सरल, सहज, शब्द संयोजन और काव्य व्यंजन के महारथी हैं उद्घोषक राजेश श्रीवास्तव
(फतेहबहादुर गुप्ता)
रतनपुरा (मऊ)। भले ही कल हम सितारों में ना हो, अंधेरों से मेरा पता पूछ लेना । न होगा बहारों में घर कोई मेरा फिजाओं से मेरा शहर पूछ लेना।। जौनपुर के शायर अजनबी की रचना के सारथी हैं राजेश श्रीवास्तव। जिन्होंने शायर के इस अंश को अपने जीवन में बखूबी जिया है। लघु समाचार पत्रों से अपना कैरियर का शुभारंभ करने वाले राजेश श्रीवास्तव उद्घोषक के तौर पर पूरे जनपद में ही नहीं पड़ोसी जनपदोंं में भी अपनी एक
विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। 57 वर्षीय राजेश श्रीवास्तव मूल रूप से देवरिया जनपद के रुद्रपुर तहसील के निवासी हैं, और इन्होंने अपना मुकाम तय करने में काफी संघर्ष किया है। अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी विधा को आजमाते हुए इन्हें सबसे ज्यादा लगाव अपने उद्घोषक के कैरियर में हुआ। जिससे इन्हें काफी प्यार है ,और इन्हें सुकून भी मिलता है। राजेश श्रीवास्तव की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा अपने गांव रुद्रपुर से हुई ,उन्होंने डीएन इंटर कॉलेज रुद्रपुर से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा ग्रहण की। फिर इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया। इनके पिता स्वर्गीय भगवती प्रसाद श्रीवास्तव मऊ जनपद मुख्यालय पर डीसीएफ (डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव फेडरेशन) के प्रबंधक थे। जिनका निधन 17 मई 1996 को हो गया। चुकि मऊ जनपद में सेवारत होने के नाते राजेश श्रीवास्तव अपने पिता के साथ रहते थे। उनकी देखभाल करते थे ।तथा कैरियर के निमित्त विभिन्न क्षेत्रों में अपने भाग्य की आजमाइश करते रहते थे। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने हैंडलूम कारपोरेशन से प्रशिक्षण प्राप्त किया। जिसमें इन्होंने कई आयामों को बखूबी ग्रहण किया, और 12 वर्षों तक नेहरू युवा केंद्र से जुड़े रहे । नेहरू युवा केंद्र के तत्कालीन युवा समन्वयक कमलेश दुबे के संपर्क में आने के बाद उनसे इनको काफी मार्गदर्शन मिला, और उसमें वे कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी देते हुए उसका संचालन करते रहे ।युवा समन्वयक कमलेश दुबे से राजेश श्रीवास्तव का 7 वर्षों तक बेहतर समन्वय रहा, जिसमें इनकी प्रतिभा को निखारने में मदद की। उद्घोषक के रूप में इनकी प्रतिभा को निखारने में विभिन्न विधाओं के विद्वान राजकुमार सिंह उर्फ राजा सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। राजा सिंह राजेश श्रीवास्तव की प्रतिभा को पहचान लिया था और उस दौरान नवगठित आर्केस्ट्रा टीम में संगीत के परफॉर्मेंस में राजेश श्रीवास्तव भी एक हिस्सा हुआ करते थे। जिसमें वे कलाकारों की प्रतिभा का परिचय देते हुए दर्शकों को उनकी भूमिका से परिचय कराते थे। यह कई वर्षों तक आर्केस्ट्रा टीम दर्शकों को बेहतर मनोरंजन कराती रही ,और इसमें उद्घोषक के तौर पर राजेश श्रीवास्तव की प्रतिभा दिनों दिन निखरती गई। अपनी दमदार आवाज और बेहतरीन ढंग से परफारमेंस की विधा ने राजेश श्रीवास्तव को पूरे जनपद में अच्छा खासा मुकाम दिला दिया।जिससे निजी क्षेत्रों के अलावा सरकारी महकमे के कार्यक्रमों में इनकी लगातार भागीदारी बढ़ती गई।
यद्यपि की राजेश श्रीवास्तव ने अपना कैरियर लघु समाचार पत्रों के बंडलिंग,वितरण से लेकर के समाचार संकलन और विज्ञापन तक का काम किया। इनका सबसे पहले अखबारी दुनिया में मुलाकात वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक सत्येंद्र मिश्रा से हुई ।सत्येंद्र मिश्रा ने शुरुआती दौर में इनकी प्रतिभा को पहचान लिया, और अपने देखरेख में इनकी अलग-अलग विधाओं मैं प्रवीण किया। हालिया तौर पर खुले दैनिक समाचार पत्र पूर्वांचल संदेश में इन से काम लिया। जिससे संपादक सत्येंद्र मिश्रा के मार्गदर्शन में मीडिया क्षेत्रों के विविध आयामों में पारंगत राजेश श्रीवास्तव के परिचय का दायरा बढ़ता गया। इस बीच दैनिक जागरण के तत्कालीन जिला प्रतिनिधि दयानंद पांडेय, हिमांशु उपाध्याय, विनय कुमार श्रीवास्तव जैसे वरिष्ठ पत्रकारों से उत्तरोत्तर मुलाकात होती गई ,और अखबार की दुनिया में इनके परिचय की सीमाएं लगातार बढ़ती गई , वे इसमें अवैतनिक रूप से कार्य करते रहे।परंतु बतौर उद्घोषक के तौर पर इनकी एक अलग लाइन बन रही थी जिससे उनकी अलग पहचान बनती गई, और इस काम में इन्हें पारिश्रमिक के तौर पर भी इनके पारिवारिक खर्चे का जुगाड़ भी होता गया। पारिवारिक दायरा बढ़ने के साथ ही इनके खर्चे भी बढ़ने लगे, इनकी पत्नी कंचन श्रीवास्तव ने भी इनके प्रतिभा को निखारने में भरपूर सहयोग दिया। तथा आर्थिक स्थिति को बेहतर करने के दृष्टिकोण से उन्होंने जनपद मुख्यालय स्थित डान वास्को में अध्यापन का कार्य संभाल लिया। जिससे पारिवारिक गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। उद्घोषक के रूप में इस बीच इनकी अच्छी खासी पहचान बन गई थी । प्रशासन के सरकारी आयोजनों में इनके उद्घोषक शैली से सभी लोग प्रभावित थे ।जिसका परिणाम यह हुआ कि मऊ जनपद मुख्यालय पर बालिका महोत्सव 2005, सद्भावना दिवस 2005, सीएम कन्या विद्या धन तथा बेरोजगारी भत्ता वितरण वर्ष 2005 तथा मऊ महोत्सव 2008 में आयोजित हुए ।कार्यक्रमों में इन्होंने बतौर उद्घोषक के तौर पर अपनी बेहतर परफार्मेंस दी ।इसके बाद तो इनकी उद्घोषक विधा की पूरे जनपद में तूती बोलने लगी । निजी क्षेत्रों में भी इनकी मांग बढ़ गई ।अब राजेश श्रीवास्तव किसी परिचय के मोहताज नहीं है। उद्घोषकराजेश श्रीवास्तव एवं कंचन श्रीवास्तव की दो पुत्रियां हैं। परिवार के भरण पोषण एवं उनकी शिक्षा-दीक्षा को लेकर के राजेश श्रीवास्तव को आर्थिक विपन्नता का सामना करना पड़ा। यह इनके जीवन का दुखद पक्ष है। खेती किसानी के जो अंश इनके जिम्मे था। उसे विक्रय करके इन्होंने पुत्रियों को पढ़ाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि इनकी बड़ी पुत्री शिवांगी श्रीवास्तव शहर के डीएवी इंटरमीडिएट कॉलेज से इंटरमीडिएट की शिक्षा पूरी करने के बाद उसने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में जाने का अपना मंसूबा अपने पिता को बताया, तो उन्होंने पुत्री को के लक्ष्य निर्धारण को लेकर के थोड़ा विचलित हुए। परंतु उसको धार देने के लिए उन्होंने कमर कस लिया, और उनकी पुत्री ने भी इसकी तैयारी शुरू कर दी। जिससे उसका चयन यूनाइटेड इंजीनियरिंग कॉलेज इलाहाबाद में हो गया ।जहां से उसने बीटेक किया ।इसके साथ ही भाग्य ने उसका साथ दिया ,और इन दिनों वह विप्रो में इंजीनियर है ।दूसरी पुत्री मांडवी श्रीवास्तव नौवीं कक्षा की छात्रा है ,और वह अपना सारा फोकस शिक्षा में लगा रखा है । मऊ शहर के टाउन डाकघर के पास किराए के मकान में रहते हैं। लाक डाउन की अवधि में सारे कार्यक्रमों पर विराम लगा हुआ है । दैनिक दिनचर्या प्रभावित है।इस बीच जिलाधिकारी ज्ञानप्रकाश त्रिपाठी एक दिन अचानक फोन करके राजेश श्रीवास्तव के आवास पर पहुंच गए,उनका हालचाल लिया जिस पर राजेश श्रीवास्तव ने बातचीत के दौरान बताया कि उनकी स्थिति रोज कुआं खोदने और रोज पानी पीने की बन गई है। जिलाधिकारी ने उनकी स्थिति को भली भांति समझ गए, और अपने मातहतों से उनके लिए एक माह का राशनकिट भिजवा दिया। जिसकी वजह से लाक डाउन की विकट परिस्थितियां राजेश श्रीवास्तव के लिए कुछ सामान्य सी हो गई।
अपने बेहतरीन उद्घोषक शैली और नई नई विधाओं के प्रयोग से इन्होंने कार्यक्रमों में जान फूंकने का जो कार्य किया, उसके एवज में उन्होंने विभिन्न संस्थाओं से सैकड़ों स्मृति चिन्ह और पुरस्कार भी प्राप्त हुए। जिसमें कुंभ प्रयागराज, नमामि गंगे तथा उत्कृष्ट लोक सेवक का पुरस्कार सम्मिलित है। राजेश श्रीवास्तव की प्रतिभा को निखारने में उनके मित्रों शुभचिंतकों और पत्रकार साथियों का बहुत बड़ा योगदान है। जिसकी झलक मंच पर प्रस्तुति के दौरान उनकी ओजस्वी वाणी, मिठास शैली, उत्कृष्ट शब्द चयन और कार्यक्रमों का बेहतर संयोजन के समन्वय से देखने को मिलती है। राजेश श्रीवास्तव अपने जिंदगी के तमाम झंझावातो उतार-चढ़ाव एवं फकाकशी के जिस दौर से गुजरे हैं, उस पर बहुत पन्ने लिखे जा सकते हैं। लेकिन उसका वर्णन चंद लाइनों में ही करके अपने विधा की अमिट छाप छोड़ी है।
यह मत पूछिए कैसे जीता हूं मैं
रोज घुट घुट के जीता हूं मैं।
जिंदगी एक पुरानी चादर है,
रोज फटती है रोज सीता हूं मैं।।


