खास-मेहमानचर्चा में

महाराष्ट्र में चल रहा आपरेशन लोटस का खेल

यशोदा श्रीवास्तव

नई दिल्ली। महाराष्ट्र के उद्धव सरकार को अस्थिर करने की कोशिश चल रही है. राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को मोहरा बनाया जा रहा है. राज्यपाल तो कहने को सांविधानिक पद है. हकीकत यह है कि केंद्र की सरकारों ने आजादी के कुछ वर्ष बाद से ही इसका राजनितिकरण कर दिया था.कांग्रेस चूंकि सबसे अधिक समय तक सत्ता में थी इसलिए इस पद के दुरुपयोग का सबसे अधिक तोहमत भी उसके खाते में है.

फिलहाल ताजा मामला महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की विधान परिषद में मनोनयन में राज्यपाल द्वारा आनाकानी का है. हालांकि इस खेल में राज्यपाल बस एक मोहरा हैं. खेल तो दिल्ली से चल रहा है. अभी तक जैसा दृष्य दिख रहा है उससे महाराष्ट्र में आपरेशन लोटस जैसा साफ दिख रहा है. ठीक वैसे ही जैसा इसके पहले मध्यप्रदेश और उसके पहले कर्नाटक में देखा जा चुका है. हालांकि यह अन्य प्रदेशों की तरह आसान नहीं होगा क्योंकि यहां कांग्रेस की सरकार नहीं है जो अपनी सत्ता भगवान भरोसे छोड़ दे.यहां कांग्रेस और एनसीपी के समर्थन से उद्धव ठाकरे की सरकार है. यानि शिवसेना की.भाजपा के लिए शिवसेना ठीक उसी तरह है जैसे लंका के लिए विभीषण.अभी अभी रामायण सीरियल सभी ने देखा है.बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने भी देखा होगा.तो उसका हश्र भी मानस पटल से अभी नहीं मिटा होगा.राज्यपाल के स्तर से कुछ गड़बड़ हुआ तो भाजपा के लिए भी मुश्किल होगा. महाराष्ट्र में आपरेशन लोटस को अंजाम देने के पहले भाजपा को सौ बार सोचना होगा.इस बीच शिवसेना सांसद संजय राउत ने ट्वीट कर अगाह भी किया है कि राजभवन षणयंत्र का केंद्र न बने.इससे भी आगे बढ़कर उन्होंने यह भी इशारा किया कि देश ने 1983-84 में आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहे ठाकुर रामलाल का हश्र भी देखा है.काश! रामलाल प्रकरण की पुनरावृत्ति न हो तो ही अच्छा है.

महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे अभी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं.इस बीच 24 अप्रैल को विधान परिषद की खाली हो रही 9 सीटों के चुनाव होने थे.लेकिन कोरोना वायरस के संक्रमण से पैदा हुए संकट के चलते इस चुनाव पर ग्रहण लग गया और इसी के साथ सीएम उद्धव ठाकरे का विधान परिषद में मनोनयन भी अटक गया.देशव्यापी लॉकडाउन के चलते चुनाव आयोग ने चुनाव टाल दिए. उद्धव ठाकरे के विधान परिषद में मनोनयन के लिए राज्य मंत्रिमंडल ने एक प्रस्ताव पारित कर राज्यपाल से सिफारिश की.राज्यपाल कोटे की दो सीटें है.राज्य मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राज्यपाल कोश्यारी ने अब तक फ़ैसला नहीं लिया है.जाहिर है यदि राज्यपाल ने मंत्रिमंडल की सिफारिश को स्वीकार नहीं किया तो ठाकरे को इस्तीफ़ा देना होगा और उनका इस्तीफ़ा सरकार का इस्तीफ़ा माना जाएगा.ऐसी स्थिति में अगर राज्य में कोई नई राजनीतिक जोड़-तोड़ नहीं होती है और ठाकरे की अगुवाई वाला मौजूदा गठबंधन अटूट रहता है तो वे अपने मंत्रिपरिषद के साथ दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकेंगे.

लेकिन ऐसा आसानी से हो,यह मुमकिन नहीं जान पड़ता क्योंकि राज्यपाल के स्तर के इस खेल का मतलब ही क्या रह जाएगा? बीजेपी के लिए महाराष्ट्र की सत्ता उसकी नाक का सवाल बना हुआ है. सभी जानते हैं कि यहां 6 महीने राष्ट्रपति शासन के बाद बीच में कैसी नाटकीय ढंग से फणनवीस की सरकार बनवा दी गई थी.कैसे एनसीपी के कद्दावर नेता अजीत पवार को बीजेपी अपने पाले में खींच ले गई थी.हालाकि सत्ता के इस नाटक का पटाक्षेप दो दिन में ही हो गया था.तब भी राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की भूमिका पर तमाम सवाल खड़े हुए थे.अब फिर प्रदेश की सत्ता का भविष्य राज्यपाल के हाथों में है. और यह फ़ैसला राज्यपाल के स्व-विवेक के दायरे में आता है.लेकिन ऐसे में राज्यपाल को केंद्र के संकेत का इंतजार रहता है. महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का बाजार गर्म है.बीजेपी के एक नेता का उद्धव के राज्यपाल द्वारा मनोनयन के मंत्रिमंडल की सिफारिश को अवैध घोषित करने संबंधी न्यायालय में याचिका दायर करना और राजभवन में पूर्व सीएम फणनवीस की आवाजाही अनेक चर्चाओं को जन्म दे रहा है.

(महाराष्ट्र की राजनीति पर मेरी यह रिपोर्ट आज देश के जाने माने कई न्यूजपोर्टल और अखबार में प्रकाशित हुई)

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