लद्युकथा : ”काका”
आज मंजरी को न जाने क्या हो गया था कि वह सारे दिन अपने केबिन से बाहर नहीं निकली थी . बहुत उदास और परेशान थी . मगर फिर भी काम कर रही थी . शाम को सभी लोग ऑफिस से जाने लगे तो मंजरी अपने कमरे से बाहर निकल टॉयलेट में चली गयी . काफी देर तक वह बाहर नहीं निकली .
अनोखेलाल उनके केबिन में गया और चाय के कप उठाने लगा . जब सफ़ेद कुर्सी पर निगाह पड़ी तो वह माजरा समझ गया . वह भी तो बेटी का बाप था . वह अपने साथी को बोलकर बाहर चला गया . वापसी में उसके हाथों में एक थैला था .
उसने देखा कि केबिन अभी भी खाली पड़ा था और टेबल पर बैग पड़ा हुआ था . पौने साथ बज रहे थे . उसने हिम्मत कर लेडिज टॉयलेट का दरवाजा खटखटाया .
“कौन है ?” अन्दर से आवाज आई .
“मेडम जी ! अनोखेलाल हूँ चौकीदार .” वह बोला .
“अभी आधा घंटा इंतज़ार करो .” मंजरी बोली .
“मेडम ! जरा सा दरवाजा खोलकर कुछ सामान ले लो . आपके काम का है यह .”
मंजरी असमंजस में पड़ गयी . मगर मन में ख्याल आया कि ये तो अधेड़ आदमी है और कभी किसी से कुछ गलत नहीं कहता . अलबत्ता उसने ही एकबार उसे सफाई न होने पर डांट दिया था . उसने अन्दर से सिटकनी को खोल दिया और अपना हाथ बाहर कर दिया . अनोखेलाल ने थैला उसके हाथों में थमा दिया और उसके केबिन की तरफ बढ़ गया . वह गन्दी हुई कुर्सी की सफाई करने लगा .
कुछ देर बाद मंजरी बाहर निकल आई . आज उसकी निगाहें ऊपर नहीं हो रहीं थी .
“काका ! मुझे माफ़ कर दो !”
“तुम भी तो मेरी बेटी की तरह हो . कोई अपनी बेटी की परेशानी कैसे देख सकता है . गरीब आदमी हूँ मैं घर में यही सबसे अच्छी साड़ी थी . मुझे माफ़ कर देना बेटी .” अनोखेलाल बोला .
मंजरी ने भरी आँखों से अनोखेलाल के पैर छुए और बाहर निकल पड़ी सिर ऊँचा किये . अगले दिन उसके हाथों में दो थैले थे काका अनोखेलाल के लिए .
शब्द मसीहा
