पहाड़ी नदी
( मधुलिका बरनवाल )
पहाड़ी नदी सी चंचल थी
जीवन मे मेरे सरलता थी
और सहजता थी दामन में
बहती थी मैं अपनी मौज में
चट्टाने भी रोक सके ना
ऐसी झल्ली नदी थी मैं
बहती धारा के प्रवाह में
कितनी भी आये बाधाएं
रोक सके ना राह मेरी
पहाड़ी नदी ……जो ठहरी ।
अब अपनी धुन में बहती हूँ
किसी से कुछ ना कहती हूँ
जीवन व्यथा को अपने मैं
अंतर्मन में छुपा लेती हूँ
पहाड़ी नदी सी चंचल थी
भावो की धारा में बहती थी
अब धीर गंभीर सी हो गई
अंधेरी गुफा में कही खो गई
कही………खो………गई।।

