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कोविड-19 और भारतीय किसान

अखबार का कोना : हिन्द आत्मा दैनिक समाचार पत्र

दिव्येन्दु राय…
समाजसेवी एवं राजनीतिक विचारक

यूं तो भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है लेकिन इस वैश्विक महामारी कोरोना ने किसान को हाशिये पर ला दिया है, इतिहास साक्षी रहा है अनेक महामारियों का एवं जबतक मानव जीवन रहेगा तबतक उसे कभी न कभी इन महामारियों का सामना करना पड़ेगा ही, इन महामारियों से पूरी मानव जाति प्रभावित होती है ऐसी ही एक वैश्विक महामारी कोविड-19 का सामना पूरा विश्व कर रहा है। पूरे विश्व के लगभग 207 देश अबतक इस कोविड-19 नामक वैश्विक महामारी के चपेट में आ चुके हैं जो आकंडा सार्वजनिक है उसके अनुसार अबतक लाखों लोग असमय काल के गाल में समा चुके हैं अर्थात अबतक लाखों लोगो की मृत्यु हो चुकी है अभी भी कई लाख लोग प्रभावित हैं कोविड-19 नामक वायरस की वजह से।
पूरे विश्व में भारत जनसंख्या के मामले में दूसरे स्थान पर है,पूरे विश्व की जनसंख्या का 17.5 प्रतिशत तो वहीं भूमि के मामले में सातवें स्थान पर 2.4 प्रतिशत भूमि के साथ है, जनसंख्या के हिसाब से भारत के लिये वैश्विक महामारी कोरोना से पार पाना बेहद ही चुनौतीपूर्ण था लेकिन इस वैश्विक महामारी से निपटने के लिये भारत सरकार ने 25 मार्च से 14 अप्रैल तक 21 दिनों के लिये लॉकडाउन की घोषणा की लेकिन जब हालात काबू में नहीं हुए तो लॉकडाउन को 3 मई तक के लिये बढ़ा दिया गया। लॉकडाउन के दौरान भारत की लगभग 135 करोड़ जनता अपने घरों मे है, अप्रैल के आधे माह तक देश के 325 जनपदों में कोविड-19 के संक्रमण का प्रभाव नहीं है। पूरा देश घर बैठकर कोविड-19 के चेन को तोड़ने का प्रयास कर रहा है एवं घर बैठ कोरोना से लड़ रहा है, सरकारों का पूरा ध्यान इस बात पर है की देश के लोगों के पास खाद्यान आसानी से उपलब्ध हो।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में अपनी सतत भूमिका के कारण कृषि एवं इससे सम्बद्ध क्षेत्र एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, राष्ट्रीय आय में इसका योगदान वर्ष 2014-2015 में 18.2 प्रतिशत था एवं वर्तमान समय 2019-2020 में 16.5 प्रतिशत है। कोरोना वायरस के इस दौर भारत में अगर कोई सर्वाधिक परेशान हैं तो वह किसान हैं। इस समय रबी (गेहूँ) की फसल खेतों में तैयार होकर खड़ी है एवं सरकार ने किसानों की समस्या को ध्यान में रखते हुए गेहूँ की कटाई के लिये हार्वेस्टर एवं उसके साथ 5 मजदूरों को दूसरे राज्य से दूसरे में जाने के लिये मंजूरी दे दी लेकिन आदेश के बावजूद कोरोना के भय से अन्य राज्यों से हार्वेस्टर अन्य राज्यों में नहीं आ रहे एवं केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों का भले दिशानिर्देश हो की कृषि कार्य सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करते हुए किया जा सकता है लेकिन कोरोना के बहुत अधिक भय और स्थानीय पुलिसकर्मियों के डर की वजह से कोई मजदूर जल्द तैयार नहीं हो रहे।
सब्जी की खेती करने वाले किसानों का हाल तो और बेहाल है मौसमी सब्जियाँ जिनकी कीमते इस वक्त अच्छी हैं उन्हे चाहकर भी किसान नहीं बेच पा रहे हैं लॉकडाउन होने के वजह से और अगर किसी तरह बेच भी रहे हैं तो उनको उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा जो मिलना चाहिए, जो सब्जियाँ अन्य शहरों में भेजी जाती थी वह भी पूरे देश में लॉकडाउन होने की वजह कहीं भेजी नहीं जा पा रहीं।
आमतौर पर दिसंबर से लेकर जून तक फूलों की बहुत मांग रहती है जिसकी वजह से मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में किसान पारम्परिक खेती छोड़ फूलों की खेती करने लगे थे यहाँ तक की जरबेरा के फूलों की खेती भी करते हैं जो विदेशों तक पहुँचता है जो लॉकडाउन की वजह से कहीं नहीं जा पा रहा है, फूलों का वार्षिक कारोबार लगभग 1 हज़ार करोड़ के आस पास का होता है। देश के सभी मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा और चर्च श्रध्दालुओं के लिये बन्द हैं और साथ ही साथ कोविड-19 के इस महामारी के दौर में न तो शादी हो रही न ही कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम जिसकी वजह से स्थानीय तौर पर फूलों की उगाने वाले किसान लाभान्वित होना तो दूर अपनी पूँजी भी नहीं निकाल पा रहे एवं मुरझा जाने के बाद फूलों को तुड़वा कर खेत से बाहर फेंकने में भी उन्हें जमा पूँजी में से मजदूरी देनी पड़ रही।
देश की जीडीपी में 16 प्रतिशत की हिस्सेदारी कृषि क्षेत्र की है और कृषि के ऊपर देश के लगभग 48 प्रतिशत लोग आश्रित हैं,खाद्यान सामग्रियों का निर्यात बन्द होने का नुकसान सर्वाधिक किसानों को हो रहा है। सरकार को किसानों की समस्या को ध्यान में रखते हुए उनकी फसल को उनके खेतों से खरीदवाने की व्यवस्था करनी चाहिए क्योंकि जब किसान धूप में जलते तब जाकर सबके घर के चूल्हे जलते हैं। अब वक्त आ गया है जब सरकारों को किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए कृषि को उद्योग का दर्जा देना होगा, किसानों के नाम पर डीजल में सब्सिडी जरूर दी जाती है लेकिन उसका उपयोग कृषि कार्य से ज्यादा लोग अन्य क्षेत्रों में करते हैं। जिन लोगों का ताल्लुक कृषि क्षेत्र से नहीं होता है उन्हें किसानों के प्रति अपनी सोच को बदलना होगा क्योंकि किसान अपनी मेहनत का खाते हैं न की उनकी तरह किसानों के लिये दी जाने वाली सब्सिडी स्वरुप डीजल का उपयोग अपनी महंगी कारों में कर घूमने के लिये, किसान मौसम से लेकर हालात से लड़ते हुए अपनी फसल तैयार करता है लेकिन फिर भी उसकी कीमत वह खुद नहीं तय कर सकता जबकि किसी अन्य क्षेत्र में जो उत्पादन करता है वही कीमत तय करता है सरकार को इसपर भी विचार मंथन एवं किसानहित में कार्य करने की आवश्यकता है।

(यह लेखक के स्वयं के विचार हैं इनका किसी संस्था/संगठन से कोई ताल्लुक़ नहीं है)

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