद इन्हें अच्छा नहीं लगेगा।
“मैं तो तुम्हारे अंदर अपने सुखबीर को देखती थी। मेरा बेटा भी तुम्हारी तरह गबरु जवान था। तुम्हारे जैसा ही लंबा और गोरा। मुझे बहुत प्यार करता था। अपने सिर आंखों पर बैठाकर रखता था। अब तो बस उसकी यादें ही रह गई हैं।” मुझसे बातें करते हुए उनका स्वर भर्रा गया था और मैं देख सकता था कि उनकी आंखें भी सजल हो गई हैं।
“क्या हुआ आपके बेटे को?” मैंने पूछा।
“कुछ नहीं बेटा। फौज में था मेरा बेटा, और पाकिस्तान से लड़ाई लड़ते हुए मुल्क के लिए शहीद हो गया। जब सवेरे-सवेरे तू अपनी स्कूटी पर निकलता था और मुझे नमस्ते करता था, तब मुझे बहुत अच्छा लगता था, और मैं सोचती थी कि अगर मेरा बेटा फौज में नहीं होता, तो रोज तेरी तरह ही मुझे सत श्री अकाल बुलाता और मेरे पैर पड़कर मुझसे आशीर्वाद लेता।” उन्होंने अपने आप को संयत करते हुए कहा।
“हमारे शहीद कभी नहीं मरते, वे तो अमर हो जाते हैं। आपको उनकी शहादत पर गर्व करना चाहिए। हर मां की किस्मत में किसी शहीद की मां होना नहीं लिखा होता।” मैंने कहा।
“बेटा! शहादत हमेशा दूसरे की ही अच्छी लगती है। अपने बेटे की शहादत देना और अपने बेटे की जुदाई को महसूस करना कितना बड़ा दुख होता है, ये तो एक मां ही जानती है। भले ही लोग कुछ भी कहते रहें, कितना भी कोई प्यार कर ले, और कितना भी कोई सम्मान दे दे, पर एक मां की जिंदगी में कोई भी उस बेटे की जगह नहीं ले सकता। मेरा सुखबीर बहुत ही नेक बच्चा था। उसने कभी मुझे मोड़ के जवाब नहीं दिया था। बस अपने बाप की तरह उसे भी फौज में ही जाने का शौक था।” उन्होंने मुझसे कहा।
“हां, आपने सही कहा, एक मां ही दर्द को समझ सकती है। और शायद एक मां ही इसे सह भी सकती है। इसीलिए तो मां को इतना ऊंचा दर्जा दिया गया है। मैं आपके दुख को समझ सकता हूँ।” मैंने कहा।
“नहीं, उसके जाने का या शहीद होने का दुख नहीं है मुझे। बस दुख इस बात का है कि दुनिया में जीतते तो राजा लोग हैं, और मरते माओं के लाल हैं। अगर मेरा सुखबीर आज जिंदा होता, तो वह तुम्हारी तरह लगता। इसलिए मैं रोज बालकनी में आकर बैठ जाती थी, ताकि तुम्हारी एक झलक देख सकूं। तू देखना चाहेगा कैसा दिखता था मेरा सुखबीर?” उन्होंने मेरी तरफ अपनी आंखें करते हुए कहा। मुझे ऐसा लगा जैसे कि जैसे वह मुझे बता देना चाहती हों कि वह मुझे रोज सुबह क्यों देखती थीं।
“जी, दिखाइए। मैं भी भाई साहब के दर्शन करना चाहूँगा।” मैंने कहा। वह मुझे देखती रही और इशारों-इशारों में गुड्डी को सुखबीर का फोटो लाने के लिए कह दिया था। हम दोनों के बीच में कोई संवाद नहीं हो रहा था। वह एकटक मेरे चेहरे को देख रही थीं।
तभी गुड्डी ने उनके हाथ में एक तस्वीर पकड़ा दी थी। उन्होंने तस्वीर को चूमा और फिर उस तस्वीर का रुख मेरी तरफ कर दिया। एक गोरे चिट्टे सिख सिपाही की फोटो थी। उसके चेहरे का रंग ऐसा लगता था जैसे किसी ने गुलाब की पंखुड़ियों और केसर को मिलाकर के उसके चेहरे पर लगाया हो। बहुत ही खूबसूरत और उसके चेहरे पर एक सिपाही होने का और साथ ही एक सिपाही के बेटे होने का दर्प साफ-साफ छलक रहा था। मैं उस तस्वीर को देखता ही रह गया। उसके नयन नक्श और रंग-रूप बहुत हद तक मुझसे मिलते थे।
मैं लगातार उस तस्वीर को निहारे जा रहा था। मेरे शब्द जैसे कहीं खो गए थे। मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं था। तभी उन्होंने उस फोटो फ्रेम को हटाया और मेरी तरफ देखते हुए बोली-” मैंने गुड्डी को भी कहा था कि सामने वाले घर में एक हिंदू लड़का है, अगर उसे पगड़ी पहना दो और दाढ़ी-मूछें लगा दो, तो बिल्कुल अपने सुखबीर जैसा ही दिखाई देता है। इसे तो भरोसा ही नहीं होता था मुझपर । आज मैंने ही कहा था सुबह इससे कि जब तुम जाओगे तो देखकर बताए कि मैं सच कह रही थी या झूठ कह रही थी। ये सुबह बहुत देर तक खड़ी रही, और जब नीचे उतरी तो इसे पता चला कि तुम क्वारंटाइन किए हुए हो। बेटा डरने की कोई जरूरत नहीं है। मैंने वाहेगुरु जी से अरदास कर दी है तुम्हारे लिए। तुम जल्दी ही ठीक हो जाओगे। जवान बच्चों के लिए भला बीमारी भी कोई चीज होती है, बिल्कुल चिंता मत करना तुम।” उन्होने बहुत ही अपनेपन से कहा था।
मेरे पास इस अनमोल प्यार का कोई जवाब नहीं था। मैं अपने आप को एकदम से ठगा हुआ महसूस कर रहा था। कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि अब मैं इन से क्या बात करूँ। इसके आगे इन्हें क्या कहूँ, क्या न कहूँ। मैं अपनी सोच में अभी खोया ही हुआ था कि उन्होंने मुझसे कहा, ” बेटा जी! एक बात कहूँ?”
“हाँ बीजी! कहिए क्या कहना है आपको?” मेरे मुँह से अनायास ही निकाल गया था।
“बेटा जी! इसी आवाज को सुनने के लिए तो मन करता था। मेरे सुखबीर के अलावा मुझे कोई भी बिजी नहीं कहता था। आज तुमने मुझे बिजी कहा, मुझे बहुत अच्छा लगा बेटा। तुमने मुझे बिना मांगे ही सब कुछ दे दिया। मैं तो समझती थी कि शहर के लोगों में दिल नहीं होता, मैंने देखा भी था। पर तुमने मुझे गलत साबित कर दिया, शहर के लोगों में भी दिल होता है। अब जब भी मुझसे बात करो तो मुझे बीजी ही कहकर बोलना, नहीं कहा तो तुम्हारे कान खींच दूँगी। तुम्हारे अंदर मुझे सुखबीर दिखाई देता है।”
इसके बाद फ़ोन गुड्डी ने ले लिया था।
“बहुत-बहुत थैंक यू। आज बिजी बहुत खुश हैं। और उनकी बात भी बिल्कुल सही निकली, आप मेरे भाई जैसे ही लगते हैं। क्या मैं आपको वीर जी बुला सकती हूँ?” गुड्डी ने कहा।
“आज का दिन सचमुच बहुत खुश करने वाला दिन है। मैं तो इस बीमारी को कोस रहा था। मुझे क्या पता था कि इस बीमारी की वजह से आज मुझे एक बिजी मिलेंगी और एक प्यारी सी बहन भी। तुम्हारा जो मन करे मुझे कह सकती हो।”
गुड्डी की आंखों में अचानक से जैसे अपने भाई सुखबीर के लिए प्यार का सैलाब उमड़ आया था। मैं इस सैलाब में अपने आप को अब और नहीं संभाल सकता था। मैंने कॉल कॉल कट कर दिया था। और इस नए नंबर को बीजी के नाम से सेव कर लिया था। मैं नहीं जानता कि किस्मत भी कोई चीज होती है, लेकिन आज जो कुछ हुआ, उसने मुझे घर बैठे-बिठाये एक दुनिया का सबसे प्यारा रिश्ता बेदाम ही भेंट कर दिया था।

