राम-रहमान में भेद होई, अब हर थाली में छेद होई
मेरी कलम से…
अखिलानंद यादव
भूख पर दाना फेकल जाई
धीरे – धीरे सब बेचल जाई
जनता जाग सहेजल जाई
चुनाव कसहू जीतल जाई
फिर पीठ छुरा भोकल जाई
अपराध कईसे रोकल जाई
जनता जब जागृत हो जाई
थपकी नींद क ठोकल जाई
जनता फिर बेहोश हो जाई
लोभ – लालच में खो जाई
जादूगर जब जादू दिखलाई
मूकदर्शक मदहोश हो जाई
मोर भइया अब जाग.. जा
मैदान छोड़ ना भाग.. जा
हाथी होश में लावे खातिर
अब ऊंट लेखा लाग..जा
राम – रहमान में भेद होई
अब हर थाली में छेद होई
आग लगी अवसर मिलते
अखिल जहां में खेद होई

