चर्चा में

मऊनामा- एक : भूला गइलन निरहू, सहादतपुरा क बज़ार

                          (विनय राय)

मऊ । कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है का गीत गुनगुनाते हुए निरहू अपनी मदमस्त चाल से रोडवेज होते हुए सहादतपुरा की तरफ बढ़ रहा था, लेकिन उसे समझ में नही आ रहा था कि वह सहादतपुरा मुहल्ले में जा रहा है अथवा गोरखपुर वाली सड़क पर चल रहा है। इतने में उसे भेलूपाकड़ गांव के फेकू भैया दिख गए और परेशान निरहू तपाक से फेकू भैया-फेकू भैया पुकारने लगा।
अपने हरदिलअज़ीज निरहू की आवाज़ कान में पड़ते ही फेकू चौक पड़ा और बोला, का हो निरहू भईया कइसे याद कइल ह का बताई फेकू भाई ई गोरखपुर के सड़क बा कि सहादतपुरा क बज़ार एतनी जगमगाहट अउर रोडवा चिकन्न बा कि समझे में ना आवत ह।
फेकू बोलने लगा, अरे नाहीं भाई ई सब पालकी साहब क देन बा।
यह जो आंखे चुंधिया देने जैसी लाइटे दिख रही है यह उन्हीं का कमाल है। निरहू आंखे फाड़े कभी डिवाइडर पर लगे चमकने वाले पत्थर तो कभी झूमर व दूधिया-पीली लाइटो को अपलक निहार रहा था। इतने में उसे अपना घर दिख गया और वह यह कहते हुए दरवाजा थपथपाने लगा कि कलपू चाचा के बाद पालकी भैया में भी मऊ के विकास की ललक दिख रही है।

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