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यह खबर चुनावी चटखारे के लिए नहीं है मऊ की आवाज़ है नेता जी

(आनन्द कुमार)

यह खबर केवल चुनावी चटखारे के लिए नहीं है बल्कि यह खबर मऊ की अवाम के अंदर से उठ रहे एक-एक आवाज से है। कुछ नोटा का वोट छत्तीसगढ़ राजस्थान में भाजपा को सत्ता से ही दूर नहीं किया बल्कि उसकी सरकार भी नहीं बनने दी। गिनती का नोटा वोट न सिर्फ छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा की सूरत बिगाड़ दी बल्कि लोगों को राजनैतिक आकाओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि नोटा का सोटा अपने आप में दम रखता है। कुछ ऐसे ही हालात उत्तर प्रदेश राज्य के मऊ जनपद के 70 घोसी लोकसभा क्षेत्र का होता जा रहा है। बहुतेरे लोग मुखर होकर एवं बहुतेरे लोग दबी जुबान से लोकल बनाम बाहरी मुद्दे का विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा सपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेस, भासपा के नेता भी अंदर खाने से यही चाहते हैं कि घोसी संसदीय सीट से जो भी प्रत्याशी आए तो वह घोसी संसदीय क्षेत्र का हो।
वर्षो से बाहरी का दंश झेल रहे मऊ के लोगों का कहना है कि शर्म तब आती है जब के 5-5 जनप्रतिनिधि और सभी बाहरी हों।
बताते चलें की वर्तमान में मऊ जनपद के घोसी लोकसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हरि नरायन राजभर बलिया जनपद के निवासी हैं। वही ज़िले के तीन विधायक कैबिनेट मंत्री दारा सिंह चौहान, घोसी के विधायक युपी सरकार में मंत्री फागु चौहान व मोहम्दाबाद गोहना के विधायक श्री राम सोनकार आजमगढ़ जनपद के निवासी हैं। इसके साथ पांच बार लगातार मऊ सदर से विधायक हो रहे मोख्तार अंसारी विधायक गज़ीपुर से गद्दी पर काबिज है। बरसों से बाहरी का दंश झेल रहा मऊ के पांचो जनप्रतिनिधि विधायक व सांसद कोई न कोई बाहरी रहता है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात तो तब हो गई जब 2014 के लोकसभा चुनाव एवं 2017 के विधानसभा चुनाव में मऊ जनपद के सभी जनप्रतिनिधि गैर जनपद के चुने गए। उसके बाद से ही मऊ बनाम बाहरी का मुद्दा धीरे-धीरे अंदर ही अंदर सुलगने लगा। अब अगर सभी दलों के राष्ट्रीय नेता इस मुद्दे को दर निकाल करते हैं तो उनको काफी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

सपा बसपा के गठबंधन में यह सीट बसपा के खाते में गई है। ऐसे में किसी भी प्रत्याशी की अभी औपचारिक घोषणा तो नहीं हुई है लेकिन प्रभारी के रूप में गाज़ीपुर जनपद से आये अतुल राय के नाम की चर्चा तो है, लेकिन कौन हाथी की सवारी करेगा यह अभी बसपा मुखिया मायावती ही बता सकती हैं। वैसे तो कांग्रेस ने दलबदल कर आये पूर्व सांसद बालकृष्ण चौहान को टिकट देकर सूझ बूझ की राजनीति में लोकल बनाम बाहरी के मुद्दे को ध्यान मे रखकर तगड़ा चौका मारा है। वहीं सबसे ज्यादा टिकट को लेकर उठापटक, कयास, अटकलें अगर किसी दल में लग रही हैं तो वह भारतीय जनता पार्टी में है। वैसे तो सही मायने में अभी यह ही तय नहीं है की मऊ की घोसी लोकसभा सीट से भाजपा लड़ेगी कि भासपा लेकिन अटकलों पर विराम लगने का नाम नहीं ले रहा है। वहीं वर्तमान सांसद हरिनरायन राजभर का टिकट रहेगा या लोकल बनाम मारी के मुद्दे की भेंट चढ़ेगा। भाजपा अपने अगले प्रत्याशी के लिए लोकल बनाम बाहरी का मुद्दा ध्यान देती है या नहीं यह भी देखना होगा। वैसे भाजपा में टिकट के लिए लेवनहारों की काफी लंबी लाइन है। लेकिन समस्या यही है कि चुनाव सर पर आ गया और इस पर अभी तक भाजपा चुप्पी साधी हुई है। ऐसे में राष्ट्रीय नेतृत्व घोसी को लेकर मंथन तो जरूर कर रहा है लेकिन अगर उसने अपने मंथन में इस सीट को लेकर जरा सा भी चूक की तो, भाजपा का इस सीट पर 2014 में बना इतिहास, इस बार इतिहास में सिमट जाएगा। वहीं अगर यह सीट गठबंधन दल में भारतीय समाज पार्टी के पाले में जाती है तो पार्टी के मुखिया व उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर को भी इस सीट पर लोकल बनाम पारी का मुद्दा को ध्यान देना होगा। अगर भारतीय समाज पार्टी के खाते में यह सीट जाती है तो भारतीय समाज पार्टी को इस सीट पर लोकल प्रत्याशी उतारती है तो भारतीय जनता पार्टी के लोगों को भी इस सीट पर गठबंधन धर्म का बखूबी निर्वाह करना पड़ेगा। तभी ओमप्रकाश राजभर की नैया पार लगेगी।
लखनऊ और दिल्ली में बैठे राजनीति के सुरमाओं को भले ही घोसी संसदीय क्षेत्र के अंदर दबी व मुखर होकर सुलग रही लोकल बनाम बाहरी का मुद्दा दिखाई और सुनाई ना दे लेकिन इतना तो तय है कि किसी भी दल ने अगर मऊ की आम जनता के इस आवाज को दबाने की कोशिश की तो उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। ऐसे में कांग्रेस ने इस मुद्दे को गले लगा कर बसपा व भाजपा एवं इनके सहयोगी दलों से एक कदम आगे तो निकल ही चुकी है। अब देखना होगा कि भाजपा व बसपा अपने सहयोगी दलों के साथ घोसी की जनता की भावनाओं का कितना ख्याल रखती है।

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