अखबार का कोना

भ्रष्टाचार की बलि वेदी पर मर मिटा कोरोना

अखबार का कोना : हिन्द भास्कर

सम्पादकीय : प्रवीण राय

कोरोना नामक वायरस भी आश्चर्य चकित हो गया जब देखा कि भारत में तो इसका कोई असर ही नहीं यहां तो लोग मुझे सीधे निगलने को तैयार बैठे हैं।बस अवसर मिलना चाहिए।और इस समय स्वास्थ्य विभाग में तो अवसर ही अवसर है। इसीलिए बड़े साहब भी परजीवी बनकर स्वास्थ्य विभाग के ऊपर ही गिलोय की लता के जैसे चढ़ गए हैं। कहते हैं गिलोय जिस पेड़ पर चढ़ता है। उसी का गुड़ दोष उसमें समाहित हो जाता है। और साहब पर भी स्वास्थ्य विभाग का असर सर चढकर बोलता है। इसके पहले तो बाढ़ और सूखे से ही काम चल जाता था पर भला हो इस कोरोना का जो पहले ही बोनस के रूप में आ गया। जैसे- जैसे कोरोना बढ़ेगा हाटस्पाट भी तो बढ़ेगा, फिर क्या वही पानी मिलाकर सेनेटाइजर की बूंदें, दूर से ही टेंपरेचर नापने वाला थर्मल स्कैनिंग, मौके पर कभी न जाने वाले डाक्टरों का कोरोना के नाम पर लंबी बिल , क्वारंटाइन सेंटरों की तो बात ही क्या एक की जगह ग्यारह का हिसाब बनता देख कोरोना भी सोचने लगा कहां बुरे फंस गए यार।मेरा नाम, और लोग लूटे दाम। सोच‌-सोचकर कोरोना का माथा खराब होने लगा। मैं तो सुनता था भारत महान है लेकिन यह सब क्या? तभी ट्रक के पीछे लिखा उसको दिखा ‘सौ में सौ बेइमान फिर भी मेरा भारत महान’।अब करे भी तो क्या बेचारा गलत जगह जो फंस गया। लेकिन कोई तो रास्ता ढूंढना पड़ेगा दुम दबाकर निकलने के लिए। लेकिन मन में यह विचार आया आओ सैर करें। और वास्कोडिगामा की तरह भारत की व्यवस्था चल कैसे रही खोज करने निकल पड़ा।सबसे पहले प्रवेश दिल्ली में और यहां से अच्छा माहौल ही नहीं कहीं मिलेगा खुद खांसी वाले मुखिया जी दावे तो हजार करते हैं पर धरातल पर दोष केंद्र सरकार को।वह तो भला हो यू पी वाले बाबा जी का जो समय से पहले ही कोरोना संबाहको को घर पहुंचाने का बेड़ा उठा लिए नहीं तो तुगलक की सेना की तरह दिल्ली से दौलताबाद करने में रास्ते में ही आधे लोग निपट जाते। आश्चर्य कि महामारी में भी राजनीति, कि यह मेरी जनता वह आपकी इन अस्पतालों में सिर्फ मेरे आदमी ईलाज करवा सकते कोई दूसरा नहीं। नतीजा भी सामने है।अब मुंबई भी देश की आर्थिक राजधानी है, और वहां भी अनुकूलता कम नहीं जो पूरे पूर्वांचल सहित उत्तरी और पूर्वी भारत में प्रसाद बांट दिए लेकिन जिनके लिए अपना खून पसीना जलाया वह दो जून की रोटी नहीं दे सके। ऐसी राजनीति देखकर करोना फूट-फूटकर रोया। चाहे कुछ भी हो, जाता तो जनता की जेब से ही है। करोड़ों रुपए दान के आए, सारी विकास की नई योजना आगामी एक साल के लिए बंद सांसद, विधायक की विकास निधि बंद,पेट्रोल,डीजल के दाम में बढ़ोतरी, और पैकेज मिला लंबा चौड़ा। लेकिन रोजगार देने के नाम पर सिर्फ मनरेगा, और मनरेगा में भारी लूट परंतु हिसाब देने में ‘खाता न बही रामलाल जो कहें वही सही’।
कोरोना ने तो गजब कर दिया, सारी आर्थिक समस्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आदि सारे कमियों को अपने मत्थे मढाते देख, कोरोना बदहाल होकर इस नतीजे पर पहुंचा कि ‘तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद’ और जाते-जाते मुंह से बोल पड़ा वास्तव में भारत में आध्यात्मिक शक्ति है, नहीं तो इतने भ्रष्टाचार के बाद भी देश चल रहा है तो वह भगवान भरोसे ही चल रहा है।और भ्रष्टाचार की बलि वेदी पर सर पटक-पटक कर कोरोना ने अपने प्राण त्याग दिए।और जाते-जाते अंत में भारी मन से कह गया ‘खुश रहो अहले वतन हम तो वतन छोड़ चले।

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