हे राम!! तेरी अयोध्या में..
✍️ मेरी कलम से ……..
अखिलानंद यादव
बलात्कार एक बला बनी,
या राजनीति की कला बनी।
मुद्दों से भटक धरातल पर,
आपस में है कुंछ यू ठनी।।
जनमत बहुमत का बस खेल रहा,
दो पल का जीवन जीने को।
पानी की कमी कुछ यूं खली,
बस रक्त बचा है पीने को।।
हे राम !! तेरी आयोध्या में,
अब ना मुझको जीना है।
उस युग का रावण अच्छा था,
रावण इस युग का कमिना है।।
अब जानवर भी शर्मिंदा है,
हिस्सेदार अभी जिंदा है।
सुशासन सिर्फ “आसन” है,
जहां दुशासन बैठा गन्दा है।।
अब आनंद ,आनंद से पूछे,
पता तुम्हारा क्या होगा ?
बलात्कार से बचने का,
नया तरीका क्या होगा ?
“अखिल” बैठकर महफ़िल में,
आंशुओ से बदन धोए।
हे राम ! तेरी अयोध्या में,
जाने कफ़न कब मिल जाये।।

