खास-मेहमान

शब्द मसीहा : वो तोहमत जिसे इश्क कहती है दुनिया

मालूम कहाँ होता है कि जिंदगी किस मोड़ पर ला पटकेगी . मुझे भी नहीं पता था …एक बासंती हवा का झोंका ही तो था . कितना अजीब लगता है …ऐसी हवा और मुस्कराहट से दूर रहकर . ये सिर्फ मेरा दिल ही महसूस कर सकता है . हाँ, ये मेरा जुड़ाव ही है . उधर क्या है दिल में मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की , अलबत्ता उसने कभी रोका भी नहीं .

मैंने ही एक बार कहा था ,”शादी करोगी मुझसे ?” वह घबरा गई थी और बोली थी ,”काश ये मुमकिन हो जाता तो मेरा सौभाग्य होता . हम पहाड़ के हैं , हमारे यहाँ ऐसा संभव नहीं .”

कितने ही वर्ष गुजर गए . उसकी शादी भी हो गई और वह एक बच्चे की माँ भी बन गई . पति से बहुत पटरी बैठाने की कोशिश की मगर बात बनी नहीं . गए दस साल से तलाक का केस चल रहा है . तब वह तृतीय वर्ग की नौकरी करती थी . अब पीसीएस कर चुकी है और अच्छे ओहदे पर है .

उस रोज अचानक उसे एक्टिव देखा तो मैंने “सलाम” लिख भेजा था .

“अरे! तुम जिंदा हो हो अभी भी , कैसे हो ?” शायद वो दसियों साल पुरानी दोस्ती की ठंडक भरी चादर एकदम से कहीं दूर जा गिरी थी .

“अच्छा हूँ. बेटा कैसा है ?”

“बहुत बढ़िया . अभी चौथी क्लास में है .”

“क्या हुआ तुम्हारा ? फैसला आया ?”

“हा हा हा ….ये राज रोग है …जवानी लेकर ही मानेगा .”

“ह्म्म्म …”

“ह्म्म्म …हा हा हा …इतने उदास क्यों हो ? देखो , मैंने भी हालात से लड़ना सीख ही लिया न . प्यार मेरी किस्मत में था ही नहीं . न जाने कौन-सा ग्रह मेरी कुंडली का वक्री है…जो मैं समंदर के पास रहते भी प्यासी रह गई …काश …”

“काश ….क्या मतलब ?”

“जो बात तुम जानते हो , उसे मेरी जुबान से कहलवाने का अब क्या फ़ायदा.”

“हम्म्म….”

“चलो , कह ही देती हूँ कि मैंने गलत फैसला लिया था शायद . तुम्हें हाँ, कह सकती थी मैं .”

“हा हा हा ….मत बहलाओ यार . कोई फायदा नहीं …हम जीव की नदी के दो पाट है…शायद हाँ, कहकर भी हम खुश न रह पाते …बहुत कुछ अजान है जीवन में .”

“फिर भी , मैं अपनी चाहत में ही बर्बाद होती , वो बर्बादी भी मेरी होती मगर अब जो हुआ है वह बहुत दुखदाई है …तुमने भी सहा है इस पीड़ा को .”

“दोस्ती इसी का नाम है . सब कुछ पा लेना संभव नहीं है जीवन में …मैं तो तुम्हें खुश देखकर ही खुश था …मुझे क्या मालूम था कि मैं जिसका इंतज़ार कर रहा हूँ वो मेरे भाग्य में नहीं है .”

“भाग्य तो मेरा ही खराब था शायद .”

“नहीं , तुम इसे ऐसे सोचो कि तुम्हारी तरक्की का रास्ता इस सम्बन्ध के ऊपर से गुजरना था . अगर सब सही होता तो आज तुम यहाँ तक नहीं पहुंचती . तुमने अपनी कुंठा को हथियार बनाया और आज उसे हरा दिया है अपनी काबिलियत से …यही तुम्हारी कामयाबी है .”

“इसमें तुम्हारी बातों का योगदान भी है . तुमने कितनी ही बार मुझे बचाया है . जब कोई नहीं दीखता था तब सिर्फ तुम थे , जिससे मैं अपने मन की हर बात कह लेती थी…रो लेती थी .”

“मैंने कुछ नहीं किया ….बस एक दोस्त का फ़र्ज़ निभाया है …जो बहुत जरुरी था . जीवन का हर खेल जीतने के लिए नहीं खेला जाता .”

“क्या हारा तुमने …हा हा हा .”

“दिल हार गया मैं .”

कुछ देर तक मैं इंतज़ार करता रहा . कोई जवाब नहीं था . मैं किसी पोस्ट पर कमेन्ट कर रहा था तभी एक दिल आया कमेन्ट में .

“ये क्या है ?”

“सच यही है कि वो तोहमत जिसे इश्क कहती है दुनिया …… हम तो वो भी न कर सके .”

“हा हा हा …किया न होता तो आज याद न कर रही होती …वैसे इश्क तो मैं कर बैठा था तुमसे …हा हा हा .”

“जानती हूँ, उस इनकार का फल ही तो भुगत रही हूँ . यूँ भी इश्क में जलने के सिवा और कुछ हासिल नहीं होता और ये भुगता हुआ सच है मेरा .”

“इश्क इबादत है …करता रहा हूँ और करता रहूँगा .”

“चलो , आज मिल लो मुझसे . तुम्हारे शहर में हूँ.”

“कहाँ हो ? आ रहा हूँ पत्नी के साथ तुमसे मिलने .”

“जलाओगे मुझे !”

“नहीं , दिखाउंगा कि इश्क के ताजमहल ऐसे भी होते हैं .”

“हाँ, जिन्हें लोग सजदे तो करते हैं मगर मुहब्बत नहीं कर पाते . दफन कर दिया है ख़ुद को तुम्हारी चाहत में लपेटकर ….ये मुहाब्बत कोरी ही रह जायेगी इस जन्म में . तुम रहने दो …मत आना …कहीं मैं ही अपनी सीमा भूल गई तो ….”

“मुलाक़ात का कोई पैग़ाम दीजिये कि
छुप छुपके आने को जी चाहता है
और आके न जाने को जी चाहता है
और आके न जाने को जी चाहता है
निगाहें मिलाने को जी चाहता है …….. ” लिख दिया था मैंने . ख़ामोशी अभी तक छाई हुई है . प्यार का बोन्साई आज भी उतना ही बड़ा है …उतना ही ताजा .

शब्द मसीहा

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